हिमाचल में इस दिन से मान्य नहीं होगी प्रधान की मुहर, 1 फरवरी से पंचायतों में लागू होगा ये नया सिस्टम
प्रदेश में 31 जनवरी के बाद पंचायत प्रतिनिधियों का कार्यकाल खत्म हो रहा है. जिसके बाद प्रतिनिधियों की वैधानिक शक्तियां स्वतः समाप्त हो जाएंगी.

By ETV Bharat Himachal Pradesh Team
Published : January 9, 2026 at 8:13 PM IST
|Updated : January 9, 2026 at 10:48 PM IST
शिमला: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट द्वारा पंचायत चुनावों को लेकर दिए गए सख्त आदेशों के बाद प्रदेश की राजनीति और प्रशासन के सामने एक बड़ा और संवेदनशील सवाल खड़ा हो गया है. हाईकोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि पंचायत चुनाव 30 अप्रैल से पहले हर हाल में पूरे किए जाएं. वहीं, प्रदेश की मौजूदा पंचायतों का कार्यकाल 31 जनवरी को समाप्त हो रहा है. ऐसे में 1 फरवरी से वर्तमान पंचायत प्रधानों, उपप्रधानों और सदस्यों की वैधानिक शक्तियां स्वतः समाप्त हो जाएंगी. इस स्थिति ने ग्रामीण विकास, भुगतान प्रक्रिया और प्रशासनिक फैसलों को लेकर आम लोगों की चिंता बढ़ा दी है.
प्रदेश में 31 जनवरी के बाद पंचायत प्रतिनिधियों का कार्यकाल खत्म होने से पंचायत स्तर पर एक तरह का प्रशासनिक शून्य पैदा हो जाएगा. यदि चुनाव प्रक्रिया समय पर पूरी नहीं होती, तो किसी भी पंचायत में प्रधान की मोहर से कोई भी सरकारी काम वैध नहीं माना जाएगा. इसका सीधा असर विकास कार्यों, मनरेगा भुगतान, निर्माण कार्यों की स्वीकृति और अन्य दैनिक प्रशासनिक गतिविधियों पर पड़ सकता है.
सरकार के पास मौजूद हैं वैकल्पिक रास्ते
हालांकि पंचायत व्यवस्था को पूरी तरह ठप होने से बचाने के लिए सरकार के पास कानूनी विकल्प मौजूद हैं. हिमाचल प्रदेश पंचायतीराज अधिनियम 1994 की धारा 140 की उपधारा (3) के तहत चुनाव पूरे होने तक पंचायतों का दायित्व या तो तीन सदस्यीय कमेटी को सौंपा जा सकता है या फिर पंचायत सचिव को जिम्मेदारी दी जा सकती है. इन दोनों व्यवस्थाओं के जरिए प्रदेश की 3577 पंचायतों में प्रशासनिक कामकाज सुचारू रूप से चलाया जा सकता है.
कानून के तहत पहला विकल्प यह है कि पंचायत संचालन के लिए तीन सदस्यीय कमेटी गठित की जाए. दूसरा विकल्प पंचायत सचिव को प्रशासनिक अधिकार देने का है. सरकार इनमें से किस विकल्प को चुनेगी, यह आने वाले दिनों में स्पष्ट होगा.फिलहाल ग्रामीण क्षेत्रों में लोग असमंजस की स्थिति में हैं कि 1 फरवरी के बाद पंचायतों का संचालन किसके हाथ में रहेगा.
लाहौल-पांगी में पहले अपनाया जा चुका है ये मॉडल
हिमाचल प्रदेश में पहले भी ऐसी स्थिति बन चुकी है. कोविड काल के दौरान लाहौल-स्पीति जिले के लाहौल ब्लॉक और चंबा जिले के पांगी ब्लॉक में पंचायत चुनाव देरी से होने पर तीन सदस्यीय कमेटी का गठन किया गया था. 26 जून 2021 को जारी अधिसूचना के तहत हेडमास्टर की अध्यक्षता में कमेटी बनाई गई थी, जिसमें पंचायत सचिव को मेंबर सेक्रेटरी और ग्राम रोजगार सेवक को सदस्य बनाया गया था. चुनाव होने तक पंचायतों का काम इसी कमेटी ने संभाला.
नियमों के अनुसार पंचायत समिति की शक्तियां संबंधित ब्लॉक के बीडीओ को और जिला परिषद की शक्तियां डीपीओ या एडीसी को सौंपी जा सकती हैं. वर्तमान में प्रदेश में 3577 ग्राम पंचायतें, 92 पंचायत समितियां और 249 जिला परिषद वार्ड हैं.इन सभी संस्थाओं की प्रशासनिक निरंतरता बनाए रखना सरकार के लिए बड़ी जिम्मेदारी है.
सरकार जल्द लेगी निर्णय
ग्रामीण विकास एवं पंचायतीराज विभाग के निदेशक राघव शर्मा ने बताया, "पंचायतीराज अधिनियम की धारा 140(3) के तहत पंचायतों का दायित्व सौंपने का प्रावधान स्पष्ट है. इस संबंध में आवश्यक फाइलें सरकार को भेजी जा रही हैं और जल्द ही अंतिम निर्णय लिया जाएगा, ताकि पंचायतों का काम प्रभावित न हो."
सरकार क्यों टाल रही थी पंचायत चुनाव?
गौरतलब है कि प्रदेश सरकार ने मानसून के दौरान आई भारी प्राकृतिक आपदा के चलते डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट लागू किया था. सरकार का तर्क रहा कि सड़कों के क्षतिग्रस्त होने और कई ग्रामीण क्षेत्रों का संपर्क टूटने के कारण चुनाव कराना संभव नहीं था. हालांकि विपक्ष ने इसे मुद्दा बनाते हुए विधानसभा में चुनाव कराने की मांग की. मामला हाईकोर्ट पहुंचा, जहां अदालत ने सरकार की दलीलों को खारिज करते हुए पंचायत चुनाव कराने के सख्त निर्देश जारी कर दिए. अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि सरकार पंचायतों की प्रशासनिक व्यवस्था को कैसे संभालती है और चुनावी प्रक्रिया को कितनी तेजी से पूरा करती है, ताकि ग्रामीण लोकतंत्र की गाड़ी बिना किसी रुकावट के आगे बढ़ती रहे.
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