Special : शिल्पग्राम में 400 साल पुरानी गुलाल गोटा, इस खास कला को शिल्पकार की चौथी पीढ़ी संवार रही
झीलों की नगरी में होली के मौके पर पारंपरिक रंगों की खास झलक. मेवाड़ में गुलाल गोटा का रंग बिखेर रहे गय्यूर अहमद...

Published : February 27, 2026 at 6:48 AM IST
कपिल पारीक
उदयपुर: शिल्पग्राम में इस बार होली के मौके पर पारंपरिक रंगों की एक खास झलक देखने को मिल रही है. जयपुर की करीब 400 वर्ष पुरानी गुलाल गोटा कला यहां पर्यटकों को आकर्षित कर रही है. इस कला को जीवित रखे हुए हैं जयपुर के कारीगर गय्यूर अहमद, जो पिछले 14 वर्षों से यहां लाख से जुड़े पारंपरिक उत्पाद बना रहे हैं.
ईटीवी भारत से खास बातचीत में गय्यूर अहमद ने बताया कि गुलाल गोटा बनाना एक बेहद नाजुक और पारंपरिक प्रक्रिया है, जिसे उन्होंने अपने पूर्वजों से सीखा है. उन्होंने कहा कि यह सिर्फ रंग खेलने की चीज नहीं, बल्कि हमारी विरासत है, जिसे हम पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ा रहे हैं. फिलहाल, वे अपने परिवार की चौथी पीढ़ी हैं जो इस कला को संवारने में जुटे हैं.
गुलाल गोटा बनाने की प्रक्रिया की जानकारी देते हुए उन्होंने बताया कि सबसे पहले लाख में बहुत कम मात्रा में बेरजा मिलाया जाता है, जिससे उसमें लचीलापन आता है. इसके बाद इस मिश्रण को धीमी आंच पर गर्म किया जाता है. जब यह पर्याप्त मुलायम हो जाता है, तब कारीगर हाथों से छोटे-छोटे गोल आकार तैयार करते हैं.
हर गोटे को सावधानी से खोखला कर उसमें रंगीन गुलाल भरे जाते हैं और फिर उसे बंद कर दिया जाता है. वजन की बात करें तो एक गुलाल गोटा लगभग 15 से 20 ग्राम के बीच होता है, जिससे यह न तो बहुत भारी होता है और न ही टूटने में कठिनाई होती है. एक डिब्बे में छह अलग-अलग रंगों के गोटे रखे जाते हैं, जिनकी कीमत करीब 480 रुपये होती है. हालांकि, स्थानीय स्तर पर इनकी मांग सीमित रहती है, लेकिन शिल्पग्राम आने वाले देश-विदेश के पर्यटक अब इस अनोखी परंपरा में दिलचस्पी दिखाने लगे हैं.

गय्यूर अहमद ने बताया कि होली के दौरान इन गुलाल गोटों का धार्मिक महत्व भी काफी अधिक है. इन्हें पहले मंदिरों में भगवान को अर्पित किया जाता है, फिर पुजारी इन्हें श्रद्धालुओं के बीच फेंकते हैं. इससे होली खेलने का पारंपरिक और आध्यात्मिक रूप सामने आता है. उन्होंने यह भी कहा कि शिल्पग्राम में इसकी मांग धीरे-धीरे बढ़ रही है. पहले जहां बहुत कम लोग इसके बारे में जानते थे, वहीं अब पर्यटक पहले से जानकारी लेकर आते हैं और खासतौर पर इसे खरीदते हैं. हाल ही में शहर के एक पांच सितारा होटल ने भी 25 डिब्बों का ऑर्डर दिया, जिससे इस कला को नई पहचान मिल रही है.
जयपुर के कलाकार ने गय्यूर ने बताया कि गुलाल गोटा केवल रंग खेलने का साधन नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक धरोहर है, जिसकी जड़ें लगभग चार शताब्दी पुरानी हैं. इसे बनाने की प्रक्रिया बेहद सूक्ष्म और मेहनत भरी होती है. इसमें लाख के साथ सीमित मात्रा में प्राकृतिक तत्व मिलाकर उसे लचीला बनाया जाता है. फिर इसे गर्म कर हाथों से गोल आकार दिया जाता है और भीतर रंगीन गुलाल भरा जाता है. इस कला को बचाने के लिए उन्होंने कहा कि सरकार को भी आगे आकर हमारी मदद करनी चाहिए, जिससे यह पुरानी विरासत बची रहे.

उन्होंने बताया कि गुलाल गोटा होली से जुड़ी एक पारंपरिक और अनोखी कला है, जिसकी जड़ें खास तौर पर जयपुर और राजस्थान के अन्य हिस्सों में मिलती हैं. यह छोटे-छोटे रंगीन गोले होते हैं, जिन्हें लाख रेजिन से बनाया जाता है और इनके अंदर सूखा गुलाल भरा जाता है. होली के दिन इन्हें एक-दूसरे पर फेंका जाता है, जिससे वे टूटकर रंग बिखेरते हैं. यह केवल रंग खेलने का साधन नहीं, बल्कि शाही दौर की एक सांस्कृतिक परंपरा भी मानी जाती है.
पुराने समय में राजघरानों में गुलाल गोटों से होली खेली जाती थी, जिससे कपड़े ज्यादा खराब नहीं होते थे और खेल में एक अलग शालीनता बनी रहती थी. आज भी यह परंपरा जीवित है और मेलों, खासकर शिल्पग्राम जैसे आयोजनों में देखने को मिलती है. गुलाल गोटा न केवल उत्सव का हिस्सा है, बल्कि राजस्थान की समृद्ध हस्तकला और विरासत का प्रतीक भी है.



