फ्लोराइड के कहर की ग्राउंड रिपोर्ट: राजधानी के बेहद करीब व्हीलचेयर पर दम तोड़ रहे सपने, 1500 बच्चे झेल रहे दंश
जोबनेर, किशनगढ़-रेनवाल और सांभर क्षेत्र में पानी में फ्लोराइड की वजह से बच्चे दिव्यांगता के शिकार हो रहे हैं. पढ़िए विकास व्यास की ग्राउंड रिपोर्ट.

Published : July 8, 2026 at 8:10 PM IST
जयपुर: जो उम्र स्कूल जाने, खेलने-कूदने और माता-पिता का सहारा बनने की होती है, उस उम्र में अगर बच्चे घर के एक कमरे और चारपाई में कैद हो जाएं, तो उस माता-पिता पर क्या गुजरती होगी? जयपुर के जोबनेर, किशनगढ़ रेनवाल और सांभर पंचायत समिति के दर्जनभर गांवों में आज यही खौफनाक मंजर है. राजधानी जयपुर की चकाचौंध से महज एक घंटे की दूरी पर पानी में घुला फ्लोराइड का धीमा जहर एक पूरी पीढ़ी की जवानी और बच्चों का बचपन बेरहमी से निगल रहा है. सुदूर रेगिस्तान में पानी की किल्लत की तस्वीरें तो आपने बहुत देखी होंगी, लेकिन जोबनेर, सांभर और किशनगढ़-रेनवाल ब्लॉक के गांवों में ईटीवी भारत की ग्राउंड पड़ताल में एक ऐसा खौफनाक सच सामने आया है, जिसे देखकर आप चौंक जाएंगे.
कई बच्चे हुए दिव्यांग: इसी जहरीले पानी के कारण पढ़-लिखकर पैरों पर खड़ी होने की चाह रखने वाली 24 साल की अनीता आज घर की चारदीवारी में कैद होकर न ठीक से खड़ी हो पाती है और न बोल पाती है. यह त्रासदी कितनी भयावह है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि देवतवालों की ढाणी में एक ही परिवार के आठ मासूम बच्चे इस दिव्यांगता का शिकार होकर चारपाई पर सिमट गए हैं. 21 साल का आशीष जो अपने बूढ़े माता-पिता का सहारा बनना चाहता था, वह आज व्हीलचेयर का मोहताज है, वहीं 14 साल का अमित और 15 साल का आर्यन भी खेलने-कूदने की उम्र में एक अंधेरे कमरे के कैदी बन चुके हैं.
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क्षेत्र में 1500 बच्चे प्रभावित: आंकड़ों के मुताबिक इन तीन ब्लॉकों में करीब 1,500 लोग इस लाचारी का दंश झेल रहे हैं. मंडाभिमसिंह, लोहरवाड़ा, भैंसलाना, देसलाना और पचकोड़िया जैसे गांवों में बुजुर्ग कमरतोड़ दर्द से कराह रहे हैं तो बच्चे उम्र से पहले कूबड़े हो रहे हैं. सबसे शर्मनाक बात यह है कि जल जीवन मिशन के तहत यहाँ दो-दो बार कनेक्शन जोड़े गए, लेकिन नलों में बीसलपुर का मीठा पानी आज तक नहीं आया. यहां तक कि सार्वजनिक जगहों के पाइप भी गायब हो गए. कागजों में विकास की गंगा बह रही है, लेकिन जमीन पर ये 1,500 जिंदगियां आज भी घूंट-घूंट जहर पीने को मजबूर हैं.
एक ही परिवार में आठ बच्चे दिव्यांग: जयपुर जिले में जोबनेर की देवतवालों की ढाणी में एक ही परिवार में आठ बच्चे दिव्यांगता का शिकार हैं. इस परिवार की नर्मदा देवी बताती हैं कि उनके आठ पोते-पोती दिव्यांगता का शिकार हैं. इनमें 12 साल का पोता गगन, 11 साल का चकित, 14 साल का अमित, 13 साल का मोहित, 19 साल का सोनू, 25 साल का आशीष और 15 साल का आर्यन और 24 साल की अनीता शामिल हैं. गगन आठवीं में और चकित छठी में पढ़ता है. अमित, अनीता, आशीष और आर्यन घर पर ही रहते हैं, जबकि मोहित टोंक की स्पेशल स्कूल में और सोनू बीए की पढ़ाई कर रहा है.

