हिमाचल में मौसम की बेरुखी बरकरार, जनवरी से मार्च तक सामान्य से कम बारिश के आसार, ये है वजह
हिमाचल प्रदेश में पोस्ट मानसून के दौरान बारिश और बर्फबारी में कमी आ रही है. जिसके लिए कई कारण जिम्मेदार हैं.

By ETV Bharat Himachal Pradesh Team
Published : January 6, 2026 at 7:48 AM IST
शिमला: हिमाचल प्रदेश में मौसम की बेरुखी थमने का नाम नहीं ले रही है. मानसून सीजन में बीते साल अक्टूबर तक हुई रिकॉर्डतोड़ बारिश ने तबाही के नए-नए निशान छोड़े. वहीं, अब नया साल सूखे के साए में करवट लेता दिख रहा है. मौसम विभाग ने जनवरी से मार्च 2026 के बीच सामान्य से कम बारिश के आसार ने प्रदेश की आर्थिकी के लिए खतरे की घंटी बजा दी है. लगातार प्राकृतिक आपदाओं से जूझ चुके हिमाचल पर अब सूखे का मौसम एक और गहरी चोट करने की तैयारी में है.
प्रदेश की आर्थिक रीढ़ पर मौसम की मार
मौसम की इस दोहरी मार ने प्रदेश की आर्थिक रीढ़ कहे जाने वाले तीनों प्रमुख क्षेत्रों पर्यटन, कृषि-बागवानी और जलविद्युत परियोजनाओं को हिला कर रख दिया है. कभी बर्फबारी के लिए मशहूर पहाड़ों पर सूखे ढलानों की तस्वीरें उभर रही है, तो कहीं सेब के बागानों और रबी सीजन में फसलों की चिंता किसानों-बागवानों की नींद उड़ा रही है. नदियों और जलाशयों में घटता जलस्तर हाइडल प्रोजेक्ट्स की उत्पादन क्षमता पर सवाल खड़े कर रहा है, जिसका सीधा असर राजस्व और रोजगार पर पड़ रहा है. विशेषज्ञों का मानना है आपदाओं से उबरने की कोशिश कर रहे हिमाचल के लिए यह मौसमीय असंतुलन सिर्फ एक चेतावनी नहीं, बल्कि आने वाले समय की बड़ी चुनौती का संकेत है. जहां विकास, आजीविका और पर्यावरण तीनों एक साथ दांव पर लगे नजर आ रहे हैं.

मौसम विज्ञान केंद्र शिमला के सीनियर साइंटिस्ट संदीप कुमार शर्मा का कहना है, "इस बार जनवरी से मार्च के दौरान हिमाचल के ज्यादातर हिस्सों में सामान्य से 55 से 65 फीसदी कम बारिश होगी. वहीं, लाहौल-स्पीति जिले के कुछ हिस्सों और उससे सटे किन्नौर जिले में जनवरी से मार्च के दौरान सामान्य बारिश से 35 से 45 फीसदी कम बारिश होने की संभावना है."

11 सालों में मानसून सीजन में हुई बारिश का आंकड़ा
हिमाचल में अब तक 11 साल के मानसून सीजन में हुई बारिश के आंकड़ों को देखें तो साल 2015 में 638.2 मिलीमीटर बारिश हुई थी, जो सामान्य से 16.4 फीसदी कम थी. इसी तरह से साल 2016 के मानसून सीजन के दौरान 623.9 मिलीमीटर बारिश रिकॉर्ड की गई थी, बारिश का ये आंकड़ा सामान्य से 18.3 फीसदी कम रहा. साल 2017 में 717.2 मिलीमीटर बारिश हुई, जो सामान्य से 6.1 फीसदी कम रिकॉर्ड की गई. वहीं, साल 2018 में 927.0 मिलीमीटर बारिश हुई, यह सामान्य से 21.4 फीसदी अधिक दर्ज की गई. इसी तरह से साल 2019 में 686.9 मिलीमीटर बारिश हुई, जो सामान्य से 10 फीसदी कम रही. साल 2020 में मानसून सीजन के दौरान 567.4 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई, यह बारिश सामान्य से 25.4 फीसदी कम थी. साल 2021 में 688.6 मिलीमीटर बारिश हुई, जो कि सामान्य से 9.8 फीसदी कम दर्ज की गई. प्रदेश में साल 2022 में 716.2 मिलीमीटर बारिश हुई, यह सामान्य से 2.5 फीसदी कम थी. वहीं, साल 2023 में 886.0 मिलीमीटर बारिश रिकॉर्ड की गई, जो कि सामान्य से 21 फीसदी अधिक थी. इसी तरह से साल 2024 में मानसून सीजन के दौरान प्रदेश में 600.9 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई थी, बारिश का ये आंकड़ा समय से सामान्य से 18 फीसदी कम रहा. वहीं, वर्ष 2025 में 1022.9 मिलीमीटर बारिश हुई, जो सामान्य से 40 फीसदी अधिक रिकॉर्ड की गई. हिमाचल में मानसून सीजन में सामान्य बारिश का आंकड़ा 734.4 मिलीमीटर बारिश का है.

