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वाद का स्वरूप न बदले तो देरी के आधार पर संशोधन अर्जी खारिज नहीं की जा सकती: हाईकोर्ट

हाईकोर्ट ने गोरखपुर की ट्रायल अदालत और पुनरीक्षण अदालत के उन आदेशों को रद्द कर दिया, जिन्होंने तकनीकी आधार पर संशोधन अर्जी खारिज की थी.

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इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश. (Photo Credit: ETV Bharat)
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By ETV Bharat Uttar Pradesh Team

Published : February 25, 2026 at 10:00 PM IST

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प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह निर्णय दीवानी मुकदमों में संशोधन की प्रक्रिया और 'न्याय के हित' को प्राथमिकता देने वाला एक महत्वपूर्ण फैसला है. न्यायमूर्ति मनीष कुमार निगम ने स्पष्ट किया है कि यदि संशोधन से मुकदमे की मूल प्रकृति नहीं बदलती, तो केवल देरी के आधार पर आवेदन को निरस्त नहीं किया जाना चाहिए. कोर्ट ने गोरखपुर की ट्रायल अदालत और पुनरीक्षण अदालत के उन आदेशों को रद्द कर दिया, जिन्होंने तकनीकी आधार पर संशोधन अर्जी खारिज की थी. यह आदेश स्पष्ट करता है कि प्रक्रियात्मक नियम न्याय के रास्ते में बाधा नहीं बनने चाहिए.

जिला न्यायालय ने पुनरीक्षण अर्जी ठुकराई: विवाद की पृष्ठभूमि और निचली अदालतों का रुख यह मामला गोरखपुर के वर्ष 1997 के एक पुराने दीवानी वाद से संबंधित है, जिसमें संपत्ति से कब्जा हटाने की मांग की गई थी. वादी ने बाद में अपनी प्रार्थना में सुधार करने और कब्जे की मांग को अधिक स्पष्ट करने के लिए संशोधन का आवेदन दिया था. हालांकि, ट्रायल कोर्ट ने नवंबर 2022 में इस अर्जी को बहुत लंबे समय बाद दाखिल करने के आधार पर खारिज कर दिया था. जिला न्यायालय ने भी अप्रैल 2023 में पुनरीक्षण अर्जी को यह कहते हुए ठुकरा दिया कि यह वाद के स्वरूप को बदल देगा.

संशोधन के प्रति उदार दृष्टिकोण अपनाएं: हाईकोर्ट का कानूनी दृष्टिकोण और सीपीसी की व्याख्या हाईकोर्ट ने इन आदेशों की समीक्षा करते हुए पाया कि प्रस्तावित संशोधन वास्तव में वहीं राहत मांग रहा था जो मूल वाद में निहित थी. अदालत ने स्पष्ट किया कि सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश 6 नियम 17 के तहत संशोधन के प्रति उदार दृष्टिकोण अपनाना चाहिए. चूंकि यह मूल वाद वर्ष 2002 के सीपीसी संशोधन से पहले का है, इसलिए 'उचित तत्परता' की शर्त यहां लागू नहीं होती. कोर्ट के अनुसार, केवल विलंब संशोधन को अस्वीकार करने का कोई 'स्ट्रेट जैकेट फॉर्मूला' नहीं हो सकता.

ट्रायल कोर्ट और पुनरीक्षण न्यायालय का आदेश रद्द: त्वरित न्याय और अंतिम निस्तारण के निर्देश हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को तीन सप्ताह के भीतर आवश्यक संशोधन पूरा करने का स्पष्ट निर्देश दिया है. इसके साथ ही, अदालत ने इस 29 साल पुराने मुकदमे की लंबी अवधि पर चिंता व्यक्त करते हुए इसे जल्द समाप्त करने को कहा है. संबंधित न्यायालय को आदेश दिया गया है कि वह अगले छह महीने के भीतर इस मामले का अंतिम निस्तारण सुनिश्चित करे. कोर्ट ने यह भी हिदायत दी है कि अब इस प्रक्रिया में किसी भी पक्ष को अनावश्यक स्थगन नहीं दिया जाना चाहिए.

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