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बेटा दिव्यांग, बेटी की दिमागी हालत कमजोर: इसी गांव की प्रेम देवी कुमावत का बेटा और बेटी दोनों दिव्यांगता का शिकार है. उनका बेटा आशीष 21 साल का है. उसे बचपन से ही दिव्यांगता ने घेर लिया. कुछ दिन स्कूल गया, लेकिन शरीर जवाब देने लगा तो पढ़ाई छूट गई. अब कमरे की चारपाई और व्हीलचेयर ही उसकी दुनिया है. उसकी 22 साल की बहन कांता भी दिमागी हालत ठीक नहीं है. जैसे-तैसे वह नवीं कक्षा तक पढ़ पाई. बाद में बीमार रहने लगी तो पढ़ाई छूट गई, अब वह भी घर पर ही रहती है. पति कारीगर हैं और जयपुर में काम करते हैं. प्रेम देवी घर के काम-काज के साथ अपने दोनों बच्चों की देखभाल करती है. आसपास के गांवों और ढाणियों में ऐसे कई परिवार हैं, जहां बच्चे और नौजवान दिव्यांगता का दंश झेल रहे हैं.
कमजोर आर्थिक स्थिति भी बनी चुनौती: जिस परिवार में आठ बच्चे दिव्यांग हैं, उनकी दादी नर्मदा देवी कहती हैं कि परिवार के माली हालात के बीच दिव्यांग बच्चों की देखभाल बड़ी चुनौती है, जो बच्चे पढ़ने जा सकते हैं, उन्हें पढ़ने भी भेज रहे हैं. कुछ स्वयंसेवी कार्यकर्ता मदद करते हैं. उनका कहना है कि बच्चों को डॉक्टरों के पास लेकर गए. देवी-देवताओं के भी चक्कर लगाए, लेकिन कहीं फायदा नहीं हुआ. हर तरह के प्रयास कर लिए, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ तो अब थक गए हैं. उन्होंने बताया कि जिसने जहां बताया, वहीं इलाज के लिए गए, लेकिन किसी भी बच्चे के कोई फायदा नहीं हुआ.

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दिव्यांगता प्रमाण पत्र के लिए चक्कर: गगन और चकित की मां विमला देवी कहती हैं कि उनके तीन बच्चे हैं. इनमें एक बेटी स्वस्थ हैं, जबकि दोनों बेटे दिव्यांग हैं. एक बच्चे के एक हाथ और एक पैर में दिव्यांगता का असर है. चलने-फिरने में दिक्कत आती है. दूसरा बेटा 11 साल का है, लेकिन उम्र के अनुपात में शरीर कमजोर है. उसका सीना बाहर झुक रहा है. एक आंख से कम दिखता है. खाने-पीने और दवाई का पूरा ध्यान रखते हैं, लेकिन शरीर की ग्रोथ नहीं हो रही. उनका कहना है कि एक बच्चे का दिव्यांगता प्रमाण पत्र बनने में भी परेशानी आ रही है. कई बार चक्कर लगाने के बाद भी प्रमाण पत्र नहीं बना. उनके पति भी एलर्जी की समस्या से जूझ रहे हैं, जिसके चलते मजदूरी पर भी नहीं जा पाते.
इलाज करवाया और मनौती भी मांगी: अनीता की मां संतोष देवी बताती हैं कि पांच साल उनकी बेटी पांच साल की थी, तभी से दिव्यांगता का शिकार है. डॉक्टरों से इलाज करवाया, देवी-देवताओं के भी लेकर गए, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. कई बार पूरे शरीर की जांच करवाई. फिलहाल, उसके हाथ पैर कम नहीं करते. शरीर स्थिर नहीं रह पाता है. संतोषी देवी कहती हैं कि जहां-जहां उम्मीद थी वहां-वहां गए, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. अब डॉक्टर सिर का ऑपरेशन करवाने की कह रहे हैं, जो काफी महंगा है और सिर का ऑपरेशन करवाने पर भी ठीक हो जाए इसकी उम्मीद कम है, इसलिए मन मारकर बैठ गए.

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बर्तनों में जम जाती है फ्लोराइड की परत: वे कहती हैं कि गांव के पानी में फ्लोराइड बहुत ज्यादा है. बर्तनों में पानी भरते हैं तो उनमें भी फ्लोराइड की परत जम जाती है. जानकार कहते हैं कि पानी में फ्लोराइड की मात्रा ज्यादा होने से भी शरीर पर इसका असर होता है. गांव में ट्यूबवेल का पानी ही पीने के काम में लेते हैं. दो बार कनेक्शन करने के बाद भी बीसलपुर का पानी नहीं आता है. गांवों में कई जगह मीठे पानी के सार्वजनिक नल भी लगाए गए हैं, लेकिन पानी नहीं आता. मजबूरी में कुओं और बोरिंग का फ्लोराइडयुक्त पानी पीना पड़ता है.
बेटा दिव्यांग, बेटी की दिमागी हालत कमजोर: इसी ढाणी की रहने वाली प्रेमदेवी की बेटी और बेटा दोनों दिव्यांग हैं. बेटा पूरी तरह दिव्यांग है, चल भी नहीं पाता. रोजमर्रा के काम के लिए भी किसी न किसी पर निर्भर है. घर का एक कमरा, चारपाई और व्हीलचेयर पर ही उसकी दुनिया सिमटकर रह गई है. उसकी देखभाल के लिए किसी न किसी को 24 घंटे उसके साथ ही रहना पड़ता है. उसकी हालत देखकर पूरा परिवार व्यथित रहता है. बेटी की दिमागी हालत ठीक नहीं है. जानकार कहते हैं कि पानी के कारण बच्चों का शरीर खराब हो रहा है. उनकी ढाणी में करीब दस बच्चे और युवा दिव्यांगता का शिकार हैं. उन्होंने फ्लोराइडयुक्त खारे पानी से निजात दिलाने की मांग की है.