16 सालों में पोस्ट मानसून में एक बार सामान्य से अधिक बारिश
हिमाचल प्रदेश में मानसून सीजन में बादल भले ही सामान्य से कम या अधिक बरसे हों, लेकिन बरसात में हमेशा हिमाचल को भारी ज़ख्म मिले हैं. वहीं, मानसून की विदाई के बाद 1 अक्टूबर से 31 दिसंबर तक के पोस्ट मानसून ने हमेशा ही प्रदेशवासियों को बारिश के लिए तरसाया है. पोस्ट मानसून में पिछले 16 सालों के आंकड़ों पर गौर करें तो प्रदेश में एक ही बार साल 2019 में सामान्य से अधिक बारिश हुई है. प्रदेश में पोस्ट मानसून सीजन के दौरान सामान्य बारिश का आंकड़ा 82.9 मिलीमीटर बारिश का है. मौसम विभाग के आंकड़ों के मुताबिक साल 2010 में 94.7 मिलीमीटर बारिश हुई थी, जो सामान्य से 13.5 फीसदी कम दर्ज की गई. साल 2011 में 17.8 मिलीमीटर बारिश हुई, यह आंकड़ा भी सामान्य से 83.3 फीसदी कम रहा. इसी तरह से साल 2012 में 41.5 मिलीमीटर बारिश रिकॉर्ड की गई. ये आंकड़ा सामान्य से 59.6 फीसदी कम रहा. साल 2013 में 61.7 मिलीमीटर बारिश हुई, जो सामान्य से 39.9 फीसदी कम रही. साल 2014 में 73.6 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई. यह आंकड़ा भी सामान्य से 19.7 फीसदी कम था. साल 2015 में 56.3 मिलीमीटर बारिश हुई, जो सामान्य से 38.5 फीसदी कम रही. इसी तरह से साल 2016 में 7.5 मिलीमीटर रिकॉर्ड की गई थी, ये आंकड़ा सामान्य से 91.8 फीसदी कम रहा. साल 2017 में 55.2 मिलीमीटर बारिश हुई, जो सामान्य से 39.7 फीसदी कम रिकॉर्ड की गई. वहीं, साल 2018 में 56.4 मिलीमीटर बारिश हुई, यह सामान्य से 38.4 फीसदी कम दर्ज की गई. इसी तरह से साल 2019 में 128.0 मिलीमीटर बारिश हुई, जो सामान्य से 39.7 फीसदी अधिक रही. साल 2020 में 77.4 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई, यह बारिश सामान्य से 19.5 फीसदी कम थी. ऐसे ही साल 2021 में 75.5 मिलीमीटर बारिश हुई, जो कि सामान्य से 17.6 फीसदी कम दर्ज की गई. प्रदेश में साल 2022 में 63.9 मिलीमीटर बारिश हुई, यह सामान्य से 23.0 फीसदी कम थी. वहीं, साल 2023 में 45.2 मिलीमीटर बारिश रिकॉर्ड की गई, जो कि सामान्य से 45.0 फीसदी कम थी. इसी तरह से साल 2024 में 47.1 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई थी, बारिश का ये आंकड़ा 43.0 फीसदी कम रहा. वहीं, साल 2025 में 69.1 मिलीमीटर बारिश हुई, जो सामान्य से 16 फीसदी कम रिकॉर्ड की गई.

