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पत्नी को आत्महत्या के लिए उकसाने में दोषी ठहराया पति दोष मुक्त, हाईकोर्ट ने कहा- 'संदेह सबूत का स्थान नहीं ले सकता'

याचिकाकर्ता की पत्नी ने 2004 में आत्महत्या कर ली थी, सत्र न्यायालय ने पति को 7 साल के कारावास की सजा दी थी

KHATIMA WIFE SUICIDE CASE
नैनीताल हाईकोर्ट (File Photo- ETV Bharat)
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By ETV Bharat Uttarakhand Team

Published : February 24, 2026 at 8:18 AM IST

3 Min Read
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नैनीताल: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने अपनी पत्नी को आत्महत्या के उकसाने के आरोप में सत्र न्यायालय उधम सिंह नगर द्वारा दोषी ठहराए गए व्यक्ति को दोषमुक्त करार दिया है. हाईकोर्ट ने निचली अदालत का आदेश रद्द कर दिया है. यह मामला वर्ष 2011 से विचाराधीन था. मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति आशीष नैथानी की एकलपीठ में हुई.

आत्महत्या के लिए उकसाने में दोषी ठहराया गया पति दोष मुक्त: मामले के अनुसार अपीलकर्ता ने सत्र न्यायाधीश उधम सिंह नगर के 30 अगस्त 2011 के उस निर्णय को चुनौती दी थी, जिसमें उन्हें भारतीय दंड संहिता की धारा 306 के तहत दोषी ठहराते हुए सात वर्ष के कठोर कारावास और 10 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई थी.

पत्नी ने 2004 में की थी आत्महत्या: 15 सितंबर 2004 को खटीमा क्षेत्र में स्थित वैवाहिक घर में याचिकाकर्ता की पत्नी ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी. ट्रायल कोर्ट ने दहेज हत्या और क्रूरता के आरोपों से उसे बरी कर दिया था. लेकिन पत्नी के चरित्र पर संदेह और मानसिक प्रताड़ना को आधार बनाते हुए धारा 306 के तहत दोष सिद्धि कर दी थी.

हाईकोर्ट ने बरी किया: लेकिन उच्च न्यायालय ने साक्ष्यों का परीक्षण करते हुए पाया कि अभियोजन के गवाहों के बयान सामान्य और व्यापक प्रकृति के थे तथा आत्महत्या से ठीक पहले किसी विशेष उकसावे या प्रत्यक्ष कृत्य का प्रमाण रिकॉर्ड पर नहीं है. सत्र अदालत द्वारा दी गयी सजा को रद्द करते हुए उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने टिप्पणी की कि संदेह चाहे कितना भी मजबूत क्यों न हो, वह सबूत का स्थान नहीं ले सकता.

न्यायमूर्ति आशीष नैथानी ने यह टिप्पणी वर्ष 2004 में खटीमा में हुए आत्महत्या के एक मामले में सत्र अदालत के फैसले के खिलाफ दायर एक आपराधिक अपील पर सुनवाई के दौरान की. उच्च न्यायालय ने अपील पर सुनवाई के बाद अपीलकर्ता को भारतीय दंड सहिता की धारा 306 के तहत उन पर आत्महत्या के लिए उकसाने के लिए लगाए गए आरोपों से बरी कर दिया. अपीलकर्ता की पत्नी ने 15 सितंबर 2004 को अपने मायके में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में हत्या का कोई संकेत नहीं मिला.

सत्र न्यायालय ने 7 साल की सजा सुनाई थी: आरोप यह था कि पति को अपनी पत्नी के चरित्र पर शक था और उसने उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित किया, जिसके कारण उसने कथित तौर पर यह आत्मघाती कदम उठाया. ऊधमसिंह नगर की सत्र अदालत ने आरोपी को दहेज हत्या और दहेज उत्पीड़न के आरोप से बरी कर दिया था लेकिन आत्महत्या के लिए उकसाने के लिए दोषी ठहराते हुए सात साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई और दस हजार रुपये का जुर्माना लगाया था. फैसले के खिलाफ अपील दायर करते हुए अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि आत्महत्या से ठीक पहले किसी प्रत्यक्ष उकसावे या उत्तेजना का कोई सबूत नहीं मिला और न ही कोई आत्महत्या नोट बरामद हुआ. उसने दलील दी कि केवल वैवाहिक कलह या चरित्र के बारे में संदेह को उकसावा नहीं माना जा सकता.
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