हिमाचल के इस मंदिर में पैसे की जगह चढ़ता है घास का चढ़ावा, जानें क्यों पूरे परिसर में नहीं है एक भी दानपात्र
भगेड़ स्थित नंदेश्वर मंदिर में धन नहीं, बल्कि घास का चढ़ावा चढ़ाया जाता है. लोग यहां सिर्फ घास ही चढ़ाते हैं. नीरज शर्मा की रिपोर्ट

By ETV Bharat Himachal Pradesh Team
Published : August 23, 2026 at 8:54 PM IST
बिलासपुर : किसी आम मंदिर की तरह ही घुमारवीं के भगेड़ में स्थित नंदेश्वर महादेव मंदिर में सुबह से लेकर शाम तक मंदिर में श्रद्धालुओं का आना जाना लगा रहता है. मंदिर के बाहर का ये नजारा किसी दूसरे मंदिरों की तरह ही नजर आता है, लेकिन लोगों के सिर पर घास का गट्ठर इसे औरों से अलग बनाता है. यहां श्रद्धालु दान पात्र में पैसे या अनाज नहीं, बल्कि घास चढ़ाते हैं. ये मंदिर बिलासपुर जिले की घुमारवीं तहसील के भगेड़ में स्थित है.
यहां भगवान शिव को सोना-चांदी या नकदी नहीं, बल्कि घास का पुल्ला (घास का गट्ठर) और पशुओं के लिए चारा चढ़ाया जाता है. शिवलिंग पर भांग, धतूरे और जल की जगह घास ही चढ़ाई जाती है. मंदिर में अन्य देवताओं की मूर्तियां भी हैं, लेकिन यहां भी देवताओं को चढ़ावे के रूप में घास ही चढ़ाई जाती है. ये देवभूमि का इकलौता ऐसा धाम है जहां भक्त दानपात्र में सिक्के या नोट डालने के बजाय मंदिर में बेजुबानों का निवाला अर्पित करते हैं. यही कारण है कि यह मंदिर धार्मिक आस्था के साथ-साथ गौसेवा और मानवता का भी एक अनूठा केंद्र बन गया है.
रोजाना घास लेकर पहुंचते हैं लोग
स्थानीय निवासी कश्मीरी देवी ने बताया कि 'घास चढ़ाने की ये परंपरा लोगों की आस्था से जुड़ी हुई है. श्रद्धा के साथ घास चढ़ाने पर भगवान की कृपा प्राप्त होती है और लोगों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. मैं नियमित रूप से घास लेकर मंदिर आती हूं और इसे गौमाता के लिए अर्पित करती हूं.'
सभी मूर्तियों पर चढ़ता है घास का चढ़ावा
मंदिर में शिवलिंग और भगवान शिव परिवार की मूर्तियां स्थापित हैं. इसके अलावा राधा-कृष्ण, शनि देव और हनुमान जी की प्रतिमाएं भी यहां श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र हैं. मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां चढ़ाया गया चढ़ावा सीधे घायल और बेसहारा गौवंश के भरण-पोषण में उपयोग किया जाता है. पूजा-अर्चना के बाद यही घास मंदिर परिसर से जुड़े गौवंश सेवा केंद्र में रह रहे पशुओं को खिलाई जाती है. इस अनूठी परंपरा ने मंदिर को धार्मिक आस्था के साथ-साथ जीव सेवा का भी केंद्र बना दिया है. इस मंदिर में चढ़ावे की परिभाषा बदल चुकी है. मंदिर में चढ़ा घास का हर तिनका किसी बेजुबान जीव की टूटती सांसों के लिए प्राण फूंकने वाला है.

घायल पशु के उपचार से शुरू हुआ सफर
इस प्रेरणादायक पहल के पीछे बिलासपुर जिले के कोसरियां गांव निवासी समाजसेवी सुनील शर्मा का महत्वपूर्ण योगदान है. सुनील शर्मा ने बताया कि 'वर्ष 2009 में मैं किसी काम से भगेड़ क्षेत्र से गुजर रगा था. इसी दौरान उनकी नजर सड़क किनारे घायल अवस्था में पड़े एक बेसहारा गौवंश पर पड़ी. पशु की पीड़ा को देखकर उसकी देखभाल शुरू की. यही घटना मेरे जीवन बदलाव लाई और घायल एवं बेसहारा गौवंश की सेवा का संकल्प ले लिया. उसी वर्ष हमने यहां शिवलिंग की स्थापना कर नंदेश्वर महादेव मंदिर की नींव रखी.'

सुनील शर्मा ने बताया कि वर्ष 2009 में प्रगति समाज सेवा समिति और मंदिर की स्थापना कर घायल और बेसहारा गौवंश के उपचार एवं संरक्षण का कार्य शुरू किया गया. उस समय मैं एक निजी कंपनी में कार्यरत था और नौकरी के साथ-साथ पशुओं की सेवा भी करता था. बाद में वर्ष 2014 में नौकरी छोड़ दी और पूरी तरह गौसेवा के कार्य में जुटा. इसी वर्ष हमने मंदिर में घास चढ़ाने की अनूठी परंपरा शुरू की. लोगों से अपील की कि वो नकदी या अन्य वस्तुओं के बजाय पशुओं के लिए घास और चारा चढ़ाएं, ताकि यह सीधे घायल और बेसहारा गौवंश के काम आ सके.
पूरा परिवार करता है सुनील का सहयोग
आज आलम यह है कि गांव की पगडंडियों से लेकर दूर-दराज के क्षेत्रों तक, जब भी कोई श्रद्धालु नंदेश्वर महादेव के दर्शन को निकलता है, तो उसके हाथों में फूलों की टोकरी के साथ-साथ हरे घास का एक गट्ठर जरूर होता है. गौसेवा के इस कार्य में सुनील शर्मा के पूरे परिवार का भी सहयोग मिलता है. उनकी मातासरकारी विभाग से सेवानिवृत्त हैं, बच्चों की देखभाल करती हैं, जबकि उनकी बहनें भी हर कदम पर उनका साथ देती हैं. परिवार और समाज के सहयोग से ही यह सेवा कार्य लगातार आगे बढ़ रहा है. सुनील कुमार के मुताबिक घायल और बेसहारा गौवंश की सेवा के लिए सरकार से किसी प्रकार की आर्थिक सहायता नहीं ली है. यह पूरा कार्य समाज और लोगों के सहयोग से संचालित हो रहा है.

