पंचायत चुनाव मामला: हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाएगी सुक्खू सरकार?
हिमाचल हाईकोर्ट ने प्रदेश सरकार को 30 अप्रैल से पहले पंचायत चुनाव संपन्न करवाने के आदेश जारी किए हैं.

By ETV Bharat Himachal Pradesh Team
Published : January 9, 2026 at 9:12 PM IST
|Updated : January 9, 2026 at 10:48 PM IST
शिमला: हिमाचल प्रदेश में पंचायत चुनावों को लेकर राजनीतिक और कानूनी हलचल तेज हो गई है. हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के आदेश के बाद राज्य सरकार अब इस पूरे मामले पर मंथन के दौर में है. सरकार इस बात पर विचार कर रही है कि क्या हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाया जाए या नहीं. दरअसल, शुक्रवार को हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट में न्यायमूर्ति विवेक सिंह ठाकुर और न्यायमूर्ति रोमेश वर्मा की डबल बेंच ने पंचायत चुनावों को लेकर अहम फैसला सुनाया. अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिए कि 30 अप्रैल से पहले प्रदेश में पंचायत चुनाव करवाए जाएं. कोर्ट के इस आदेश को राज्य में पंचायती राज व्यवस्था से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है. हालांकि अदालत के इस फैसले के खिलाफ राज्य सरकार के पास अपील का विकल्प अब भी खुला है.
सुप्रीम कोर्ट जाने पर सरकार कर रही विचार
इस पूरे मामले में सरकार की मंशा को लेकर राज्य के महाधिवक्ता (Advocate General) अनूप रतन ने कहा कि हाईकोर्ट के फैसले को सरकार के लिए 'झटका' बताना सही नहीं है. AG ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार इस फैसले का अध्ययन कर रही है और सरकार से चर्चा के बाद ही यह तय किया जाएगा कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट जाना है या नहीं. फिलहाल सरकार किसी जल्दबाजी में फैसला नहीं लेना चाहती.
'पंचायत चुनावों से पीछे नहीं हट रही सरकार'
शिमला में प्रेस वार्ता के दौरान महाधिवक्ता अनूप रतन ने कहा कि राज्य सरकार कभी भी पंचायत चुनाव करवाने से पीछे नहीं हटी है. उन्होंने कहा कि यह दिखाने की कोशिश की जा रही है कि सरकार चुनाव टालना चाहती थी, जबकि सच्चाई यह है कि आपदा आने से पहले ही चुनाव प्रक्रिया शुरू की जा चुकी थी. सरकार की मंशा शुरू से ही पंचायत चुनाव करवाने की रही है.
आपदा और डीलिमिटेशन बना देरी का कारण
महाधिवक्ता ने बताया कि राज्य सरकार ने अदालत के सामने प्रदेश में आई प्राकृतिक आपदा और पंचायती राज डीलिमिटेशन से जुड़े लंबित मामलों का हवाला दिया था. सरकार का तर्क था कि आपदा के कारण प्रशासनिक संसाधन प्रभावित हुए और डीलिमिटेशन से जुड़ा मामला भी अदालतों में लंबित रहा. इसके बावजूद कोर्ट ने इन परिस्थितियों को नजरअंदाज करते हुए तय समयसीमा में चुनाव करवाने के निर्देश दिए.
सरकार के मुताबिक क्यों मुश्किल है तय समय में चुनाव?
महाधिवक्ता ने कहा कि हाईकोर्ट द्वारा तय की गई टाइमलाइन के भीतर पंचायत चुनाव करवाना व्यवहारिक रूप से कठिन है. उन्होंने बताया कि डीलिमिटेशन प्रक्रिया को लेकर राज्य सरकार ने चुनाव आयोग को पहले ही पत्र लिखा था, जिस पर 10 जनवरी तक कार्रवाई होनी थी. इसके बाद कानून के अनुसार 7 दिन शिकायतों के लिए और 7 दिन उनके निपटारे के लिए देना अनिवार्य है.
महाधिवक्ता के अनुसार डीलिमिटेशन से जुड़ी अपीलों के लिए डिविजनल कमिश्नर को 10 दिन और अपील की सुनवाई के लिए 15 दिन का समय देना जरूरी होता है. इस हिसाब से पूरी डीलिमिटेशन प्रक्रिया 24 फरवरी 2026 तक पूरी होनी थी. इसके बाद पंचायत चुनाव का रोस्टर जारी करने के लिए कम से कम एक महीने का समय जरूरी होता है.
महाधिवक्ता ने कहा कि राज्य सरकार 24 मार्च 2026 को पंचायत चुनाव का रोस्टर जारी करने के पक्ष में थी. लेकिन हाईकोर्ट के आदेश के बाद अब रोस्टर जारी करने के लिए केवल चार दिन का समय बचता है. ऐसे में चुनाव प्रक्रिया को सही तरीके से पूरा करना मुश्किल हो सकता है.
महाधिवक्ता ने यह भी कहा कि पंचायती राज कानून हिमाचल विधानसभा द्वारा बनाया गया है, जबकि डिजास्टर एक्ट संसद द्वारा पारित कानून है. ऐसे में संसद का कानून राज्य कानून से कमतर नहीं हो सकता. इस कानूनी पहलू पर भी सरकार आगे सवाल उठा सकती है.
HC के फैसले का अध्ययन करेगी सरकार: मुख्यमंत्री
वहीं, मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने कहा है कि सरकार हाईकोर्ट के फैसले का गहन अध्ययन करेगी. उन्होंने कहा कि सरकार भी अप्रैल-मई में चुनाव करवाना चाहती थी, लेकिन अगर आपदा की स्थिति में डिजास्टर एक्ट की भूमिका को नजरअंदाज किया गया है तो इसके मायने क्या रह जाते हैं. सरकार इस मुद्दे पर भी कानूनी स्पष्टता चाहती है.
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