मानसून सीजन में 8 सालों में कितने लोगों की हुई मौत ?
हिमाचल में हर साल मानसून सीजन में दुखों का पहाड़ टूट रहा है. भारी बरसात होने से हजारों करोड़ की संपत्ति तबाह होने के साथ हर साल सैकड़ों लोगों की मौत हो रही है. हिमाचल प्रदेश आपदा प्रबंधन के आंकड़ों के अनुसार पिछले 8 सालों में मानसून सीजन में भारी बारिश से आने वाली प्राकृतिक आपदा ने 3168 लोगों की जान ली है. राहत-बचाव के इंतजामों के बावजूद हर बरसात के साथ मौतों का आंकड़ा कम नहीं हो रहा है. प्रदेश में साल 2018 के मानसून सीजन में 343 लोगों की मौत हुई. इसी तरह से साल 2019 के मानसून सीजन में 307 लोगों ने अपना जीवन गंवाया था. वहीं, साल 2020 में मानसून सीजन में 284 लोगों की मौत हुई थी. साल 2021 के मानसून सीजन ने भी अपना कहर बरपाया, जिसमें 481 लोगों की दुखद मौत हुई थी. इसके अलावा साल 2022 के मानसून सीजन में 435 लोगों ने अपनी जीवन से हाथ धोया. वहीं, साल 2023 में आई सदी की सबसे बड़ी त्रासदी ने 511 लोगों के जीवन को निगल लिया. साल 2024 के मानसून सीजन में भी 353 लोगों ने अपनी जान गंवाई. वहीं, साल 2025 में भी प्राकृतिक आपदा के कारण 454 की मौत हुई है.

8 सालों में मानसून सीजन में कितना हुआ नुकसान ?
पिछले 8 सालों में प्रदेश में मानसून सीजन के दौरान हुई भारी बारिश ने बड़े स्तर पर तबाही मचाई है. आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, प्राकृतिक आपदा से 8 सालों में 24,070.64 करोड़ रुपये से ज्यादा की आर्थिक क्षति हुई है. इस दौरान हजारों मकान ढहे, सैकड़ों जानें गई और लाखों लोग बेघर होने पर मजबूर हुए. खेत-खलिहानों से लेकर सड़क और पुल जैसी आधारभूत संरचनाएं भी बुरी तरह प्रभावित हुई, जिसमें साल 2018 के मानसून सीजन में प्रदेश को 1594.01 करोड़ का नुकसान झेलना पड़ा. इसी तरह से साल 2019 में मानसून सीजन के दौरान 1237.00 करोड़ की सरकारी और निजी संपत्ति को नुकसान हुआ था. वहीं, साल 2020 में भी मानसून में हुई भारी बारिश ने 902.70 करोड़ की संपत्ति को अपनी चपेट में लिया. साल 2021 में भी मानसून सीजन में 1161.73 करोड़ की संपत्ति भारी बारिश की भेंट चढ़ी. इसके अलावा साल 2022 में भी मानसून में 2192.38 करोड़ की संपत्ति बर्बाद हो गई. साल 2023 में हुई भारी बारिश ने सबसे अधिक तबाही मचाई, उस दौरान प्रदेश में 9712.60 करोड़ की संपत्ति नष्ट हो गई. साल 2024 में 1361.22 करोड़ की संपत्ति बरसात की वजह से तबाह हो गई. साल 2025 के मानसून सीजन में 5909 करोड़ की संपत्ति को नुकसान हुआ है. वहीं, साल 2025 के मानसून सीजन में प्रदेशभर में लैंडस्लाइड की 148, बादल फटने की 47 और फ्लैश फ्लड की 98 घटनाएं पेश आई हैं.

