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हिमाचल ने 2011 की तबाही से कैसे लिया सबक? जब ढाई घंटे की ओलावृष्टि ने उजाड़े थे सेब बागान

साल 2011 में मौसम की मार ने बागवानों की साल भर की मेहनत पर पानी फेर दिया था, जिससे उद्यान विभाग ने सबक लिया.

Himachal Horticulture Department
सेब बागानों के लिए एंटी-हेल नेट (@Dr. Kushal Mehta)
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By ETV Bharat Himachal Pradesh Team

Published : April 28, 2026 at 1:23 PM IST

4 Min Read
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शिमला: हिमाचल प्रदेश में शिमला जिले के रत्नाड़ी-बागी क्षेत्र के लिए 7 जून 2011 का दिन आज भी एक काले अध्याय के रूप में याद किया जाता है. 7 जून 2011 को इस क्षेत्र में करीब ढाई घंटे तक भीषण ओलावृष्टि हुई थी. जिसके चलते यहां पर सेब बागान पूरी तरह से तबाह हो गए थे. इस भीषण ओलावृष्टि से पेड़ों के पत्ते तक पूरी तरह से झड़ गए थे, फलों की छाल उतर गई और कई कई पेड़ों के तनों को बुरी तरह से नुकसान पहुंचा था. इस प्राकृतिक आपदा ने साल 2011 में बागवानों की सालभर की मेहनत पर पानी फेर दिया था.

क्यों हुआ था सबसे ज्यादा नुकसान ?

उद्यान विभाग शिमला के वरिष्ठ अधिकारी डॉक्टर कुशाल मेहता ने बताया 7 जून 2011 में प्राकृतिक आपदा से हुई इस तबाही के बाद बागवानी विभाग ने बागवानों का साथ नहीं छोड़ा था. बागवानी विभाग के अधिकारियों ने मौके पर पहुंचकर नुकसान का जायजा लिया था और बागवानों को लगातार तकनीकी मार्गदर्शन और जरूरी सहायता भी उपलब्ध करवाई थी. उस समय अधिकारियों ने पाया की वहां किसी भी बगीचे में ओला अवरोधक जाली (Anti-Hail Net) नहीं लगी थी, जिससे नुकसान और भी ज्यादा हुआ था.

"2011 में क्षेत्र में भारी ओलावृष्टि हुई थी. उस साल फसल बिलकुल भी नहीं हुई थी. उस दिन लगभग लगातार 2 घंटे से ज्यादा ओलावृष्टि हुई थी, जिससे लोगों को भारी नुकसान हुआ था. बागी व रत्नाड़ी दोनों पंचायतों से लगभग 10 से 12 लाख तक सेब की पेटियां हर साल फसल अच्छी होने पर निकलती हैं. अगर आने वाले समय में मौसम बेहतर रहता है तो, इस बार भी सेब की फसल बेहतरीन होने की संभावना है." - प्रीतम सिंह, उप प्रधान, रत्नाड़ी

ओलावृष्टि से हुई तबाही ने दिखाई नई राह

उद्यान विभाग शिमला के वरिष्ठ अधिकारी डॉक्टर कुशाल मेहता ने बताया की 'इसी संकट ने सेब बागवानी के क्षेत्र में बदलाव की नई राह दिखाई थी. बागवानी विभाग ने पहल करते हुए एंटी-हेल नेट लगाने को लेकर बढ़ावा दिया और इसके लिए बागवानों को 80 प्रतिशत तक सब्सिडी भी दी गई. इस योजना को बागवानों ने सकारात्मक रूप से अपनाया और धीरे-धीरे पूरे क्षेत्र में एंटी-हेल नेट लगाई जाने लगी. जो कि सेब बागानों के लिए किसी वरदान से कम नहीं थी.'

'एंटी-हेल नेट से सुरक्षित सेब बागान'

डॉ. कुशाल मेहता ने बताया कि आज के समय में रत्नाड़ी-बागी क्षेत्र में ज्यादातर सेब बागान एंटी-हेल नेट से सुरक्षित नजर आते हैं. ये बदलाव सेब बागानों के लिए सिर्फ एक तकनीकी सुधार नहीं है, बल्कि बागवानों की जागरूकता, अनुभव और सामूहिक प्रयास का परिणाम है. अब मौसम की मार से होने वाले नुकसान में काफी कमी आई है और बागवानों का आत्मविश्वास भी बढ़ा है. उन्होंने कहा कि इस सफल परिवर्तन के लिए क्षेत्र के सभी बागवान बधाई के पात्र हैं, जिन्होंने मुश्किल समय में सीख लेकर अपने भविष्य को सुरक्षित बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाए. इसके साथ ही बागवानों ने भी उद्यान विभाग का आभार व्यक्त किया.

बागवान विजय ने बताया कि "उस दिन भारी ओलावृष्टि हुई थी. सेब बागवानों के सामने उनकी साल भर की पूरी फसल जमींदोज हो गई थी. जिसके बाद बागवानों व उद्यान विभाग ने सबक लिया और उद्यान विभाग द्वारा अनुदान राशि पर दिए जा रहे नेट का प्रयोग करना शुरू किया. जिससे काफी हद तक ओलावृष्टि से राहत मिली है."

ओलावृष्टि के अलावा अन्य समस्याएं

बागवान राजेन्द्र ने बताया कि अब 40 प्रतिशत तक फसल की पैदावार कम हो रही है. मौसम की मार पड़ने से भारी नुकसान होना शुरू हो गया है. उन्होंने बताया कि ओलावृष्टि के साथ-साथ अन्य समस्याओं से भी बागवानों को जूझना पड़ रहा है.

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