आईआईटी आईएसएम की पहल से आदिवासी छात्रों को डिजिटल उड़ान, एकलव्य स्कूलों के बच्चों को आईटी और कंप्यूटर स्किल्स की ट्रेनिंग
IIT ISM झारखंड के छह एकलव्य मॉडल रेजिडेंशियल स्कूलों के छात्रों को IT और कंप्यूटर स्किल्स की ट्रेनिंग दे रहा है. नरेंद्र निषाद की रिपोर्ट.


Published : August 20, 2026 at 8:23 PM IST
|Updated : August 21, 2026 at 1:04 PM IST
धनबाद: तकनीक के इस दौर में डिजिटल स्किल्स अब सिर्फ नौकरी के लिए जरूरी नहीं हैं, बल्कि बेहतर शिक्षा और करियर की पहली सीढ़ी बन चुकी हैं. लेकिन देश के दूरदराज और आदिवासी इलाकों में रहने वाले कई बच्चों के लिए कंप्यूटर और आधुनिक तकनीक तक नियमित पहुंच आज भी बड़ी चुनौती है. इसी डिजिटल गैप को कम करने की दिशा में आईआईटी आईएसएएम ने एक महत्वपूर्ण पहल शुरू की है.
संस्थान की ओर से झारखंड के छह एकलव्य मॉडल रेजिडेंशियल स्कूलों के कक्षा 10वीं, 11वीं और 12वीं के आदिवासी छात्रों को आईटी और कंप्यूटर स्किल्स की ट्रेनिंग दी जा रही है. दो दिवसीय इस कैपेसिटी बिल्डिंग प्रोग्राम में बच्चों को सिर्फ कंप्यूटर की जानकारी नहीं दी जा रही, बल्कि उन्हें भविष्य की पढ़ाई, प्रतियोगी परीक्षाओं और रोजगार की बदलती जरूरतों के लिए तैयार करने की कोशिश की जा रही है.
एक तरफ देश तेजी से डिजिटल इकोनॉमी की ओर बढ़ रहा है. स्कूल से लेकर कॉलेज, नौकरी से लेकर कारोबार और रिसर्च से लेकर सरकारी सेवाओं तक हर क्षेत्र में कंप्यूटर और डिजिटल तकनीक की भूमिका लगातार बढ़ रही है. वहीं दूसरी तरफ झारखंड के आदिवासी और दूरदराज के इलाकों में पढ़ने वाले कई छात्रों के सामने आज भी कंप्यूटर तक नियमित पहुंच और आधुनिक डिजिटल स्किल्स सीखने की चुनौती बनी हुई है. इसी चुनौती को अवसर में बदलने की कोशिश कर रहा है आईआईटी आईएसएम धनबाद.
कैपेसिटी बिल्डिंग ट्रेनिंग प्रोग्राम का आयोजन
धनबाद स्थित आईआईटी (आईएसएम) में 20 और 21 अगस्त को आदिवासी छात्रों के लिए दो दिवसीय कैपेसिटी बिल्डिंग ट्रेनिंग प्रोग्राम आयोजित किया जा रहा है. इस कार्यक्रम का मकसद आदिवासी छात्रों को डिजिटल टेक्नोलॉजी से जोड़ना, उनका आत्मविश्वास बढ़ाना और उन्हें उच्च शिक्षा और भविष्य के करियर के लिए तैयार करना है.
यह कार्यक्रम मैनेजमेंट स्टडीज एवं इंडस्ट्रियल इंजीनियरिंग विभाग की ओर से सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर ट्राइबल वेलफेयर के तहत आयोजित किया जा रहा है. इसमें जनजातीय कार्य मंत्रालय, भारत सरकार का भी सहयोग है. इस ट्रेनिंग में झारखंड के छह एकलव्य मॉडल रेजिडेंशियल स्कूलों के छात्र हिस्सा ले रहे हैं. इनमें ईएमआरएस बसिया, सालगाडीह, तमाड़, तसरिया, काठीजोरिया और तोरसिंदरी एकलव्य मॉडल स्कूल के विद्यार्थी शामिल हैं.
सिखाई जाएगी कंप्यूटर की बेसिक से लेकर एडवांस डिजिटल स्किल्स
कक्षा 10वीं, 11वीं और 12वीं के इन छात्रों के लिए यह सिर्फ दो दिन की ट्रेनिंग नहीं है, बल्कि तकनीक की दुनिया से सीधा जुड़ने का एक ऐसा मौका है, जो आगे चलकर उनके करियर की दिशा बदल सकता है. ट्रेनिंग के दौरान छात्रों को कंप्यूटर की बेसिक जानकारी से लेकर एडवांस डिजिटल स्किल्स तक सिखाई जा रही हैं. बेसिक मॉड्यूल में MS Office, Tally और Python Programming जैसे विषय शामिल किए गए हैं. वहीं एडवांस मॉड्यूल में Advanced Excel के जरिए डेटा एनालिसिस, स्प्रेडशीट मैनेजमेंट और रिपोर्टिंग जैसी प्रोफेशनल स्किल्स पर जोर दिया जा रहा है.
