ETV Bharat / state

24 फरवरी से 3 मार्च तक रहेगा होलाष्टक , जानिए क्यों नहीं होते मांगलिक कार्य

होलाष्टक में कोई भी शुभ और मांगलिक कार्य करने से इसके शुभ परिणाम प्राप्त नहीं होते हैं.

24 फरवरी से होगा होलाष्टक शुरू
24 फरवरी से होलाष्टक शुरू (फोटो ईटीवी भारत)
author img

By ETV Bharat Rajasthan Team

Published : February 21, 2026 at 8:17 AM IST

4 Min Read
Choose ETV Bharat

बीकानेर : हिंदू धर्म में होलाष्टक शुरू होने के साथ ही सभी प्रकार के मांगलिक कार्य पर रोक लग जाती है. होली के 8 दिन पहले पड़ने वाली समयावधि को ही होलाष्टक कहते हैं. होलिका दहन से 8 दिन पहले होलाष्टक से होलिका दहन तक कई तरह की पौराणिक कथाएं भी जुड़ी हुई है. सनातन धर्म में होलाष्टक में कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता है. होली से पहले फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से होलाष्टक लगता है. हिंदू पंचांग के अनुसार, इस दौरान शुभ कार्य वर्जित माने जाते हैं. इस बार होलाष्टक 24 फरवरी से शुरू होगा. यह 3 मार्च तक रहेगा.

ये है होलाष्टक की कथा : बीकानेर के पंचांगकर्ता पंडित राजेंद्र किराडू बताते हैं कि पौराणिक कथाओं के अनुसार राक्षस राज हिरणकश्यप खुद की पूजा करवाता था और प्रजा से किसी भी दूसरे देवता की पूजा करने के लिए मना करता था. लेकिन उसका खुद का पुत्र भक्त प्रहलाद भगवान विष्णु की आराधना करता था. हिरण्यकश्यप को अपने पुत्र की विष्णु भक्ति करना पसंद नहीं था. अपने पुत्र प्रहलाद को सभी प्रकार की यातनाएं देते हुए विष्णु भक्ति से दूर करने का प्रयास किया. लेकिन भगवान विष्णु के अनन्य भक्त प्रहलाद ने अपने आराध्य की भक्ति नहीं छोड़ी. तब राक्षसराज ने अपनी बहन होलिका के सहारे प्रहलाद को यातना देने का प्रयास किया और इस दौरान अष्टमी तिथि के दिन उसे बंदी गृह में यात्राएं देना शुरू किया. अष्टमी से पूर्णिमा के दौरान बंदीगृह में प्रह्लाद को यातनाएं दी जाती रहीं. इस अवधि के दौरान होलिका ने काफी प्रयास किया लेकिन वह विष्णु भक्ति से प्रहलाद को टस से मस नहीं कर पाई.

इसे भी पढ़ें: जयपुर में बिखरेगी ब्रज की छटा: गोविंद देव जी मंदिर में होगा भव्य फागोत्सव, शामिल होंगे 500 कलाकार

शिव के क्रोध से जुड़ी कथा : पंडित किराडू कहते हैं कि होलाष्टक से जुड़ी एक ओर पौराणिक कथा है. ऐसा माना जाता है कि फाल्‍गुन मास की अष्‍टमी को ध्यान में लीन भगवान शिव की तपस्या को भंग करने का कामदेव ने प्रयास किया. इससे क्रोधित होकर भगवान शिव ने कामदेव को भस्म कर दिया. कहते हैं इसी कारण इस दौरान प्रकृति में शोक का माहौल बन जाता है और वातावरण सकारात्मक नहीं रह पाता है.

मांगलिक कार्य की मनाही : फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी से पूर्णिमा को होलाष्टक होता है. सनातन धर्म में सोलह संस्कार विधि होती है और इनमें शुभ कार्य होलाष्टक में वर्जित हैं. जिनमें नामकरण, मुंडन, गृह प्रवेश, यज्ञोपवित, विवाह संस्कार जैसे शुभ कार्य नहीं किए जाते हैं. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस वक्त भगवान के प्रिय भक्तों पर राक्षसी प्रवृत्तियां हावी हो जाती हैं, जैसे भक्त प्रह्लाद के साथ हुआ. जिसके होने के चलते भक्तों को खूब कष्ट होता है इसलिए इस समय को शुभ नहीं माना जाता है और शुभ कर्म की मनाही होती है.

इसे भी पढ़ें: गोविंददेवजी मंदिर में रचना झांकी के साथ होली महोत्सव का भव्य आगाज़, फाग के रंगों में रंगे 'ठाकुरजी'

पाठ-पूजा, अर्चना से लाभ : होलाष्टक के दौरान किसी भी प्रकार का शुभ कार्य नहीं किया जाता है लेकिन भगवान की भक्ति पूजा आराधना में किसी प्रकार की कोई मनाही नहीं है. इस दौरान खासतौर से साधना करने का भी महत्व है और होलिका दहन के वक्त जिस जगह पर होलिका दहन हो रहा है उसके आसपास मंत्र जाप करने से भी फल मिलता है. अपने इष्ट देव की आराधना करने से इस वक्त माहौल में आई नकारात्मकता दूर होती है और इसका शुभ फल मिलता है.