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चंग की थाप और फाग के सुरों से महकने लगी सूर्यनगरी, पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा आज भी है जिंदा, गुजरात तक है डिमांड

​जोधपुर में होली की दस्तक के साथ ही चंग और फाग की गूंज शुरू हो गई है. पारंपरिक चंग का क्रेज और कारोबार बरकरार है.

बजने लगी चंग की थाप
बजने लगी चंग की थाप (फोटो ईटीवी भारत जोधपुर)
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By ETV Bharat Rajasthan Team

Published : February 27, 2026 at 1:53 PM IST

4 Min Read
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मनोज वर्मा, जोधपुर :​ ​प्रदेश में होली का खुमार चढ़ने लगा है. जैसे-जैसे फाल्गुन का महीना परवान चढ़ रहा है, शहर की तंग गलियों से लेकर चौराहों तक 'चंग' की मधुर थाप सुनाई देने लगी है. आधुनिक मनोरंजन के तमाम साधनों और लाउडस्पीकरों के शोर के बीच आज भी मारवाड़ की पारंपरिक 'चंग' अपनी चमक बिखेर रही है.

​भीतरी शहर में सजने लगी फाग की महफिलें : जोधपुर के भीतरी शहर की बात ही कुछ निराली है. यहां के चौक और तिबारियों पर युवाओं की टोलियां देर रात तक फाग (होली के गीत) गाती नजर आ रही हैं. रात 8 बजे से शुरू होने वाला यह सिलसिला आधी रात तक चलता है. सिर्फ युवा ही नहीं, बल्कि मंदिरों में महिलाएं भी चंग की थाप पर फाग और भजन कीर्तन कर रही हैं. विशेष रूप से कृष्ण मंदिरों में 'होरियों' का दौर शुरू हो चुका है, जहां भक्ति और मस्ती का अनूठा संगम देखने को मिल रहा है.

फाग की गूंज से बिखर रही होली की खनक (वीडियो ईटीवी भारत जोधपुर)

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​बदलते दौर में चंग का नया अवतार : भले ही समय बदल गया हो, लेकिन चंग की मांग कम नहीं हुई है. शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों के लोग आज भी होली के मौके पर चंग का उपयोग करते हैं. हालांकि शहरों के मुकाबले गांवों में क्रेज ज्यादा हैं. चंग की थाप के साथ अब खुद मजीरे भी बजाए जाते हैं. जितेंद्र चौहान ने बताया कि हमने इस बार चंग के साथ ही मजीरे लगा दिए हैं. जो थाप के साथ खनकते हैं. चंग की थाप और उस पर होने वाला नृत्य, होली की मस्ती को और भी बढ़ा देता है. चंग की आवाज के बिना राजस्थान की पारंपरिक होली अधूरी मानी जाती है. चंग निर्माता संजय ने बताया कि ग्राहकों को लुभाने के लिए इस बार चंग पर खूबसूरत 'रंगोली' उकेरी गई है. वहीं, जितेंद्र चौहान ने बताया कि अब चंग के साथ 'मजीरे' भी जोड़ दिए गए हैं, जिससे थाप के साथ एक खनकती हुई आवाज आती है, जो नृत्य और गायन के आनंद को दोगुना कर देती है. उन्होंने बताया कि हमारा परिवार पांच पीढियों से इसका निर्माण करता आया हैं.

चंग की डिमांड
चंग की डिमांड (फोटो ईटीवी भारत GFX)
डफली का बड़ा रुप होता है चंग
डफली का बड़ा रुप होता है चंग (फोटो ईटीवी भारत GFX)

​कला को जिंदा रखे हैं ये 10 परिवार : जोधपुर में करीब 10 ऐसे परिवार हैं जो दशकों से इस लुप्त होती कला को संजोए हुए हैं. ये कलाकार साल भर ढोलक, तबला और ढोल बनाते हैं, लेकिन होली के सीजन में इनका पूरा ध्यान चंग पर होता है. जितेंद्र चौहान ने बताया कि चंग बनाने के लिए मुख्य रूप से आम की लकड़ी का घेरा इस्तेमाल किया जाता है. पहले ये केवल चमड़े (खाल) से बनते थे, लेकिन अब कई जगहों पर शुद्धता और पसंद के आधार पर 'प्लास्टिक शीट' वाले चंग भी बनाए जा रहे हैं.

चंग का क्रेज और कारोबार बरकरार
चंग का क्रेज और कारोबार बरकरार (फोटो ईटीवी भारत जोधपुर)

जोधपुर में बने चंग की धाक सिर्फ राजस्थान तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां से भारी मात्रा में चंग गुजरात के विभिन्न शहरों में भेजे जाते हैं. एक सीजन में करीब 2500 से 3000 चंगों की बिक्री हो जाती है. इनकी कीमत 900 रुपये से शुरू होकर 2500 रुपये तक जाती है, जो चंग के आकार और उस पर की गई नक्काशी पर निर्भर करती है. अक्सर लोग चंग और डफली को एक ही समझ लेते हैं, लेकिन इनमें बड़ा अंतर है. डफली आकार में छोटी (लगभग 1 फीट) होती है और इसका घेरा स्टील का होता है. इसके विपरीत, चंग का व्यास 2 से ढाई फीट तक होता है और इसका घेरा पूरी तरह लकड़ी का बना होता है, जो इसे एक खास गूंज प्रदान करता है.

आधुनिकता के बावजूद पारंपरिक चंग का क्रेज
आधुनिकता के बावजूद पारंपरिक चंग का क्रेज (फोटो ईटीवी भारत जोधपुर)

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​महाशिवरात्रि से शीतलाष्टमी तक का सफर : जोधपुर में चंग बजाने की शुरुआत महाशिवरात्रि से ही हो जाती है, जो धुलंडी तक चलती है. इसके बाद शीतलाष्टमी (शील पूजन) पर निकलने वाली 'गैर' में भी चंग का प्रमुख स्थान होता है. इसके साथ ही, भीतरी शहर में 'श्लील गायन' की परंपरा भी जोरों पर है, जिसके लिए अलग-अलग पार्टियां अपनी विशेष थीम पर महीनों पहले से रिहर्सल शुरू कर देती हैं.

जोधपुर की गलियों में गूंजने लगी चंग की थाप
जोधपुर की गलियों में गूंजने लगी चंग की थाप (फोटो ईटीवी भारत जोधपुर)