सेवा केंद्र में 25-30 की संख्या में गौवंश की देखभाल
आज इस मंदिर के गौ सेवा केंद्र में 25 से 30 गौ वंश रह रहा है. उनके चारे और इलाज और आश्रय की व्यवस्था इसी मंदिर से होती है. हल्के रूप से घायल पशुओं का उपचार मौके पर ही कर दिया जाता है, जबकि गंभीर रूप से घायल पशुओं को सेवा केंद्र में लाकर उपचार और आश्रय दिया जाता है. कुछ ऐसे पशु भी हैं जिनकी कई वर्षों से इसी सेवा केंद्र में देखभाल हो रही है. कई बार अत्यधिक गंभीर रूप से घायल पशुओं को बचाया नहीं जा सकता, लेकिन अंतिम समय तक उन्हें उपचार और देखभाल उपलब्ध करवाई जाती है.
स्थानीय निवासी रीना कुमारी ने 'कई सालों से इस मंदिर में आ रही हैं. उन्होंने कहा कि यहां गौमाता की बहुत अच्छी तरह से सेवा की जा रही है. घास खिलाने की व्यवस्था एक सराहनीय पहल है, क्योंकि गौसेवा के लिए दिया गया चारा सीधे जरूरतमंद पशुओं के काम आता है.'
मंदिर में नहीं कोई दानपात्र
खास बात ये है कि इस मंदिर में कोई दान पत्र ही नहीं लगा है, क्योंकि मंदिर संस्थापक सुनील शर्मा का मानना है कि मंदिरों में धन चढ़ाने को लेकर कई बार लोगों के बीच संशय रहता है और उसके दुरुपयोग की संभावना भी बनी रहती है. हमने देखा कि उपचार केंद्र में लाई गई घायल और बेसहारा गायों के लिए सबसे बड़ी जरूरत चारे की होती है, तब उन्होंने संकल्प लिया कि ऐसा मंदिर बनाया जाए जहां धन नहीं, बल्कि गौमाता के लिए घास और चारा चढ़ाया जाए. उनका उद्देश्य यही था कि श्रद्धालुओं द्वारा अर्पित किया गया चारा सीधे गौसेवा में उपयोग हो और हर घर का योगदान घायल एवं बेसहारा गौवंश तक पहुंचे.
इस अनूठी परंपरा को लोगों का भरपूर सहयोग मिल रहा है. आसपास के गांवों और दूर-दराज क्षेत्रों से भी श्रद्धालु घास के गट्ठर ही नहीं, बल्कि कई बार घास से भरी पूरी गाड़ियां तक यहां छोड़ जाते हैं. इसी जनसहयोग के कारण गौशाला में रह रहे घायल और बेसहारा गौवंश के लिए आज तक चारे की कोई कमी नहीं आई है.
मंदिर पहुंचे जीवन कुमार ने बताया कि 'यहां पिछले कुछ सालों से एक अनोखी परंपरा चली आ रही है. मंदिर में भगवान को धन या अन्य वस्तुओं के बजाय पशुओं के लिए घास चढ़ाई जाती है. हमारा मानना है कि श्रद्धा और विश्वास के साथ घास अर्पित करने से लोगों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं. मैं स्वयं घास काटकर मंदिर में लाता हूं और इसे पशुओं के चारे के रूप में अर्पित करता हूं.'
'सरकार को गौवंश समस्या पर गंभीरता से करना होगा चिंतन'
सुनील शर्मा ने कहा कि गौवंश से जुड़ी समस्या के समाधान के लिए सरकार को गंभीर और प्रभावी कदम उठाने चाहिए. शराब की हर बोतल पर सरकार दस रुपये ले रही है. पिछले वर्ष इसी तरह के विभिन्न स्रोतों से सरकार ने करीब सौ करोड़ रुपये एकत्र किए. मंदिर ट्रस्टों से 15 प्रतिशत लिया जा रहा है, बिजली की प्रत्येक यूनिट पर दस पैसे का टैक्स लिया जा रहा है और वाहनों की खरीद पर भी शुल्क वसूला जा रहा है. इसके बावजूद यदि गौवंश से जुड़ी समस्या का समाधान नहीं हो पा रहा है तो यह गंभीर चिंता का विषय है.
मंदिर की सीढ़िया चढ़ रहे श्रद्धालु को देखकर ऐसा लगता है कि मानो आस्था और करुणा का एक हरा-भरा कारवां महादेव का अभिषेक करने जा रहा हो. नंदेश्वर महादेव मंदिर आज केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि सेवा, करुणा और गौसंरक्षण का प्रतीक बन चुका है. यहां चढ़ाया जाने वाला प्रत्येक घास का गट्ठर यह संदेश देता है कि सच्ची श्रद्धा के साथ जरूरतमंद जीवों की सेवा में भी निहित होती है.

