होली के धधकते अंगारों पर चले कोकापुरवासी, ढोल-नगाड़ों के साथ होलिका की पूजा के बाद निभाई गई परंपरा
डूंगरपुर में होलिका दहन के अगले दिन अनोखी परंपरा निभाई गई, जो सदियों से चली आ रही है.

Published : March 3, 2026 at 10:16 AM IST
डूंगरपुर : जिले के कोकापुर गांव के लोग होलिका दहन के दूसरे दिन सुबह होली के धधकते अंगारों पर चले. होली माता की पहले पूजा-अर्चना की. ढोल धमाकों के साथ होली दर्शन के बाद गांव के युवा और बुजुर्ग सभी होली के धधकते अंगारों पर नंगे पैर ही चहलकदमी करते रहे. इस दौरान लोग होली माता के जयकारे लगाते रहे.
रंगों का त्योहार होली देशभर में अपने ही अनूठे अंदाज में मनाया जाता है. इसी तरह की बरसों पुरानी परंपरा को प्रदेश के आदिवासी बहुल डूंगरपुर जिले के कोकापुर गांव के लोग आज भी निभा रहे हैं. मंगलवार तड़के से ही कोकापुर गांव के लोग ढोल कुंडी के साथ गांव के होली चौक पर इकट्ठे हुए. गांव के हनुमान मंदिर और शिव मंदिर में लोगों ने दर्शन और पूजा अर्चना की. इसके बाद लोग नजदीक ही होली चौक पर ढोल कुंडी की थाप पर गैर खेलते हुए पहुंचे.
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लोगों ने होली की धधकती आग में श्रीफल भेंट किया जो पलभर में जल गया. लोगों ने होलिका से धधकते अंगारों पर चलने के लिए प्रार्थना की, फिर ढोल कुंडी के साथ ही जयकारे लगाते हुए गांव के युवा और बुजुर्ग नंगे पैर ही गुजरने लगे. गांव की जलती होली के अंगारों पर नंगे पैर चलकर पुरानी मान्यताओं को पूरा किया जाता है. गांव में मान्यता है कि होलिका दहन के बाद धधकते अंगारों पर चलने से गांव में कोई भी आपदा नहीं आती है. गांववासियों का स्वास्थ्य भी ठीक रहता है. इसी परंपरा को देखने आसपास के कई गांव के लोगों कोकापुर पहुंचे.
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भीलवाड़ा में की गई पूजा : भीलवाड़ा जिले के हरणी गांव में होलिका पर दशकों पुरानी परंपरा निभाई गई. शुभ मुहूर्त में हरणी गांव में चांदी की होलिका और सोने के भक्त प्रह्लाद की पूजा अर्चना कर परंपरा का निर्वहन किया गया. हरणी निवासी पूर्व पार्षद शंकर लाल जाट ने कहा कि करीब 70 साल पहले होलिका दहन के दौरान गांव में भीषण आग लग गई थी, जिससे भारी नुकसान हुआ और ग्रामीणों में विवाद की स्थिति पैदा हो गई. इस दुखद घटना के बाद गांव वालों ने एक बड़ा निर्णय लिया कि अब से वे पारंपरिक रूप से पेड़ काटकर होलिका दहन नहीं करेंगे. इसकी जगह सोने के प्रह्लाद और चांदी की होलिका की पूजा की परंपरा शुरू हुई.

होलिका दहन के दिन गांव के लोग चारभुजा मंदिर में एकत्रित हुए. यहां से ढोल-नगाड़ों की थाप और नाचते-गाते हुए ग्रामीण सोने के प्रह्लाद और चांदी की होलिका की भव्य शोभायात्रा निकाली गई. यह शोभायात्रा पूरे गांव का भ्रमण करते हुए तय स्थल तक पहुंची, जहां पूजा के बाद प्रतिमाओं को वापस मंदिर में लाकर स्थापित कर दिया गया.

