सवाई माधोपुर में 2.5 किलो के स्वर्ण मुकुट और 9 लक्खा हार से चौथ माता का शृंगार, झालावाड़ में 26 किलो के लड्डू का भोग
चौथ माता के वार्षिक मेले को लेकर कई जगहों पर विशेष आयोजन किए गए.

Published : January 6, 2026 at 4:50 PM IST
|Updated : January 6, 2026 at 5:25 PM IST
सवाई माधोपुर : जिले में स्थित चौथ का बरवाड़ा कस्बे में विराजमान चौथ माता मंदिर पर लगने वाला चार दिवसीय वार्षिक मेला मंगलवार को संकट चतुर्थी के अवसर पर पूरे परवान पर रहा. चौथ माता के दरबार में सुबह से ही श्रद्धा का सैलाब उमड़ता नजर आया. मेले में दूर-दराज से आने वाले लाखों श्रद्धालुओं ने माता के दर्शन कर अपनी और अपने परिवार की कुशलक्षेम की कामना की. मेले में आने वाले श्रद्धालुओं की भीड़ को देखते हुए पुलिस और प्रशासन की व्यवस्था चाक चौबंद नजर आई.
बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात : अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक विजय सिंह ने बताया कि मेले में आने वाले श्रद्धालुओं की सुरक्षा को लेकर मंदिर सहित मेला परिसर में सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं. मेले में तीन एडिशनल एसपी और आठ डिप्टी एसपी सहित कई अधिकारी लगे हुए हैं. यात्रियों की सहायता के लिए जगह-जगह हेल्प डेस्क लगाए गए हैं. मेला परिसर के नजदीक तालाबों पर गोताखोर लगाए गए हैं. साथ ही मेला परिसर में पुलिस अधिकारियों सहित बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात किया गया है.
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प्रवेश और निकास द्वार अलग-अलग : चौथ माता के वार्षिक मेले को लेकर आज संकट चतुर्थी पर माता के दरबार को सजाया गया. माता का आकर्षक शृंगार किया गया. मंदिर ट्रस्ट की ओर से माता को ढाई किलो वजनी र्स्वण मुकुट और नौ लक्खा हार से सजाया गया है. सुबह 5 बजे मंगला आरती के बाद छप्पन भोग की झांकी सजाई गई. मंदिर परिसर में जगमग सजावट की गई है. मंदिर में महिला व पुरुषों के प्रवेश और निकास द्वार अलग-अलग बनाए गए हैं. मेले में यात्रियों के उपचार के लिए चिकित्सकों की टीम भी तैनात की गई है.
माता मंदिर को लेकर कई किस्से : चौथ माता मंदिर के पुजारी शंकर लाल सैनी ने बताया कि चौथ माता मंदिर की स्थापना 1451 में यहां के तत्कालीन शासक भीमसिंह की ओर से की गई थी. 1463 में मंदिर मार्ग पर बिजल की छतरी और पहाड़ी की तलहटी में तालाब का निर्माण करवाया गया था. 16वीं शताब्दी में यह कस्बा चौहान वंश से मुक्त होकर राठौड़ वंश के अधीन आ गया था. इस वंश के शासकों में भी माता के प्रति गहरी आस्था थी. कहा जाता है कि राठौड़ वंश के शासक तेजसिंह राठौड़ ने 1671 में मुख्य मंदिर के दक्षिण हिस्से में एक तिबारा बनवाया था.

कुछ लोगों का मानना है कि चौथ माता मंदिर की स्थापना जयपुर राजघराने की ओर से कराई गई थी. जब राव माधोसिंह ने सवाई माधोपुर बसाया था. इसी दौरान यहां मंदिर भी बनवाया गया था, क्योंकि राव माधोसिंह माता को कुलदेवी के रूप में पूजते थे. कहा जाता है कि एक बार लड़ाई के दौरान मातेश्री नामक एक महिला के पति की मौत हो गई थी. महिला ने अपने पति के साथ सती होने की जिद की तो राव माधासिंह ने सती प्रथा पर रोक लगा दी. इस पर महिला ने माता के दरबार में गुहार लगाई कि उसे मौत दे दे या फिर पति को जीवनदान दें. इस पर माता ने महिला के पति को जीवनदान दिया. तभी से पूरे राजस्थान में महिलाएं माता के नाम से चौथ माता का व्रत, करवा चौथ का उपवास रखती हैं.

झालावाड़ में माता को 26 किलो तिल व गुड़ के लड्डू का भोग: शहर के सराफा मार्केट में स्थित चौथ माता मंदिर पर संकट चतुर्थी के मौके पर महिलाओं की अच्छी खासी भीड़ जुटी. इस दौरान मंदिर समिति की ओर से माता को प्रसन्न करने के लिए 26 किलो तिल व गुड़ के लड्डू का विशेष भोग लगाया गया. इस मौके पर मंदिर के अंदर मौजूद चौथ माता व गणेश की प्रतिमा का विशेष शृंगार किया गया. मंदिर के पुजारी सत्य प्रकाश शर्मा ने बताया कि हिंदू मान्यताओं के अनुसार संकट चतुर्थी तिल चौथ पर चौथ माता व गणेश की प्रतिमाओं का पूजन करने का विधान है. महिलाएं पति की दीर्घायु, परिवार में समृद्धि व बच्चों की उन्नति के लिए संकट चतुर्थी का व्रत करती हैं. ऐसे में इस दिन कई महिलाएं पूरे दिन उपवास करती हैं. माता का पूजन कर रात में चंद्रमा को अर्घ देकर भोजन ग्रहण करती हैं. इस दिन माता को तिल व गुड़ से बने व्यंजन का भोग लगाने का विधि विधान है.

