मोहर्रम पर हिंदू कारीगरों द्वारा बनाया गया ताजिया, कलियागंज में चली आ रही गंगा-जमुनी तहजीब की परंपरा
किशनगंज जिले का एक ऐसा गांव, जहां मोहर्रम का ताजिया हिन्दू हाथों से तैयार होता है. मुस्लिम समाज मन्नत पूरी होने पर चढ़ाते है ताजिया.

Published : June 26, 2026 at 4:34 PM IST
किशनगंज:बिहार के किशनगंज जिले के पोठिया प्रखंड स्थित कलियागंज चकबंदी गांव में वर्षों पुरानी परंपरा आज भी कायम है. यहां मोहर्रम के अवसर पर मुस्लिम समुदाय द्वारा चढ़ाए जाने वाले ताजिया को हिंदू परिवारों के कारीगर तैयार करते हैं. यह अनोखी परंपरा गंगा-जमुनी तहजीब की जीती-जागती मिसाल पेश करती है, जहां धर्म के नाम पर दूरियां नहीं बल्कि आपसी मोहब्बत और भरोसा दिखाई देता है.
बांस और रंग-बिरंगे कागजों में छिपा है प्रेम: मोहर्रम से कई दिन पहले गांव के आंगनों में ताजिया बनाने की तैयारियां शुरू हो जाती हैं. हिंदू कारीगर बांस, कागज और सजावटी सामग्री से ताजिया को आकार देते हैं. इस काम में पुरुषों के साथ महिलाएं भी सक्रिय रूप से भाग लेती हैं. कारीगरों का कहना है कि यह केवल रोजगार नहीं, बल्कि पूर्वजों से चली आ रही सांस्कृतिक विरासत और रिश्तों की मिठास है.
महिलाएं भी संभाल रही हैं बुजुर्गों की परंपरा: रीना देवी और पुकता देवी जैसी महिलाएं बताती हैं कि शादी के बाद से वे इस काम में हाथ बंटा रही हैं. उनके ससुर और बुजुर्ग पहले ताजिया बनाया करते थे. अब नई पीढ़ी भी इसी लगन से परंपरा को आगे बढ़ा रही है.
"मुस्लिम भाई मेरे बनाए ताजिया को पूरे सम्मान के साथ ले जाते हैं. गांव में हम सभी एक परिवार की तरह रहते हैं."-रीना देवी, कारीगर
नहीं है कोई भेदभाव, सब हैं एक परिवार: गांव के कारीगर गंगा मालाकार बताते हैं कि कलियागंज की पहचान ही आपसी प्रेम है. यहां हिंदू ताजिया बनाते हैं और मुस्लिम मन्नत पूरी होने पर उसे चढ़ाते हैं. ईद हो या पूजा, होली हो या मोहर्रम सभी त्योहार साथ मनाए जाते हैं. गांव में कभी भेदभाव नहीं रहा, यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है.

"हमारे यहां कभी कोई भेदभाव नहीं रहा. हिन्दू समाज के लोग ताजिया बनाते हैं और मुस्लिम समाज के लोग मन्नत पूरी होने पर उसे चढ़ाते हैं. ईद हो या पूजा, मोहर्रम हो या कोई दूसरा त्योहार, हम सभी एक दूसरे की खुशी और दुख में साथ खड़े रहते हैं.''-गंगा मालाकार, कारीगर
मन्नत पूरी कर कर्बला मैदान तक पहुंचता ताजिया: मोहर्रम के दौरान कई लोग अपनी मन्नत पूरी होने पर ताजिया चढ़ाते हैं. तैयार ताजिया को पूरे सम्मान के साथ कर्बला मैदान तक ले जाया जाता है, जिसमें बड़ी संख्या में गांववासी शामिल होते हैं. इस दौरान पूरा गांव एकता और श्रद्धा का माहौल दिखाता है.

इंसानी रिश्तों से जोड़े जाते हैं त्योहार: ग्रामीणों का कहना है कि यहां त्योहारों को धर्म से ज्यादा इंसानी रिश्तों और भाईचारे से जोड़ा जाता है. कृष्णा ठाकुर जैसे स्थानीय निवासी बताते हैं कि "बचपन से यही देख रहे हैं. हिंदू परिवार ताजिया बनाते हैं और मुस्लिम भाई उसे सम्मानपूर्वक ले जाते हैं. कलियागंज की मिट्टी में ही भाईचारा बसा है."
किशनगंज की गंगा-जमुनी पहचान का प्रतीक: किशनगंज मुस्लिम बहुल जिला होने के बावजूद आपसी सौहार्द के लिए जाना जाता है. पोठिया प्रखंड का कलियागंज गांव इसकी बेहतरीन मिसाल है. यह परंपरा साबित करती है कि रिश्ते धर्म से नहीं, बल्कि भरोसे और इंसानियत से मजबूत होते हैं.

समाज को अमन का संदेश: शुक्रवार को जब मोहर्रम का ताजिया निकलेगा, कलियागंज गांव एक बार फिर पूरे इलाके को एकता और भाईचारे का संदेश देगा. इस खूबसूरत परंपरा को देखकर समाज में बढ़ती नफरत की दीवारें टूटती नजर आती हैं और उम्मीद जगती है कि ऐसे उदाहरण देश भर में फैलें.
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