होली पर 3 मार्च को बंद रहेगा भगवान रघुनाथ मंदिर, ब्रज जैसे सैकड़ों सालों से परंपरा निभा रहा बैरागी समुदाय
होली पर भगवान रघुनाथ मंदिर दोपहर 3 बजे से शाम 7 बजे तक दर्शन नहीं होंगे. कुल्लू के मंदिरों में गूंज रहे होली के गीत.

By ETV Bharat Himachal Pradesh Team
Published : February 27, 2026 at 4:58 PM IST
कुल्लू: होली का त्योहार न केवल वसंत ऋतु के आगमन का प्रतीक है, बल्कि बुराई पर अच्छाई की जीत और प्रेम एवं एकता के उत्सव का भी प्रतीक है. इस त्योहार को लेकर देश भर में लोगों में खासा उत्साह देखने को मिल रहा है. जिला कुल्लू में 2 मार्च को छोटी होली का आयोजन किया जाएगा और 3 मार्च को बड़ी होली मनाई जाएगी. ऐसे में जिला कुल्लू के मुख्यालय रघुनाथपुर में भगवान रघुनाथ का मंदिर 3 मार्च को दोपहर 3:00 बजे से लेकर शाम 7:00 बजे तक बंद रहेगा.
3 मार्च को होली पर बंद रहेगा भगवान रघुनाथ का मंदिर
भगवान रघुनाथ के कारदार दानवेंद्र सिंह ने बताया कि, "3 मार्च को चंद्र ग्रहण है. चंद्र ग्रहण के चलते 4 घंटे तक भगवान रघुनाथ के मंदिर रहेंगे. इस अवधि में श्रद्धालुओं को भगवान के दर्शन नहीं होंगे. 3 मार्च को सुबह से लेकर 3:00 बजे तक श्रद्धालु मंदिर में भगवान के दर्शन कर सकते हैं और भगवान रघुनाथ को गुलाल में चढ़ा सकते हैं. उसके बाद मंदिर को बंद कर दिया जाएगा. शाम 7:00 बजे मंदिर खोला जाएगा और वहां पर शुद्धिकरण की प्रक्रिया को पूरा किया जाएगा."
कारदार दानवेंद्र सिंह ने बताया कि शाम 7 बजे के बाद अगर कोई श्रद्धालु भगवान रघुनाथ के दर्शन के लिए आना चाहता है तो वह मंदिर में होली लगे हुए कपड़ों के साथ प्रवेश न करें और न ही वह मंदिर में रंग चढ़ाए. श्रद्धालु घर से नहा कर साफ कपड़े पहन कर भगवान रघुनाथ के दर्शनों के लिए आ सकता है. वहीं, रात के समय भगवान रघुनाथ अपनी पालकी में बैठकर मंदिर से बाहर आएंगे और होलिका दहन की सारी विधियों को भी पूरा किया जाएगा.
कुल्लू के मंदिरों में गूंज रहे होली के गीत
देश भर में होली का त्योहार 4 मार्च को धूमधाम से मनाया जाएगा तो वही उत्तर प्रदेश के वृंदावन, मथुरा, ब्रजभूमि में होली की धूम शुरू हो गई है. वहीं, ब्रज की तर्ज पर ही हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिला में भी होली के गीत मंदिरों में गूंज रहे हैं और भगवान रघुनाथ के साथ आए बैरागी समुदाय के लोग आज भी सैंकड़ो साल पुरानी इस परंपरा का निर्वाह कर रहे हैं. जिला कुल्लू में बसंत पंचमी से ही होली की शुरुआत हो जाती है. बसंत पंचमी के दिन बैरागी समुदाय के लोगों के द्वारा भगवान रघुनाथ पर गुलाल छिड़का जाता है और उसके बाद 40 दिनों तक ब्रज और अवध की बोली में होली के गीत गाए जाते हैं. ऐसे में जिला कुल्लू में 2 मार्च को छोटी होली तथा 3 मार्च को बड़ी होली मनाई जाएगी. वहीं, होलाष्टक के शुरू होने से ही बैरागी समुदाय के लोग विभिन्न मंदिरों में जाकर होली के गीत गा रहे हैं और भगवान रघुनाथ के मंदिर में भी गुलाल छिड़क कर ब्रज की भाषा में गीत गाकर पुरानी परंपरा का पालन कर रहे हैं.