हिमाचल में कब-कितना सेब उत्पादन ?
हिमाचल उद्यान विभाग की ओर से जारी आंकड़ों के अनुसार, साल 2025-26 में 2.75 करोड़ पेटियां देश सहित राज्य की विभिन्न मंडियों में भेजी गई. वहीं, साल 2024-25 में 2.51 करोड़ पेटी सेब उत्पादन हुआ था. इसी तरह से 2023-24 में प्रदेश में 2.11 करोड़ पेटियों की पैदावार हुई थी. इस दौरान सेब के बॉक्स का स्टैंडर्ड साइज 24 किलो का था. साल 2022-23 में हिमाचल में सेब उत्पादन 3.36 करोड़ पेटी रहा था, उस समय सेब के बॉक्स का स्टैंडर्ड साइज 20 किलो वजन का था. वहीं, साल 2021-22 में प्रदेश में 3.05 करोड़ पेटी सेब हुआ था. 2020-21 में भी सेब की पैदावार कम रही थी, इस दौरान प्रदेश में 2.40 करोड़ सेब पेटियों का उत्पादन रहा था. इसी तरह से 2019-20 में सेब उत्पादन 3.24 करोड़, साल 2018-19 में प्रदेश में सेब की पैदावार 1.65 करोड़ पेटी रही थी. साल 2017-18 में सेब उत्पादन 2.08 करोड़ पेटी रहा था. इसी तरह से साल 2016-17 प्रदेश में 2.40 करोड़ सेब की पेटियां हुई थी. वहीं, 2015-16 में सेब उत्पादन 3.88 करोड़ पेटी रहा था. ऐसे में मौसम की वजह से हर साल सेब उत्पादन के आंकड़ों में उतार चढ़ाव देखा जा रहा है.

हिमाचल में 10 सालों में आए पर्यटकों की संख्या
पिछले 10 सालों में हिमाचल घूमने आए पर्यटकों का आंकड़ों पर नजर डालें तो साल 2015 में 1 करोड़ 75 लाख 31 हजार 153 भारतीय और विदेशी पर्यटकों ने हिमाचल के विभिन्न पर्यटन स्थलों का रुख किया था. इसी तरह से वर्ष 2016 में 1 करोड़ 84 लाख 50 हजार 520 पर्यटक आए. साल 2017 में 1 करोड़ 96 लाख 01 हजार 533 सैलानियों का आगमन हुआ. साल 2018 में 1 करोड़ 64 लाख 50 हजार 503 सैलानी हिमाचल आए. साल 2019 में 1 करोड़ 72 लाख 12 हजार 107 पर्यटक प्रदेश के पर्यटन स्थलों पर पहुंचे. साल 2020 में 32 लाख 13 हजार 379 सैलानी आए. साल 2021 में 56 लाख 37 हजार 102 सैलानी आए. वर्ष 2022 में 1 करोड़ 51 लाख 00 हजार 277 पर्यटक आए. साल 2023 में 1 करोड़ 60 लाख 04 हजार 924 पर्यटक हिमाचल आए. साल 2024 में 1 करोड़ 81 लाख 24 हजार 694 सैलानी और साल 2025 में 31 अक्टूबर तक 1 करोड़ 06 लाख 09 हजार 315 भारतीय और विदेशी पर्यटक हिमाचल के विभिन्न पर्यटक स्थलों में घूमने पहुंचे हैं.

ग्लोबल वार्मिंग का पोस्ट मानसून पर असर
हिमालयन नीति अभियान के संयोजक गुमान सिंह का कहना है कि वैश्विक स्तर पर ग्लोबल वार्मिंग की वजह से जलवायु में परिवर्तन हो रहा है. जिसका असर बारिश और बर्फबारी पर पड़ रहा है. उन्होंने कहा कि गर्मियों में समुद्र गर्म होगा, वहां से जो हवाएं अरब सागर और बंगाल की खाड़ी से होकर आती है, वो मानसून की बारिश अपने साथ लेकर आती हैं. इसी तरह से सर्दियों में प्रशांत महासागर से भूमध्य सागर, ब्लैक सी और रेड सी इन समुद्रों से होकर अक्टूबर महीने में हवाएं आती हैं. जिससे बारिश और बर्फबारी होती है. जो मई महीने में कमजोर पड़ती थी, लेकिन पिछले 10 से 15 सालों में इन हवाओं में बदलाव देखा जा रहा है. अब भूमध्य सागर से आने वाली ये ठंडी हवाएं देरी से आने लगी है. जिस कारण हिमाचल में नवंबर और दिसंबर महीने में जो अच्छी बारिश और बर्फबारी होती थी, इसमें परिवर्तन देखने को मिल रहा है. भूमध्य सागर से ठंडी और नम हवाओं के देरी से आने के कारण अब जनवरी से मार्च महीने में बारिश और बर्फबारी हो रही है. उन्होंने कहा कि देरी से आने वाली ये हवाएं अब मानसून में भी सक्रिय रहने लगी है.

