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HOLI 2026 : रजवाड़ों से लेकर आमजन तक इसके बिना अधूरी है पिंक सिटी की होली, 300 साल पुरानी परंपरा आज भी कायम

जयपुर में होली पर मनिहारों के रास्ते में कई मुस्लिम परिवार दिन-रात गुलाल गोटे बनाते हैं.

Famous Jaipuri Gulal Gota
Famous Jaipuri Gulal Gota (फोटो ईटीवी भारत जयपुर)
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By ETV Bharat Rajasthan Team

Published : February 24, 2026 at 2:38 PM IST

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Updated : February 24, 2026 at 2:43 PM IST

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जयपुर : राजस्थान की राजधानी जयपुर केवल अपने किले, हवेलियों और राजसी ठाठ बाठ के लिए ही नहीं बल्कि अपनी अनोखी होली के लिए भी दुनिया भर में जानी जाती है. यहां होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं बल्कि इतिहास, शाही परंपरा और कारीगरी का अद्भुत संगम है. होली पर विशेष तौर पर गुलाल गोटे से होली खेलने की परंपरा चली आ रही है. लाख से बने गुलाल गोटे इतने हल्के होते हैं कि अगर किसी के फेंक कर और भी मारे तो किसी को चोट नहीं लगती.

300 साल पहले शुरू हुई थी शाही रस्म : जब सवाई जयसिंह द्वितीय ने जयपुर नगर की स्थापना की थी तब उन्होंने अलग-अलग कलाओं में निपुण कारीगरों को जयपुर के अलग-अलग मोहल्ले में लाकर बसाया था. इन्हीं में से एक मोहल्ला मनिहारों का रास्ता भी है, जहां पर सवाई जयसिंह द्वितीय ने मनिहारों को आमेर से लाकर जयपुर बसाया था. इनमें से अधिकांश मनिहार मुस्लिम थे. कहा जाता है कि तब सवाई जयसिंह द्वितीय ने मुस्लिम मनिहारों से होली पर कोई विशेष सौगात देने की मांग की थी जिस पर मुस्लिम कारीगरों ने लाख से बने गुलाल गोटे बनाकर उन्हें भेंट किए थे.

होली में विशेष तौर पर गुलाल गोटे से होली खेलने की परंपरा (वीडियो ईटीवी भारत जयपुर)

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हाथी पर बैठकर प्रजा पर फेंकते गुलाल गोटे : लाख के कारीगर जमीर अहमद का कहना है कि होली के दिन महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय हाथी पर सवार होकर शहर में भ्रमण पर निकले थे और रास्ते में जहां भी उन्हें लोग नजर आते वो गुलाल गोटे प्रजा के लोगों पर फेंकते इस तरह उन्होंने जयपुरवासियों के साथ गुलाल गोटे की होली खेल खेली थी तब से ही यह परंपरा चली आ रही है. उन्होंने बताया कि महाराजा ने हमारे पूर्वजों कहा था कि मुझे होली पर कोई ऐसी सौगात दो जो हमेशा याद रहे.तब हमारे बुजुर्गों ने उन्हें लाख से गुलाल गोटे बनाकर दिए थे.

सिटी पैलेस में आज भी निभाई जाती है शाही परंपरा : आजादी के बाद भले ही राजशाही का दौर खत्म हो गया है और लोकतंत्र स्थापित हो गया हो लेकिन आज भी होली पर जयपुर में गुलाल गोटे की शाही परंपरा निभाई जा रही है. जमीर अहमद का कहना है कि सिटी पैलेस में आज भी गुलाल गोटे से ही होली खेली जाती है और आज भी उस परंपरा को निभाया जा रहा है जो परंपरा सवाई जयसिंह द्वितीय ने शुरू की थी. गुलाल गोटे पहले शाही परिवारों और खास लोगों के लिए बनाए जाते थे लेकिन अब आम आदमी की पहुंच में भी यह आ चुका है और आम आदमी भी गुलाल गोटे से होली खेलना पसंद करते हैं.

