फाग, राग और गालियां...गुम हुई बनारस की फगुआ परंपरा; वक्त ने कैसे बदल दिया होली का रंग
वरिष्ठ पत्रकार हिमांशु राज बताते हैं कि बनारस की होली खेलने के लिए लोग पूर्वांचल के अलग-अलग हिस्सों से आते थे.

By ETV Bharat Uttar Pradesh Team
Published : March 3, 2026 at 7:10 AM IST
वाराणसी: काशी का फाग, ढोल-नगाड़ों की थाप पर होरियारों का राग, यह संयोग कुछ ऐसा बनता था कि होली का लोग बरस भर बेसब्री से इंतजार करते थे. अब जमाना बदल गया है. न वह फाग रहा, न फगुआ गाने वालों की टोली रही.
बनारस में तो होली पर गालियों की ऐसी परंपरा रही कि शहर के बड़े-बड़े धनाड्य लोग गालियां सुनने के लिए बैठे रहते थे कि कब होरियारे आएंगे और गरियाएंगे. यह परंपरा अब लुप्त हो चली है.
काशी में ही मिट्टी के मटके में चंदा मांगकर होलिका दहन की परंपरा रही है. अब चंदा मांगने की लोक परंपरा भी खत्म हो चुकी है. न हीं गालियां खाने की आदत रही और न ही ठेठ फगुआ गाने वाले ही रहे. वह सामाजिक समरसता कहीं न कहीं गुम हो गई है, जो कभी काशी की होली का ट्रेड मार्क रही.
वरिष्ठ पत्रकार हिमांशु राज बताते हैं कि बनारस की शान हुआ करती थी. होली खेलने के लिए लोग पूर्वांचल के अलग-अलग हिस्सों से आते थे. होली के मौके पर बनारस में होना लोग अपना सौभाग्य मानते थे. पूर्वांचल के तमाम हिस्सों को समेटकर बनारस में होली का वृहद अंदाज दिखाई देता था.
पहले छोटी-छोटी गलियों में होलिका दहन को लेकर जिस तरह से नगाड़े बजाते हुए लोग चंदा वसूलते थे, वह अब कहीं नहीं दिखाई देता. परंपरा के नाम पर कुछ लोग इसे करते हैं, लेकिन अब वह भी खत्म होता जा रहा है. बनारसी नगाड़े की आवाज यह बता देती थी की होली आ चुकी है. अब नगाड़े नहीं रहे.
हिमांशु का कहना है कि बनारस की होली को अंग्रेजी हुकूमत से जोड़कर देखा जाए तो इसका इतिहास 1800 से परंपरा के रूप में जाना जाता है. धार्मिक शहर होने की वजह से यहां पर होली का एक रूप धर्म की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है.
उस वक्त होली के नाम पर अंग्रेजी अधिकारियों को जमकर गालियां दी जाती थीं. बुरा भी ना माना जाए इसलिए कह दिया जाता था कि बुरा ना मानो होली है. यही परंपरा आगे चलकर होली का हिस्सा बनी और काशी में जिंदा रहा.
चौराहों, गलियों और अपने अलग अंदाज के लिए पहचान बनानी वाली बनारस की होली आधुनिकता की ऐसी भेंट चढ़ी कि सब खत्म हो चुका है. ना कवि सम्मेलन होता है और न हीं गालियों वाली होली का आनंद मिलता है.
हिमांशु बताते हैं कि यहां अस्सी घाट पर होने वाला बहुत बड़ा आयोजन बनारस ही नहीं बल्कि पूर्वांचल की होली की शान था. यहां पर चकाचक बनारसी, धर्मशील चतुर्वेदी सहित जाने-माने कवि और उस वक्त के नामचीन कवियों का होली के मौके पर मेला लगता था.
उस आयोजन को देखने और सुनने के लिए हजारो की भीड़ में उमड़ती थी. सब लोग होली का मजा छोड़कर इस कवि सम्मेलन का हिस्सा बनना चाहते थे. कवि सम्मेलन भी आम नहीं था. खुले मंच से गालियां दी जाती थीं. गालियों में सिर्फ आम नहीं बल्कि खास होते थे.
शहर के मानिंद हों या अधिकारी हों, नेता हो या कोई भी बड़ा नाम, किसी को नहीं छोड़ा जाता था. बड़े-बड़े अधिकारी और नेता तो कुर्सियों पर बैठकर गालियां सुनने के लिए पहुंचते थे, लेकिन अब यह आयोजन बंद हो चुका है. गालियों की परंपरा का अंत हो चुका है.
हिमांशु का कहना है अब टोलियों की परंपरा भी होली पर खत्म हो रही है. पहले सुबह रंग खेलने के लिए साइकिल से या पैदल युवाओं की टोलियां निकलती थीं, जो अलग-अलग घरों से लोगों को इकट्ठा करते हुए चौराहों पर जाकर होली खेलकर चाय की चुस्की के साथ आनंद लेकर होली का त्यौहार मनाते थे.
अब न वैसी होली है न टोलियां. बस सबका अपना-अपना समय है, जो बस किसी तरह बिताकर इस त्यौहार को मनाने की कवायद की जाती है.
बनारस के रहने वाले विवेक कुमार सिंह का कहना है कि होली तो हम लोगों के समय हुआ करती थी. बूढ़े, बच्चे और युवा एक साथ होली का आनंद लेते थे, लेकिन कहीं कोई कसक मन में नहीं रहती थी. पहले तो होली का त्योहार 7 से 10 दिन चलता था. अब तो रंग फेंकने में भी डर लगता है.
दिल्ली से बनारस जाकर होली का त्योहार मनाने वाले अरुण का कहना है कि अब तो सिर्फ हम त्योहार मनाने आते हैं. पहले त्योहार का आनंद लेते थे. अब अपनों का साथ छूट गया. रोजी-रोटी के लिए बाहर भागना पड़ा.
बस छुट्टी मिलती है तो 1 दिन के लिए. पहले ऐसा नहीं था. हम 10 दिन तक इस त्योहार का आनंद लेते थे. कवि सम्मेलन में जाते थे, होली का पर्व हमारे जीवन का मस्ती वाला हिस्सा था, लेकिन अब सब कुछ खो चुका है.

