15 दिन फागोत्सव - 600 साल से भगवान चारभुजानाथ से खेल रहे ब्रज की होली
मंगला आरती में ठाकुरजी की आराधना कर भक्त रंग-गुलाल अर्पित करते हैं. रंग-बिरंगे फूलों से होली खेलते और केसरयुक्त दूध का प्रसाद प्राप्त करते हैं.

Published : February 27, 2026 at 11:57 AM IST
|Updated : February 27, 2026 at 12:02 PM IST
बूंदी:राजस्थान की छोटी काशी बूंदी में होली का रंग कुछ अलग ही छटा बिखेरता है. यहां तिलक चौक के प्राचीन श्रीचारभुजानाथ मंदिर में 600 वर्षों से अनूठी परंपरा निभाई जा रही है. होली से पूरे 15 दिन पहले फागोत्सव शुरू होता है, जो भक्तों को ब्रज की होली याद दिला देता है. गुलाल और पुष्प वर्षा के बीच फाग गीतों के बीच श्रद्धालु भगवान के साथ होली खेलते हैं. देश-विदेश से आए श्रद्धालु इस उत्सव का हिस्सा बनते हैं. होली पर पूरा शहर भक्ति रस और रंगोत्सव में सराबोर हो उठता है.
चारभुजा विकास समिति के अध्यक्ष पुरुषोत्तम लाल पारीक ने बताया कि फागोत्सव होली से 15 दिन पूर्व शुरू होता है. रोजाना सुबह मंगला आरती में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं. ठाकुरजी की आराधना कर रंग-गुलाल अर्पित करते हैं. रंग-बिरंगे फूलों से होली खेली जाती है. केसर युक्त दूध का प्रसाद बांटा जाता है. मंदिर परिसर में ढोल-मंजीरों की थाप पर फाग गीत गूंजते हैं. श्रद्धालु पारंपरिक वेशभूषा में होली के पारंपरिक गीतों पर झूमते हैं. शुक्रवार सुबह बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने मंदिर में होली खेली. विदेशी पावनों ने भी इस रंगोत्सव का आनंद लिया और गुलाल लगाकर उत्साह दिखाया.
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रणथंभौर से बूंदी पधारे थे भगवान: चारभुजा विकास समिति के अध्यक्ष पुरुषोत्तम लाल पारीक ने बताया कि श्रीचारभुजानाथ की प्रतिमा को बूंदी नरेश राव सुरजन सिंह ने सन 1569 (संवत 1664) में मंदिर के निज गर्भगृह में प्रतिष्ठित कराया था. भगवान चारभुजानाथ मूल रूप से सवाई माधोपुर के रणथंभौर से बूंदी पधारे थे. कहा जाता है कि प्रतिमा को रथ में लाया जा रहा था, तब तिलक चौक स्थित स्थान पर रथ खुद रुक गया. काफी प्रयास के बावजूद रथ आगे नहीं बढ़ा. इसे ईश्वरीय संकेत मान तत्कालीन राजा राव सुरजन सिंह ने यहीं भगवान की प्रतिमा को स्थापित करने का निर्णय लिया. तब से यह मंदिर आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है. भक्तों का मानना है कि श्री चारभुजानाथ के दर्शन के बिना उनका दिन अधूरा रहता है. कई लोग दैनिक कार्य की शुरुआत भगवान के दर्शनों के बाद ही करते हैं.

भक्ति और रंगों का संगम: मंदिर के पुजारी पंडित गणेश शर्मा ने बताया कि फागोत्सव के दौरान फूलों की होली, गुलाल की उड़ती लालिमा और केसर मिश्रित दूध की सुगंध वातावरण को भक्तिमय बना देती है. बच्चे, बुजुर्ग, महिलाएं हर कोई बिना भेदभाव एक-दूसरे को रंग लगाते हैं. श्रद्धालु अशोक गर्ग ने कहा कि बूंदी को यूं ही छोटी काशी नहीं कहते. यहां हर गली में प्राचीन मंदिर हैं. हर मंदिर का इतिहास है. होली के समय इन मंदिरों में फागोत्सव की विशेष धूम रहती है.
हर वर्ष बूंदी आते: कोटा निवासी मधु सोनी ने कहा कि वे हर वर्ष होली से पहले भगवान चारभुजानाथ मंदिर में फागोत्सव में शामिल होने कई साल से बूंदी आ रही हैं. महोत्सव के दौरान बूंदी के प्रसिद्ध चंग वादक मंगल सिंह ने मनमोहक प्रस्तुतियों से मंत्रमुग्ध कर दिया. चंग, ढोलक और मंजीरों की थाप पर फाग के भजन शुरू हुए तो श्रद्धालु खुद को रोक नहीं पाए और जमकर नृत्य किया. मंदिर के गर्भगृह सहित पूरे परिसर को आकर्षक पुष्प मालाओं से सजाया गया. समाजसेवी राधेश्याम झंवर की ओर से मक्खन का प्रसाद वितरित किया गया. ठाकुरजी को केसर युक्त दूध, मोतीचूर की नुकती और पंचमेवा का भोग लगाकर भक्तों में प्रसाद का वितरण किया गया.
छह सदी की परंपरा: जानकार बताते हैं कि करीब छह सदियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी पूरे उत्साह के साथ निभाई जा रही है. समाजसेवी विनोद न्याति, महेश शर्मा, अक्षय अग्रवाल, नौरतमल अग्रवाल, देवेंद्र सोनी, गिरिराज शर्मा, लालचंद विजयवर्गीय, कौशल शर्मा, श्याम राठौर और पर्यटन अधिकारी प्रेम शंकर सैनी सहित अनेक नियमित दर्शनार्थी पूरी निष्ठा से जुटे हुए हैं. होली महोत्सव धुलंडी तक उत्साह के साथ मनाया जाएगा.

