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यहां होलिका दहन पर निभाई जाती है अनोखी परंपरा, चांदी की होलिका और सोने के प्रहलाद की होती है पूजा

भीलवाड़ा के हरणी गांव में होलिका दहन नहीं की जाती. इस दिन अनोखी परंपरा निभाई जाती है.

होलिका दहन पर अनोखी परंपरा
होलिका दहन पर अनोखी परंपरा (ETV Bharat (File Photo))
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By ETV Bharat Rajasthan Team

Published : March 1, 2026 at 1:48 PM IST

3 Min Read
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भीलवाड़ा : देश भर में धूमधाम से होलिका दहन किया जाता है, लेकिन भीलवाड़ा शहर के हरणी गांव में लगभग 70 वर्ष पूर्व आग लगने के बाद होलिका दहन ना करके अनोखे तरीके से पूजा अर्चना की जाती है. इस बेहद अनोखी और खास परंपरा के कारण इसे अन्य गांव से अलग बना दिया है और इसी खास परंपरा के चलते अब इस गांव की ख्याति दूर-दूर तक हो चुकी है. इस गांव में होली पर सोने के बने भक्त प्रहलाद को चांदी से बनी होलिका की गोद में बैठाते हैं और फिर मंत्रोचार सभी रस्मों रिवाज के साथ पूजा संपन्न होती है, जिसमें पूरा गांव एकत्रित होता है.

भीलवाड़ा शहर के पास स्थित हरणी गांव में लगभग 65 वर्ष पहले होलिका दहन के समय भीषण आग लग गई थी और इसके कारण पूरे गांव में विवाद हो गया. इसी विवाद के कारण गांव वालों ने तय कर लिया कि अब हम होली पेड़ काटकर नहीं मनाएंगे. इसके बाद ग्रामीणों ने तय किया कि सामूहिक रूप से चंदा एकत्रित करते हुए सोने का प्रहलाद और चांदी की होलिका बनाकर होली का त्योहार मनाने की एक अनूठी परंपरा शुरू कर दी, जो आज भी बदस्तूर जारी है. होलिका दहन के दिन हरणी गांव में सभी ग्रामीण गांव के बीच स्थित चारभुजा मंदिर पर एकत्रित होते हैं और फिर ढोल-नगाड़ों के साथ सोने के प्रहलाद और चांदी की होलिका की शोभा यात्रा गांव में निकाल कर होलिका दहन स्थल तक ले जाते हैं. वहां मंगल गीत गाते हुए पूजा करके फिर वापस मंदिर में लाकर स्थापित कर देते हैं.

होलिका दहन पर निभाई जाती है अनोखी परंपरा (वीडियो ईटीवी भारत भीलवाड़ा)

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सालों पहले से चली आ रही परंपरा : सोहनलाल तेली और घीसालाल जाट ने कहा कि हरणी कलां गांव में लगभग 65 वर्ष पहले होलिका दहन के दौरान कई बार आगजनी की घटनाएं हो जाती थी. इससे खेतों की फसल, बाड़ों और पशुओं को नुकसान होता था और गांव में आपसी विवाद भी बढ़ जाते थे. तब गांव के पंच-पटेल और बुजुर्गों ने मंदिर में बैठक कर स्थायी समाधान खोजने का निर्णय लिया. विचार-विमर्श के बाद तय हुआ कि होलिका दहन के स्थान पर होली की पूजा की परंपरा शुरू की जाए, ताकि किसी प्रकार की आगजनी और पर्यावरण को नुकसान न हो.

सोने के भक्त प्रहलाद
सोने के भक्त प्रहलाद (ETV Bharat (File Photo))

इसके बाद ग्राम वासियों ने मिलकर चंदा एकत्र किया और लगभग 500 ग्राम चांदी से चांदी की होलिका और 10 ग्राम सोने से सोने के वक्त प्रहलाद बनाएं. तभी से हर वर्ष चारभुजानाथ मंदिर से गाजे-बाजे के साथ पूरे गांव की भव्य शोभायात्रा निकलती है और होली के ठाण (स्थल) पर विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है और फिर सम्मानपूर्वक वापस मंदिर में स्थापना कर दी जाती है. इस अनूठी परंपरा से गांव में शांति, सौहार्द और पर्यावरण संरक्षण बना हुआ है. हम अपने बुजुर्गों के इस दूरदर्शी निर्णय पर गर्व महसूस करते हैं. मंदिर पुजारी गोपाल लाल शर्मा ने कहा कि हमारा हरणी कलां गांव अपनी अनूठी परंपरा के लिए जाना जाता है, जहां चांदी की होली और सोने के प्रहलाद का पूजन किया जाता है. इस पहल से आग से होने वाले नुकसान से बचाव, पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण रोकने का संदेश दिया जाता है. बाहर से लोग भी इस अनूठी परंपरा को देखने आते हैं.

ढोल-बाजे के साथ निकालते हैं शोभायात्रा
ढोल-बाजे के साथ निकालते हैं शोभायात्रा (ETV Bharat (File Photo))