सावधान! आज मिस न करें पोलियो बूथ, अगर बच्चा रह गया है तो घबराएं नहीं, यह है पूरा सॉल्यूशन
हिमाचल में आज राज्यव्यापी पल्स पोलियो अभियान चलाया जा रहा है. जिसमें बच्चों को पोलियो की खुराक पिलाई जा रही है.

By ETV Bharat Himachal Pradesh Team
Published : December 21, 2025 at 2:50 PM IST
|Updated : December 21, 2025 at 2:56 PM IST
शिमला: पोलियो जैसी लाइलाज और गंभीर बीमारी से बच्चों को सुरक्षित रखने के लिए हिमाचल प्रदेश में आज यानी 21 दिसंबर को राज्यव्यापी पल्स पोलियो अभियान चलाया जा रहा है. इस अभियान के तहत 5 साल तक के सभी बच्चों को पोलियो की खुराक पिलाई जा रही है. स्वास्थ्य विभाग की टीमें विशेष रूप से बनाए गए बूथों के साथ-साथ अगले दिनों में घर-घर जाकर भी बच्चों को पोलियो ड्रॉप्स पिलाना सुनिश्चित करेंगी.
'खतरा अभी टला नहीं'
बच्चों को पोलियो पीला रहे स्वास्थ्य विभाग की टीम का स्पष्ट कहना है कि भले ही भारत को पोलियो मुक्त घोषित किया जा चुका है, लेकिन पड़ोसी देशों में वायरस की मौजूदगी के कारण खतरा पूरी तरह टला नहीं है. इसलिए हर बच्चे को हर बार दवा पिलाना अनिवार्य है.
पोलियो क्या है और यह क्यों है खतरनाक?
पोलियो एक अत्यधिक संक्रामक वायरल बीमारी है, जो मुख्य रूप से दूषित पानी और भोजन के जरिए फैलती है. यह वायरस सीधे शरीर के तंत्रिका तंत्र (Nervous System) पर हमला करता है.
प्रभाव: गंभीर मामलों में यह बच्चे को हमेशा के लिए अपंग (लकवाग्रस्त) बना सकता है.
इलाज: ध्यान देने वाली बात यह है कि पोलियो का कोई इलाज नहीं है, केवल टीकाकरण ही इससे बचने का एकमात्र रास्ता है.
पोलियो के प्रमुख लक्षण
डॉ. अंकुर धीमान (बाल रोग विशेषज्ञ, DDU अस्पताल) का कहना है कि शुरुआत में पोलियो के लक्षण सामान्य फ्लू जैसे हो सकते हैं, जिन्हें नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है.
- तेज बुखार और सिरदर्द
- उल्टी, दस्त और गले में खराश
- गर्दन और पीठ में असामान्य अकड़न
- हाथ-पैरों में कमजोरी महसूस होना
- गंभीर स्थिति में शरीर के किसी हिस्से का अचानक सुन्न होना या लकवा
- कई बार बच्चों में कोई बाहरी लक्षण नहीं दिखते, लेकिन वे वायरस के वाहक हो सकते हैं, जो अन्य बच्चों के लिए खतरा पैदा कर सकते हैं.
डीडीयू अस्पताल के पीडियाट्रिशियन डॉ. अंकुर धीमान ने अभियान की महत्ता पर जोर देते हुए कहा "पोलियो से बचाव का एकमात्र जरिया प्रिवेंशन (रोकथाम) है. अभिभावक यह न सोचें कि बच्चा पहले ड्रॉप्स ले चुका है तो अब जरूरत नहीं है. हर राउंड में दवा पिलाना बच्चे की इम्यूनिटी को और मजबूत करता है. अगर बच्चे को मामूली सर्दी, खांसी या दस्त है, तब भी यह दवा पूरी तरह सुरक्षित है और पिलाई जानी चाहिए."
आज कमला नेहरू अस्पताल, शिमला में सघन पल्स पोलियो टीकाकरण अभियान का शुभारंभ किया।
— Sukhvinder Singh Sukhu (@SukhuSukhvinder) December 21, 2025
इस अभियान का उद्देश्य हर बच्चे को पोलियो जैसी गंभीर बीमारी से सुरक्षित रखना है। इस अभियान की ताक़त हमारी वे बहनें और स्वास्थ्यकर्मी हैं, जिन्होंने घर-घर जाकर बच्चों को टीका देने के साथ मुस्कान,… pic.twitter.com/prGMhgDwjz
पोलियो के खिलाफ जंग
- WHO के डेटा के अनुसार पोलियो के खिलाफ वैश्विक जंग अब अंतिम चरण में है.
- 99% की कमी: वैश्विक स्तर पर पोलियो के मामलों में 1988 के बाद से 99% से अधिक की कमी आई है.
- भारत की स्थिति: लगातार प्रयासों के बाद WHO ने 27 मार्च 2014 को भारत को आधिकारिक तौर पर 'पोलियो मुक्त' घोषित किया था.
- सतर्कता जरूरी: WHO चेतावनी देता है कि जब तक दुनिया के एक भी देश में पोलियो मौजूद है, तब तक सभी देशों के बच्चों को खतरा बना रहेगा. इसलिए 'इम्युनिटी गैप' को भरने के लिए नियमित टीकाकरण जरूरी है.
अगर अभियान के दिन दवा न पिला पाएं, तो क्या करें?
अगर किसी कारणवश आपका बच्चा 21 दिसंबर को बूथ तक नहीं पहुंच पाता है, तो इन बातों का ध्यान रखें:
- कैच-अप डोज: अगले 2-3 दिनों तक स्वास्थ्य विभाग की टीमें घर-घर आएंगी, उन्हें सहयोग करें.
- नजदीकी केंद्र: आप स्वयं नजदीकी सरकारी अस्पताल (PHC/CHC) या आंगनवाड़ी केंद्र जाकर खुराक पिलवा सकते हैं.
- देरी न करें: सुरक्षा चक्र को टूटने न दें, जल्द से जल्द खुराक सुनिश्चित करें.
पोलियो ड्रॉप्स के पिलाने के बाद बच्चों में लक्षण
डॉ. अंकुर धीमान ने बताया कि यूं तो पोलियो ड्रॉप्स के बाद बच्चों में किसी तरह के कोई लक्षण नहीं दिखते हैं, न ही उन्हें किसी तरह की कोई समस्या होती है, लेकिन कुछ बच्चों में आलस्य (laziness) रहता है. वहीं, अगर बच्चा पोलियो ड्रॉप पिलाने के तुरंत बाद उल्टी (Vomit) कर देता है तो उसे दोबारा पोलियो ड्रॉप्स पिलानी पड़ेगी.
नजदीकी पोलियो बूथ पहुंचे
स्वास्थ्य विभाग ने सभी अभिभावकों से आग्रह किया है कि वे 21 दिसंबर को सुबह ही नजदीकी पोलियो बूथ पर पहुंचे. किसी भी प्रकार की अफवाहों पर ध्यान न दें. यह दवा विश्व स्तर पर प्रमाणित और पूरी तरह सुरक्षित है. 'दो बूंद जिंदगी की' केवल एक नारा नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ी को दिव्यांगता से बचाने का सुरक्षा कवच है. याद रखें, आपकी एक छोटी सी जागरूकता आपके बच्चे को ताउम्र की अपंगता से बचा सकती है.