खास बात यह है कि बच्चों को सिर्फ क्लासरूम में बैठकर थ्योरी नहीं समझाई जा रही, बल्कि कंप्यूटर पर खुद काम करने का मौका दिया जा रहा है. लाइव डेमो, इंटरएक्टिव डिस्कशन और हैंड्स-ऑन प्रैक्टिकल के जरिए छात्रों को तकनीक को समझने और खुद इस्तेमाल करने की कोशिश की जा रही है.
ज्यादा से ज्यादा प्रैक्टिकल एक्सपोजर देने पर फोकस
आईआईटी आईएसएम मैनेजमेंट स्टडीज एवं इंडस्ट्रियल इंजीनियरिंग विभाग की प्रोफेसर डॉ रश्मि सिंह के मुताबिक इस पूरी ट्रेनिंग का फोकस बच्चों को कंप्यूटर पर ज्यादा से ज्यादा प्रैक्टिकल एक्सपोजर देने पर है. उनका कहना है कि जब बच्चे खुद कंप्यूटर पर किसी सॉफ्टवेयर या प्रोग्राम को चलाकर देखते हैं, तो उन्हें चीजों को समझने में आसानी होती है और उनका आत्मविश्वास भी बढ़ता है. लेकिन इस पहल का फायदा सिर्फ ट्रेनिंग तक सीमित नहीं है.
दरअसल, आईआईटी (आईएसएम) के शिक्षक जब इन एकलव्य मॉडल स्कूलों में पहुंचते हैं, तो बच्चों को देश के प्रतिष्ठित तकनीकी संस्थान के शिक्षकों से सीधे सीखने का मौका मिलता है. इससे छात्रों में एक अलग तरह का उत्साह और मोटिवेशन देखने को मिलता है. आईआईटी के शिक्षकों का पढ़ाने का तरीका भी बच्चों के लिए नया अनुभव है. क्लासरूम में मिलने वाली जानकारी के साथ-साथ उन्हें समय-समय पर उच्च शिक्षा, तकनीक, रिसर्च और करियर से जुड़ी जानकारियां भी मिलती रहती हैं. यानी,एक तरफ बच्चे कंप्यूटर सीख रहे हैं तो दूसरी तरफ उनके सामने संभावनाओं की एक नई दुनिया भी खुल रही है.
छात्रों को आईआईटी आईएसएम की लैब में जाने का मिलेगा मौका
आईआईटी (आईएसएम) की यह पहल एक और वजह से महत्वपूर्ण है. जो छात्र ट्रेनिंग और अन्य गतिविधियों में बेहतर प्रदर्शन करते हैं, उनमें से प्रतिभाशाली छात्रों को आईआईटी (आईएसएम) लाने और संस्थान की लैब तथा अन्य सुविधाओं से परिचित कराने का प्रयास भी किया जाता है. जब ये छात्र आईआईटी की रिसर्च लैब में पहुंचते हैं, तो उनका एक्सपोजर अचानक कई गुना बढ़ जाता है. जहां वे पहले सिर्फ किताबों में विज्ञान और तकनीक के बारे में पढ़ते थे, वहीं लैब में पहुंचकर उन्हें अत्याधुनिक उपकरणों, रिसर्च और तकनीकी प्रयोगों को करीब से देखने का अवसर मिलता है. यही अनुभव भविष्य में उन्हें उच्च शिक्षा के लिए प्रेरित कर सकता है.
प्रोफेसर रश्मि सिंह का कहना है कि आईआईटी जैसे संस्थान से सीधे जुड़ाव बच्चों के लिए मोटिवेशन का बड़ा माध्यम बन रहा है. खासकर ऐसे छात्र, जो दूरदराज के इलाकों से आते हैं, उनके लिए आईआईटी के शिक्षकों से मिलना और संस्थान की लैब देखना अपने आप में बड़ा अनुभव है.
कंप्यूटर की कमी बड़ी चुनौती
हालांकि, इस पूरी कवायद के बीच एक बड़ी चुनौती भी सामने आ रही है और वह है कंप्यूटर की कमी. एकलव्य मॉडल रेजिडेंशियल स्कूलों में छात्रों की संख्या के मुकाबले कंप्यूटर की संख्या काफी कम है. जानकारी के मुताबिक, कई स्कूलों में करीब 20 कंप्यूटर ही उपलब्ध हैं. इनमें भी कुछ कंप्यूटर काम नहीं करते.
