रंगों में रंगी राजस्थान की धरा: जैसलमेर की गलियों से पुष्कर के घाटों तक होली का उल्लास, डीडवाना में दिखा 'खास' नजारा
जैसलमेर की सुनहरी हवेलियों और पुष्कर के घाटों पर होली रंगों व गैर नृत्य से सजी, देसी-विदेशी पर्यटकों संग सांस्कृतिक उल्लास छाया रहा.

Published : March 3, 2026 at 1:44 PM IST
जैसलमर/अजमेर/डीडवाना: राजस्थान में होली सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि संस्कृति, परंपरा और आतिथ्य का वह रंग है जो देशी-विदेशी पर्यटकों को बांध लेता है. इस वर्ष भी प्रदेश के प्रमुख पर्यटन स्थलों- स्वर्ण नगरी जैसलमेर और तीर्थनगरी पुष्कर में यह पर्व भव्यता और अनूठी परंपराओं के साथ मनाया गया. वहीं, डीडवाना की अनूठी होली में गैर इतिहास परंपरा और संस्कृति का अद्भुत संगम दिखा.
राजस्थान की स्वर्णनगरी के नाम से विख्यात जैसलमेर में इस वर्ष होली का पर्व अनूठे अंदाज में मनाया गया. सुनहरी हवेलियों, ऐतिहासिक धरोहरों और लोकसंस्कृति से समृद्ध इस शहर में रंगों का त्योहार देसी-विदेशी मेहमानों के संग उल्लास और उमंग के साथ मनाया गया. प्रसिद्ध सोनार किला परिसर, गोपा चौक और अन्य प्रमुख स्थानों पर पर्यटकों की भारी भीड़ देखी गई. ढोल, नगाड़ों और चंग की थाप पर विदेशी सैलानी भी जमकर थिरके. रंगों की बौछार के बीच स्थानीय युवाओं ने उत्साह के साथ मेहमानों को गुलाल लगाया और शुभकामनाएं दीं.
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विदेशी सैलानियों का कहना है था कि जैसलमेर की होली उनके लिए सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति को आत्मसात करने का अवसर है. फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया और जर्मनी से आए पर्यटकों ने इसे अविस्मरणीय अनुभव बताया. फ्रांस से आई एक पर्यटक ने कहा कि यहां का अपनापन और लोगों की गर्मजोशी बेहद खास लगी. रंगों के बीच न कोई भेदभाव नजर आता है और न ही कोई दूरी सभी एक-दूसरे को गले लगाकर त्योहार मनाते हैं. ऑस्ट्रेलिया और जर्मनी से आए पर्यटकों ने कहा कि उन्होंने भारत की होली के बारे में बहुत सुना था, लेकिन जैसलमेर में इसे प्रत्यक्ष देखना और इसमें शामिल होना उनके लिए यादगार अनुभव बन गया. होली के अवसर पर शहर के होटल, गेस्ट हाउस और कैफे पर्यटकों से भरे नजर आए. रंगों के इस उत्सव ने न केवल जैसलमेर की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत किया, बल्कि स्थानीय पर्यटन उद्योग को भी नई ऊर्जा दी है.
पुष्कर; गैर नृत्य की थाप पर झूमे पर्यटक: अजमेर जिले की तीर्थनगरी पुष्कर में होली का उल्लास पारंपरिक गैर नृत्य के साथ शुरू हो गया. अंतरराष्ट्रीय पुष्कर पशु मेले की तरह यहां की होली भी देश-विदेश में प्रसिद्ध है. होली से आठ दिन पूर्व से प्रारंभ हुए इस नृत्य में स्थानीय युवाओं ने परंपरा को जीवंत रखा है.