डिब्बों में रखे तैयार गुलाल गोटे
डिब्बों में रखे तैयार गुलाल गोटे (फोटो ईटीवी भारत जयपुर)

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5 ग्राम लाख से बनता है गुलाल गोटे : गुलाल गोटे महज 5 ग्राम लाख से तैयार होता है, कारीगर इसे पहले हाथ से आकार देते हैं फिर उसके बाद फूंकनी की मदद से इसमें हवा भरकर गेंदनुमा आकार तैयार करते हैं और उसके बाद इसे ठंडा होने के लिए पानी में छोड़ देते हैं. इसके पश्चात इसमें अरारोट से बने हर्बल कलर डालकर पैक कर देते हैं और यह फिर होली खेलने के लिए तैयार हो जाता है.

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होली से 1 महीने पहले शुरू होता है काम : कारीगर जमीर अहमद और मोहम्मद शाहिद का कहना है कि गुलाल गोटे का काम केवल मनियारों के रास्ते में ही होता है. होली से करीब एक डेढ़ महीने पहले मनिहार परिवार गुलाल गोटे बनाना शुरू कर देते हैं और फिर उसके बाद उसे बेचने के लिए बाजार में ले आते हैं. उन्होंने बताया कि उनके परिवार पहले आमेर में रहते थे लेकिन जब जयपुर की स्थापना हुई तब सवाई जयसिंह द्वितीय ने मुस्लिम मनिहार समाज को त्रिपोलिया के पास मनिहारों के रास्ते में लाकर बसाया था. करीब 10 पीढ़ियों से मनिहार समाज लाख की चूड़ियां और अन्य चीज बनाता हुआ आ रहा है.

मनिहारों के रास्ते में सजी चूड़ियों की दुकान
मनिहारों के रास्ते में सजी चूड़ियों की दुकान (फोटो ईटीवी भारत जयपुर)

चेहरे और आंख को छोड़कर उपयोग करें : वहीं लाख के कारीगर काशिफ अली का कहना है कि गुलाल गोटे से होली खेलने में कोई नुकसान नहीं है बस केवल चेहरे और आंख का ध्यान रखा जाए. उसके अलावा अगर शरीर पर कहीं भी से फेंककर मारा जाता है तो कोई चोट नहीं लगती है, क्योंकि 5 ग्राम का होता है और 5 ग्राम ही इसमें कलर भरा जाता है, इस तरह से 10 ग्राम का होता है और लाख भी बेहद पतली होती है जिससे कि यह शरीर से टकराते ही टूट जाती है और कलर इंसान पर गिर जाता है. उन्होंने बताया कि लाख बहुत महंगी हो गई है उसके बावजूद भी होली पर गुलाल गोटे की डिमांड काफी ज्यादा है. न केवल जयपुर बल्कि मथुरा की बरसाना, वृंदावन और कई दूसरे शहरों में भी गुलाल गोटे की मांग काफी ज्यादा है.

गुलाल गोटे को फुकनी की सहायता से मुंह से फुलाकर तैयार करते कारीगर
गुलाल गोटे को फुकनी की सहायता से मुंह से फुलाकर तैयार करते कारीगर (फोटो ईटीवी भारत जयपुर)

रंगों में घुली सौहार्द की मिसाल : गुलाल गोटे केवल एक उत्सव सामग्री नहीं बल्कि जयपुर की गंगा जमुनी तहजीब की प्रतीक भी है. मुस्लिम मनिहार कारीगरों द्वारा बनाए गए गुलाल गोटे राजघराने की शाही होली का हिस्सा बनते रहे हैं जो कला परंपरा और आपसी भाईचारे का अद्भुत उदाहरण भी पेश करते हैं. जब होली के दिन जयपुर की फिजाओं में गुलाल फूटते हैं तो ऐसा लगता है कि मानव इतिहास खुद रंगों में भीग कर मुस्कुरा रहा हो,तीन सदियों से चली आ रही परंपरा आज भी संदेश देती है की रंग बदलते हैं, दौर बदलते हैं लेकिन विरासत हमेशा जिंदा रहती है.

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Last Updated : February 24, 2026 at 2:43 PM IST