21 करोड़ के फर्जी GST इनपुट टैक्स क्रेडिट मामले में आरोपी को राहत नहीं, हाईकोर्ट ने खारिज की FIR रद्द करने की याचिका
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि शुरुआत से धोखाधड़ी की मंशा होने पर आपराधिक कार्रवाई से नहीं बचा जा सकता. पढ़ें पूरी रिपोर्ट.

By ETV Bharat Himachal Pradesh Team
Published : September 2, 2026 at 6:31 PM IST
शिमला: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने फर्जी कंपनियों के माध्यम से करीब 21 करोड़ रुपये के इनपुट टैक्स क्रेडिट से जुड़े एक मामले में आरोपी की FIR रद्द करने की याचिका खारिज कर दी है. न्यायाधीश संदीप शर्मा ने विनोद कुमार की आपराधिक याचिका पर फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि यदि किसी मामले में शुरुआत से ही धोखाधड़ी की मंशा मौजूद हो, तो आरोपी व्यापारिक समझौते या हर्जाना संबंधी प्रावधानों की आड़ लेकर आपराधिक कार्रवाई से नहीं बच सकता.
मामले के अनुसार मैसर्स जीटी आयरन स्टोर के प्रोपराइटर विनोद कुमार को सिरमौर स्थित मैसर्स अंबा शक्ति इस्पात लिमिटेड ने स्क्रैप सप्लाई के लिए कमीशन एजेंट नियुक्त किया था. आरोप है कि उन्होंने दो सप्लायर फर्मों मैसर्स महेश ट्रेडिंग कंपनी और मैसर्स राजश्री ट्रेडिंग कंपनी को कंपनी से जोड़ा और इनके फर्जी पैन, आधार और जीएसटी पंजीकरण दस्तावेज प्रस्तुत किए.
इन दोनों कंपनियों के बिलों के आधार पर अंबा शक्ति लिमिटेड ने क्रमश: 11.03 करोड़ रुपये और 10.44 करोड़ रुपये, यानी कुल 21 करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान माल की लागत और आईजीएसटी के रूप में कर दिया. आरोपी को इस प्रक्रिया में करीब 6.05 लाख रुपये का कमीशन मिला. 20 जुलाई 2021 को जीएसटी विभाग ने अंबा शक्ति कंपनी के परिसरों पर छापा मारा. जांच में सामने आया कि दोनों सप्लायर फर्में फर्जी और गैर-मौजूद थीं. इनके माध्यम से फर्जी इनवॉइस तैयार कर गलत तरीके से इनपुट टैक्स क्रेडिट का दावा किया गया था, जिससे सरकारी खजाने को नुकसान हुआ. कंपनी को स्वयं एक करोड़ रुपये जमा करने पड़े, जबकि विभाग ने 2.66 करोड़ रुपये की अतिरिक्त मांग भी निकाली. याचिकाकर्ता ने अदालत में तर्क दिया कि मामला मूल रूप से दीवानी विवाद है और समझौते की धारा 7 और 8 के तहत सप्लायर के बोगस पाए जाने पर एजेंट को नुकसान की भरपाई करनी थी.
हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया. अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता को यह जानकारी थी कि जिन कंपनियों को वह पेश कर रहा है, वे बोगस हैं और इसके बावजूद उसने उनके फर्जी दस्तावेज तैयार कर उन्हें वास्तविक कंपनियों के रूप में प्रस्तुत किया. अदालत के अनुसार यह शुरुआत से मौजूद आपराधिक मंशा को दर्शाता है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जहां जालसाजी और धोखाधड़ी के आरोप प्रत्यक्ष रूप से सामने आते हैं, वहां दीवानी और आपराधिक दोनों जिम्मेदारियां एक साथ चल सकती हैं. इसी आधार पर हाईकोर्ट ने प्राथमिकी और उससे जुड़ी आपराधिक कार्रवाई को रद्द करने की मांग खारिज कर दी.