इन पर भी निर्भर करती है बारिश
इसके अलावा बारिश स्थानीय कारणों जैसे जंगलों, झील और तालाबों की वजह से भी होती है. गुमान सिंह ने कहा कि अब ग्लोबल वार्मिंग नॉर्थ पोल में गर्मी बढ़ गई है. प्रशांत महासागर से जो हवाएं चलती थी, उसमें गर्मी की वजह से बदलाव आ गया है. इसकी वजह से वेस्टर्न डिस्टर्बेंस कमजोर नहीं पड़ रही है, इतने में मानसून आती है. इन दोनों के एक साथ सक्रिय होने से भारी बारिश होने लगी है. उन्होंने कहा कि आने वाले समय में क्लाइमेट डिजास्टर बढ़ता ही जाएगा. जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए जीवन स्तर को नेचर के अनुकूल ढालना होगा. वहीं, नेचर के खिलाफ होने वाले कार्यों को भी रोके जाने की जरूरत है.

हिमाचल में बर्फबारी कितनी जरूरी ?
बागवानी विशेषज्ञ एसपी भारद्वाज का कहना है कि हिमाचल के लिए मानसून सीजन में अत्यधिक बारिश और पोस्ट मानसून सीजन में पड़ने वाला लंबा सूखा दोनों की परिस्थितियां खराब है. हालांकि प्रदेश में बर्फबारी न होने से अभी तक सेब सहित अन्य फलदार पौधों के लिए जरूरी चिलिंग आवर्स पूरा होने को लेकर चिंता की बात नहीं है. पिछले कुछ सालों में मौसम में आए बदलाव की वजह से अब अधिकतर फरवरी महीने में बर्फबारी होने लगी है. ऐसे में चिलिंग आवर्स पूरा होने के लिए 10 मार्च तक का समय है. वैसे भी नई किस्म के सेब के पौधों के लिए अब कम चिलिंग आवर्स की जरूरत रहती है. हालांकि नए पौधे लगाने और बगीचे में तौलिए सहित गोबर खाद और सुपर फास्फेट खाद डालने के लिए नमी की आवश्यकता है. वहीं, लंबे सूखे की वजह से पौधों में कैंकर, सैंजो स्केल सहित अन्य बीमारी लगने की अधिक संभावना रहती है. जो पौधों की आयु को कम कर देती है.

प्रकृति के विरुद्ध होने वाले काम रोकने होंगे
पद्म श्री नेकराम शर्मा का कहना है कि प्रकृति के विरुद्ध कार्य हो रहे हैं. जिसका असर बिजली उत्पादन और कृषि की पैदावार पर पड़ रहा है. उन्होंने कहा कि मानसून सीजन में अत्यधिक बारिश से फसलें सड़ कर बर्बाद हो रही हैं. वहीं बरसात खत्म होने के बाद लंबे सूखे की वजह से किसान समय पर बिजाई नहीं कर पा रहे हैं. जिसका असर कृषि पैदावार पर पड़ रहा है. वहीं, भारी बरसात की वजह से नदियों में सिल्ट आने के कारण बिजली उत्पादन प्रभावित होता है. इसी तरह से सर्दियों में नदियों में जलस्तर का भी बिजली उत्पादन पर बुरा असर पड़ रहा है. उन्होंने कहा कि इस तरह की परिस्थितियों पर काबू पाने के लिए हमें हिमाचल में विकास के नाम पर जो अत्यधिक हाइड्रो प्रोजेक्ट, फोर लेन और जंगलों की जो कटाई हो रही है. इन प्रकृति विरोधी कार्यों को रोकने होगा. उन्होंने कहा कि जंगलों की कटाई रोकने के साथ अवैध डंपिंग पर भी काबू पाना होगा. कृषि में हमें पर्यावरण अनुकूल ऐसी फसलें पैदा करनी होगी.