वराह घाट चौक पर देर शाम से शुरू होने वाले इस गैर नृत्य में डीजे का शोर नहीं, बल्कि ढोल की मधुर थाप होती है, जो आपसी प्रेम और सांस्कृतिक एकता की झलक पेश करती है. होली की मस्ती में सराबोर होने से देशी-विदेशी पर्यटक भी अछूते नहीं रहे. पुष्कर की होली देश विदेश में काफी विख्यात है. यही वजह है कि होली से एक सप्ताह पहले ही सभी होटलों और रिसॉर्ट की बुकिंग हो जाते हैं. देसी विदेशी पर्यटक पहले से ही पुष्कर आ जाते हैं. ऐसे में गैर नृत्य विदेशी पर्यटकों में होली के उत्साह और उमंग को दुगना कर देता है. रात को करीब 2 घंटे तक गैर नृत्य होता है. आयोजन समिति के पदाधिकारी मौसम शर्मा ने बताया कि गैर नृत्य हमारी संस्कृति से जुड़ा नृत्य है. यह पारंपरिक नृत्य पुष्कर की संस्कृति का हिस्सा बन चुका है और पर्यटन को भी बढ़ावा दे रहा है. इसके आकर्षण से विदेशी भी अछूते नहीं हैं.

जोधपुर में मस्ती में दिखाई दी गैर की टोलियां: धुलंडी के मौके पर मंगलवार को जोधपुर में लोगों ने रंग खेला. हालांकि ग्रहण के चलते कई जगहों पर लोगों ने आज के बजाय बुधवार को रंग खेलने का कार्यक्रम तय किया है. भीतरी शहर सहित कई गली-मोहल्लों में गैर की टोलियां मस्ती में दिखाई दीं. हर जगह होली का हुड़दंग नजर आया. शहर में घूमने आए विदेशी मेहमान भी घंटाघर और भीतरी शहर में होली के रंग में नजर आए. विदेशियों ने जमकर होली खेली. देशी-विदेशी लोग एक-दूसरे के चेहरे पर गुलाल लगाते नजर आए. चंग भी बजाया गया. दूसरी ओर, शहर में कई जगहों पर बाजारों में दुकानें भी खुली हुई नजर आई. भीतरी शहर में शाम को शलिल गायन होगा. इस दौरान शहर में पुलिस की व्यवस्था चाक-चौबंद रखी गई है.

डीडवाना-कुचामन की अनूठी होली : आस्था और परम्पराओं के देश भारत में होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि विविध सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों का उत्सव भी है. हर क्षेत्र की अपनी अलग पहचान है, लेकिन राजस्थान के डीडवाना में माली समाज द्वारा निकाली जाने वाली पारंपरिक 'होली गैर' इस विविधता में सबसे अलग और अनूठी मानी जाती है. जेठाराम स्वांगधारी ने बताया कि सैकड़ों साल पुरानी यह परंपरा आज भी पूरे जोश और सम्मान के साथ निभाई जा रही है. माली समाज के बुजुर्गों द्वारा शुरू की गई इस गैर को नई पीढ़ी उसी शिद्दत से आगे बढ़ा रही है. यही कारण है कि डीडवाना की यह गैर आज शहर की विशेष पहचान बन चुकी है.

पूरे राजस्थान में अपनी तरह की यह इकलौती गैर है, क्योंकि यह परंपरा केवल डीडवाना में ही निभाई जाती है. धूलंडी के दिन माली समाज के 12 क्षेत्रों की ओर से अलग-अलग टीमें बनती हैं. हर टीम अपने खास स्वांग और वेशभूषा के साथ शहर भ्रमण करती है. इस गैर में बच्चों से लेकर युवा और बुजुर्ग तक बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं. कोई भगवान शंकर का रूप धरता है, तो कोई बाबा बागेश्वर बनता है. कहीं महाराणा प्रताप का वीर रूप नजर आता है, तो कहीं फिल्मी किरदार 'पुष्पा' और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की भी झलक दिखाई देती है. राम दरबार की झांकी से लेकर फकीर-मलंग तक, हर रूप में कलाकार लोगों का मनोरंजन करते हैं.