ऐसे में बड़ी संख्या में छात्रों को एक साथ कंप्यूटर पर प्रैक्टिकल कराना मुश्किल हो जाता है. छात्रों के अलग-अलग बैच बनाने पड़ते हैं और बारी-बारी से उन्हें कंप्यूटर पर अभ्यास कराया जाता है. एकलव्य मॉडल रेजिडेंशियल स्कूलों में छठी कक्षा से लेकर 12वीं कक्षा तक पढ़ाई होती है. इन स्कूलों में छात्रों की संख्या बड़ी है. ऐसे में अगर डिजिटल शिक्षा को वास्तव में मजबूत बनाना है, तो कंप्यूटर की उपलब्धता बढ़ाना भी उतना ही जरूरी है. आईआईटी आईएसएम की टीम का मानना है कि जिस तेजी से शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में डिजिटल तकनीक का महत्व बढ़ रहा है, उस हिसाब से इन स्कूलों में कंप्यूटर की संख्या बढ़ाने की जरूरत है.
अगर करीब एक हजार छात्रों वाले स्कूल में सिर्फ कुछ दर्जन कंप्यूटर हों, तो हर बच्चे को नियमित प्रैक्टिस का पर्याप्त समय मिलना मुश्किल है. जरूरत इस बात की है कि छात्रों की संख्या के अनुपात में कंप्यूटर उपलब्ध हों, ताकि हर बच्चे को सप्ताह में कम से कम एक-दो बार कंप्यूटर के सामने बैठकर प्रैक्टिकल करने का मौका मिल सके. क्योंकि कंप्यूटर सीखना सिर्फ किताब पढ़ने से संभव नहीं है. कीबोर्ड पर उंगलियां चलानी होंगी, सॉफ्टवेयर खोलना होगा, डेटा तैयार करना होगा, गलतियां करनी होंगी, और उन्हीं गलतियों से सीखना होगा. यही वजह है कि आईआईटी (आईएसएम) की टीम हैंड्स-ऑन ट्रेनिंग पर खास जोर दे रही है.
प्रोफेसर निलाद्रि दास के मुताबिक, हैंड्स-ऑन ट्रेनिंग छात्रों को टेक्नोलॉजी समझने के साथ-साथ उसे क्लासरूम से बाहर इस्तेमाल करने का आत्मविश्वास देती है. यानी मकसद सिर्फ यह नहीं कि छात्र यह जानें कि कंप्यूटर क्या है. बल्कि वे यह भी समझें कि कंप्यूटर और डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल अपनी पढ़ाई, प्रोजेक्ट, डेटा, रिसर्च और भविष्य के काम में कैसे किया जा सकता है.
आईआईटी (आईएसएम) धनबाद का सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर ट्राइबल वेलफेयर इसी सोच के साथ काम कर रहा है. इस पहल के जरिए शिक्षा, स्किल डेवलपमेंट और डिजिटल इनक्लूजन को एक साथ जोड़ने की कोशिश की जा रही है. संस्थान की अकादमिक और तकनीकी विशेषज्ञता को आदिवासी छात्रों तक पहुंचाया जा रहा है, ताकि उनके और डिजिटल दुनिया के बीच की दूरी कम की जा सके.
इस पहल की खासियत यह भी है कि यहां सिर्फ एक कार्यक्रम आयोजित कर जिम्मेदारी खत्म करने की कोशिश नहीं है. छात्रों को ट्रेनिंग देने के साथ-साथ उनकी क्षमता को समझने, बेहतर प्रदर्शन करने वाले छात्रों की पहचान करने और उन्हें आगे के एक्सपोजर से जोड़ने पर भी ध्यान दिया जा रहा है. यानी, स्कूल से आईआईटी तक एक ऐसा रास्ता तैयार करने की कोशिश है, जिसमें प्रतिभा को पहचान मिले.
तकनीक तक पहुंच मिले और आगे बढ़ने का अवसर भी. ट्रेनिंग और इवैल्यूएशन से जुड़ी गतिविधियों को आईआईटी (आईएसएम) की विजिटिंग टीमों द्वारा संचालित किया जा रहा है. इसमें रोहित सिंह और सुमाना बनर्जी, सनी कुमार और फिरदौस अंसारी तथा डॉ. संतनु मंडल शामिल हैं. इन टीमों के जरिए छात्रों को अलग-अलग डिजिटल और कंप्यूटर आधारित गतिविधियों में प्रशिक्षित किया जा रहा है.
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