सैकड़ों सालों से परंपरा निभा रहा बैरागी समुदाय
जिला कुल्लू में बसंत पंचमी के त्योहार से ही होली का उत्सव शुरू हो जाता है. यह उत्सव बैरागी समुदाय के द्वारा मनाया जाता है और आज भी इस परंपरा का पालन किया जा रहा है. बसंत पंचमी से ही रोजाना शाम को होली के गीत गूंजना शुरू हो जाते हैं और होलाष्टक से भगवान रघुनाथ के मंदिर में होली गायन शुरू होता है. बैरागी समुदाय के लोग एक दूसरे के घरों और मंदिरों में जाकर होली मनाते हुए गुलाल उड़ाते हैं और होली के गीत गाते हैं. इसके अलावा कुल्लू में बैरागी समुदाय के लोग एक अनोखी होली परंपरा को संजोए हुए हैं.
बड़ों के मुंह और सिर में नहीं लगाते गुलाल
इस समुदाय के लोग अपने से बड़ों के मुंह और सिर में गुलाल नहीं लगाते. बल्कि वे रिश्तों की मर्यादाओं का सम्मान करते हुए बड़ों के चरणों में गुलाल फेंकते हैं और उनकी उम्र से बडे़ लोग छोटे व्यक्ति के सिर पर गुलाल फेंक कर आशीर्वाद प्रदान करते हैं. जबकि हम उम्र के लोग एक दूसरे के मुंह पर गुलाल लगाते हैं और इस उत्सव को मनाते हैं. लिहाजा, बैरागी समुदाय के लोगों द्वारा मनाई जाने वाली यह होली रिश्तों की अहमियत से काफी मायने रखती है.

भगवान रघुनाथ के साथ अयोध्या से कुल्लू आया था समुदाय
भगवान रघुनाथ की मूर्ति जब अयोध्या से कुल्लू लाई गई तो उस पूरे इलाके में रहने वाले बैरागी समुदाय के लोग भी भगवान रघुनाथ के पीछे-पीछे कुल्लू आ गए. ऐसे में अयोध्या में भगवान रघुनाथ तथा भगवान कृष्ण से संबंधित जितने भी त्यौहार हैं. वह भी कुल्लू में मनाए जाने लगे और कुल्लू में वैष्णव धर्म का खूब प्रचार हुआ. ऐसे में बैरागी समुदाय के लोग होली के अलावा भी भगवान श्री राम तथा भगवान कृष्ण को समर्पित सभी त्योहार यहां धूमधाम से मनाते हैं और भगवान रघुनाथ के मंदिर में इन सभी पुरानी परंपराओं का पालन किया जाता है.
बसंत पंचमी से होली उत्सव की शुरुआत
जिला कुल्लू के मुख्यालय ढालपुर में बसंत पंचमी के अवसर पर भगवान रघुनाथ की रथ यात्रा रघुनाथपुर से निकलती है तो वहां से हनुमान का वेश धारण किए हुए बैरागी समुदाय का व्यक्ति लोगों पर गुलाल डालना शुरू कर देता है. इसके बाद पैदल यात्रा रथ मैदान पहुंचती है. जहां पर रथ में विराज कर भगवान रघुनाथ अपने अस्थायी शिविर पहुंचते हैं. इस रथ को रस्सियों से खींचकर अस्थायी शिविर तक लाया जाता है. इस दौरान जिस पर यह गुलाल गिरता है, वह शुभ माना जाता है. उसके बाद भगवान रघुनाथ की पूजा अर्चना और भरत मिलाप होने के बाद भगवान रघुनाथ से लोग आशीर्वाद प्राप्त करते हैं और शाम को रघुनाथ जी वापस रघुनाथपुर चले जाते हैं.

ब्रज के तर्ज पर मनाई जाती है होली
बैरागी समुदाय से जुड़े लोगों का कहना है कि, उनकी यह होली ब्रज में मनाई जाने वाली होली की तर्ज पर होती है. ब्रज की भाषा में होली के गीत वृंदावन के बाद कुल्लू घाटी में ही गूंजते हैं. परंपरागत इन गीतों को गाते हुए यह समुदाय 40 दिनों तक इस होली उत्सव को मनाता है. होली के इन गीतों को रंगत देने के लिए बैरागी समुदाय के लोग डफली और झांझ आदि पारंपरिक साज का इस्तेमाल करते हैं. इन साजों का प्रयोग भी सिर्फ ब्रज में ही होता है.

