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कुल्लू में हुआ होलिका दहन, भगवान रघुनाथ लाव लश्कर के साथ निकले मंदिर से बाहर

कुल्लू में कल साढ़े दस बजे होलिका दहन हुआ. होलिका दहन के साथ कुल्लू जिला में होली त्यौहार पूरा हुआ.

कुल्लू में होलिका का दहन
कुल्लू में होलिका का दहन (etv bharat)
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By ETV Bharat Himachal Pradesh Team

Published : March 4, 2026 at 1:41 PM IST

4 Min Read
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शिमला: देवभूमि कुल्लू जिला में भगवान रघुनाथ की नगरी सुल्तानपुर में बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक होलिका दहन बीती रात 10 बजे विधिवत पूजा अर्चना के साथ संपन्न हुआ. होलिका दहन के साथ कुल्लू जिला में होली त्यौहार पूरा हुआ. होलिका दहन पर भगवान रघुनाथ अपने मंदिर से लाव लश्कर के साथ रूपी पैलेस मैदान में पुहंचे, जहां पर मुख्य छड़ीबरदार महेश्वर सिंह और रघुनाथ के सेवकों ने फाग की विधिपूर्वक पूजा अर्चना की और होलिका के चारों ओर परिक्रमा के बाद होलिका दहन किया गया.

इस दौरान भगवान नरसिंह की भी पूजा अर्चना की गई. भगवान रघुनाथ के छड़ीबरदार महेश्वर सिंह ने विधिवत पूजा अर्चना कर प्राचीन परंपरा का निर्वहन किया और बैरागी समुदाय के लोगों ने पारंपरिक होली गीत भी गाए. होलिका दहन के उपरांत यहां सैंकड़ों की संख्या में पहुंचे श्रद्धालु लकड़ी और राख को अपने घरों में ले गए. मान्यता है कि लकड़ी और राख को घर में ले जाने से बुरी शक्तियों का नाश हो जाता है और घर में सुख समृद्वि रहती है.

हर साल निभाई जाती है होलिका दहन की परंपरा

भगवान रघुनाथ मुख्य छड़ीबरदार महेश्वर सिंह ने कहा कि 'कुल्लू में हर साल होलिका दहन की परंपरा निभाई जाती है और भगवान रघुनाथ अपने मंदिर से लाव लश्वर के साथ रूपी पैलेस मैदान में पहुचते हैं, जहां विधिवत पूर्जा अर्चना कर होलिका जलाई जाती है, इसके साथ ही कुल्लू में होली का त्योहार संपन्न हो जाता है.'

होलिका दहन से पहले कुल्लू में होती है होली

बता दें कि कुल्लू में बैरागी संप्रदाय कई सौ सालों से होली मनाता आ रहा है. देशभर में होली खेलने से पहले होलिका दहन होता है, लेकिन कुल्लू में होलिका दहन से पहले ही होली खेल ली जाती है, जिस दिन पूरा देश रंगों की होली खेलता है उससे एक दिन पहले ही कुल्लू में होली संपन्न हो जाती है. कुल्लू में लोगों ने 2 और 3 मार्च को होली का त्योहार मनाया था. कुल्लू के स्थानीय निवासी राजिंदर शर्मा ने बताया कि ' कुल्लू में होली खेलने के बाद होलिका दहन परपंरा जीवित है और यहां पर 2 स्थानों पर होलिका दहन होता है. एक रघुनाथ की होलिका दहन और दूसरी भगवान नरसिंह जी का होलिका दहन, इसके बाद यहां पर जो आग जलती है उसकी आग की चिगांरी घर ले जाने से शुभ माना जाता है.

40 दिन तक होली मनाता है बैरागी समुदाय

महंत समुदाय के सदस्य खेम दास महंत ने कहा कि 'होली का त्योहार बैरागी समुदाय बसंत उत्सव से ही मनाना शुरू कर देते हैं और 40 दिनों तक कुल्लू जनपद में बैरागी समुदाय होली खेलते . होलिका दहन में होलिका के लिए जो ध्वजा लगायी जाती है उसे भी बैरागी समुदाय के लोग निकालते हैं और उसके बाद भगवान हनुमान के मंदिर रामशिला में स्थापित करते हैं. होलिका दहन बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है और ऐसे में होलिका दहन की जो अग्नि और राख ले जाना शुभ माना जाता है, इसलिए लोग जलती हुई अग्नि और राख अपने घरों को ले जाते हैं जिससे सुख समृद्धि आती है.'

बता दें कि जिला कुल्लू में होली का त्योहार बसंत पंचमी से शुरू हो जाता है. मान्यता है कि होलाष्टक के आठ दिनों तक बैरागी समुदाय के लोग प्रतिदिन शाम को भगवान रघुनाथ के मंदिर जाते हैं, वहां होली के गीत गाकर भगवान को पवित्र गुलाल अर्पित करते हैं. इस दौरान भगवान रघुनाथ के छड़ी बरदार महेश्वर सिंह भी विशेष रूप से मौजूद रहते हैं. यह परंपरा सैकड़ों साल पुरानी है और आज भी इसका पालन किया जा रहा है. माना जाता है कि बैरागी समुदाय भगवान रघुनाथ के आगमन के साथ कुल्लू आया था, तब से यह समुदाय बसंत पंचमी से होली मनाना शुरू करता है और अयोध्या, ब्रज और अवध की पारंपरिक शैली में होली के गीत गाता है. ये गीत अयोध्या और ब्रज भूमि से ही आए हैं. 40 दिन तक ये सिलसिला चलता रहता है.

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