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उम्र से पहले बूढ़े हो रहे लोग: गांव की महिला का कहना है कि गांव में खराब पानी आने के कारण लोगों के स्वास्थ्य पर इसका असर हो रहा है, जो बच्चे स्वस्थ हैं, उनके भी शरीर में दर्द रहता है. गांव में 40-50 साल के लोग भी 60-70 साल के दिखते हैं. घुटने में दर्द की शिकायत आम बात है. गांव में ज्यादातर लोग दवाओं के सहारे चल रहे हैं. उन्होंने सरकार से गुहार की है कि उन्हें फ्लोराइडयुक्त खारे पानी की समस्या से निजात दिलाई जाए. बीसलपुर का मीठा पानी जल्द से जल्द गांवों तक पहुंचाया जाए. ताकि फ्लोराइड के दुष्प्रभाव से आने वाली पीढ़ियों को बचाया जा सके.
कई गांवों में दिव्यांगों की संख्या बहुत ज्यादा: सामाजिक कार्यकर्ता राकेश यादव का कहना है कि सांभर, रेनवाल और जोबनेर के कई गांवों में दिव्यागों की संख्या बहुत ज्यादा है. इसमें 10-15 गांव ऐसे हैं जहां दिव्यांगता का असर सबसे ज्यादा है. उनकी संस्था 2009 से दिव्यांग बच्चों पर काम कर रही है. दिव्यांग बच्चों को घर-घर जाकर शिक्षा दी जाती है. विशेषज्ञ डॉक्टर्स की मदद से दिव्यागों को थैरेपी मुहैया करवाई जाती है. सरकार की योजनाओं से उन्हें जोड़ा जाता है. कई दिव्यागों और उनके परिजनों को सरकार की योजनाओं की जानकारी तक नहीं होती है. उन्हें योजनाओं की जानकारी देने और योजनाओं का फायदा पहुंचाने का काम भी उनकी संस्था कर रही है.

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पाइप लाइन बिछाई लेकिन पानी नहीं मिला: राकेश यादव का कहना है कि तीन ब्लॉक के 10-15 गांवों में करीब 1500 बच्चे और युवा दिव्यांगता का शिकार हैं. इसके पीछे फ्लोराइड युक्त पानी भी एक बड़ी वजह है. ज्यादातर आबादी पीने के पानी के लिए बोरिंग और कुओं पर ही निर्भर है. बीसलपुर का पानी नहीं मिल रहा है. नई पाइप लाइन तो बिछाई गईं, घरों में कनेक्शन भी कर दिए हैं लेकिन पानी नहीं आता. कई गांव ऐसे हैं जहां नल लग गए लेकिन एक बार भी पानी नहीं आया. कुछ जगह कई दिनों के अंतराल में पानी की सप्लाई आती है जो पर्याप्त नहीं होती.

फ्लोराइड की अधिकता से हड्डियों पर असर: जोबनेर अस्पताल के डॉक्टर सुनील यादव बताते हैं कि पानी में फ्लोराइड की अधिकता से शरीर पर कई नकारात्मक प्रभाव होते हैं. दांतों का पीलापन और है हड्डियां कमजोर होना, ऐसे प्रभाव हैं जो साफ देखे जा सकते हैं. पानी में फ्लोराइड की मात्रा 1.5 पीपीएम से ज्यादा होने पर शरीर में इसका गहरा असर होता है. जोड़ों का दर्द और उनमें टेढापन भी फ्लोराइड के असर से होता है.
ग्रामीण इलाकों में मिले पीने का साफ पानी: डॉक्टर का कहना है कि खेतों में रासायनिक खाद का प्रयोग और भूजल स्त्रोत में पानी गहराई में जाने के कारण फ्लोराइड की मात्रा लगातार बढ़ रही है. जितना पानी गहरा होता जाएगा उसमें फ्लोराइड की मात्रा बढ़ती जाएगी. यह पानी पीने से से आसपास के गांवों में दिव्यांगता का असर ज्यादा है. उनका कहना है कि बारिश के पानी को सहेजने के बड़े स्तर पर प्रयास किए जाएं. ग्रामीण इलाकों में पंचायतों को बारिश का पानी सहेजने के विशेष प्रयास करने चाहिए ताकि लोगों को पीने का साफ पानी मिल सके.

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