बसंत पंचमी से मंदिरों में गाए जा रहे ब्रज के गीत
इस समुदाय द्वारा मनाई जाने वाली यह होली भगवान रघुनाथ से भी जुड़ी हुई है. इसके अलावा इस होली का संबंध नग्गर के झीड़ी और राधा कृष्ण मंदिर नग्गर ठावा से भी है. यहां पर इस समुदाय के गुरु पयहारी बाबा रहते थे और उन्हीं की याद में इस समुदाय के लोग टोली बनाकर नग्गर के ठावा और झीड़ी में जाकर भी होली के गीत गाते हैं. बैरागी समुदाय के लोग हर साल उनके तपोस्थली में होली से एक दिन पहले जाते हैं और पूरा दिन होली के गीत गाकर उनका आशीर्वाद लेते हैं.
मथुरा, वृंदावन, अवध से आए थे बैरागी समुदाय के लोग
कुल्लू के साहित्यकार डॉक्टर सूरत ठाकुर का कहना है कि, "बैरागी समुदाय के लोग मथुरा, वृंदावन, अवध से यहां आए थे. इसलिए होली पर अवधी भाषा में ही ज्यादा गीत गाए जाते हैं.ठावा मंदिर में भी होली गायन किया जाता है और 1653 से लगातार इसका निर्वाहन किया जा रहा है. भगवान रघुनाथ जी के कुल्लू आगमन से ही बसंत पंचमी के साथ होली महोत्सव शुरू हो जाता है. आज भी लोग पुरातन संस्कृति को संजोए हुए हैं. बैरागी समुदाय के लोग होली से आठ दिन पहले भगवान रघुनाथ के मंदिर में आकर होली गीत गाते हैं."
मंदिर में होलाष्टकों के दौरान होली का विशेष महत्व
भगवान रघुनाथ मंदिर के पुजारी दिनेश किशोर ने बताया कि, मंदिर में होलाष्टकों के दौरान होली का विशेष महत्व रहता है. ऐसे में संध्या आरती के समय बैरागी समुदाय भगवान रघुनाथ को होली गीत सुनाने के लिए आता है. साथ ही होलाष्टक के दौरान द्वादशी तिथि पर मंदिर में भगवान रघुनाथ कमलासन और विराजमान होकर बैरागी समुदाय के लोगों को विशेष दर्शन देते है. जबकि यहां होलिका दहन के अगले दिन मंदिर में विशेष पूजा होती है, जहां बैरागी समुदाय के द्वारा साल की अंतिम होली भगवान रघुनाथ को सुनाई जाती है. ऐसे में आज भी यहां होली की परंपराएं निभाई जा रही है.
कुल्लू में मनाई जाने वाली होली की अपनी अलग परंपरा
"कुल्लू जिले में मनाई जाने वाली होली की अपनी अलग परंपरा और विशेष महत्व है. यहां होलाष्टक के दौरान बैरागी समुदाय भगवान रघुनाथ के दरबार में हाजिरी लगाते हैं और होली के गीत गाते हैं. ऐसे में आज भी यहां बैरागी समुदाय के द्वारा होली के पारम्परिक गीतों को गाया जाता है. उन्होंने बताया कि बैरागी समुदाय की इस विशेष होली की शुरुआत बसंत पंचमी के साथ ही शुरू हो जाती है. ऐसे में 40 दिनों तक लोग रघुनाथ मंदिर में होली गाने आते है. साथ ही इस दौरान अपने समुदाय के लोगों के साथ घरों और मंदिरों में होली के गीत गए जाते है. आज भी ब्रज और अवध की बोली में लिखी होलिया पारंपरिक वाद्य यात्रों की थाप पर गए जाते है." - एकादशी महंत, बैरागी
40 दिनों तक मनाई जाती है होली
बैरागी समुदाय से संबंध रखने वाले श्यामसुंदर महंत का कहना है कि, "हमारी होली ब्रज की होली की तरह ही यहां पर 40 दिनों तक मनाई जाती है. हमारे पूर्वज भगवान रघुनाथ के साथ-साथ ही कुल्लू आए थे. ऐसे में पूर्वजों के द्वारा भगवान श्री राम के साथ-साथ भगवान कृष्ण से संबंधित सभी त्योहार भी धूमधाम से मानते थे. क्योंकि मानना है कि भगवान राम और भगवान कृष्ण एक ही है और दोनों ही भगवान विष्णु के अवतार हैं. ऐसे में बैरागी समुदाय की होली इन दिनों कुल्लू में धूमधाम से मनाई जा रही है."
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