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सोने की किट्टी स्कीम में 65.28 लाख की धोखाधड़ी, जालंधर के आभूषण कारोबारियों की याचिका खारिज

हिमाचल हाईकोर्ट ने धोखाधड़ी के मामले में जालंधर के आभूषण कारोबारियों की याचिका खारिज कर दी. हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा.

हिमाचल हाईकोर्ट
हिमाचल हाईकोर्ट (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Himachal Pradesh Team

Published : August 28, 2026 at 1:17 PM IST

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शिमला: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने सोने की किट्टी स्कीम के नाम पर हुई लाखों रुपये की धोखाधड़ी के मामले में पंजाब के जालंधर के आभूषण कारोबारियों की याचिका खारिज कर दी है. न्यायमूर्ति वीरेंद्र सिंह ने निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए स्पष्ट किया कि भले ही आरोपी व्यापारी जालंधर से अपना कारोबार चलाते हों, लेकिन उनके खिलाफ मुकदमा कुल्लू, हिमाचल प्रदेश की अदालत में ही चलेगा.

हाईकोर्ट ने आरोपियों की ओर से क्षेत्राधिकार को लेकर दी गई दलील को सिरे से खारिज कर दिया. न्यायमूर्ति वीरेंद्र सिंह ने कहा कि इस मामले में मौखिक समझौते की शुरुआत और डील भुंतर, कुल्लू स्थित नरेंद्र राणा की दुकान पर हुई थी. इसलिए इस मामले का मुख्य कारण हिमाचल प्रदेश में ही पैदा हुआ है. अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल इस आधार पर कि आरोपी व्यापारी जालंधर से अपना कारोबार चलाते हैं, कुल्लू की अदालत का क्षेत्राधिकार समाप्त नहीं हो जाता. हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए जालंधर के आभूषण कारोबारियों की याचिका खारिज कर दी. इसके साथ ही मामले की सुनवाई कुल्लू की अदालत में जारी रहने का रास्ता साफ हो गया है.

मामला भुंतर, कुल्लू के आभूषण कारोबारी नरेंद्र राणा की ओर से जालंधर की एक कंपनी के मालिकों के खिलाफ दायर मुकदमे से जुड़ा है. शिकायतकर्ता का आरोप है कि पंजाब के इन व्यापारियों ने भुंतर आकर उन्हें सोने की किट्टी स्कीम में शामिल होने का लालच दिया था. इसके बाद उसने स्कीम के तहत कुल 2823 ग्राम सोना जमा कराया था. इसमें से आरोपियों ने 1803 ग्राम सोना तो वापस कर दिया, लेकिन शेष 1020 ग्राम सोना वापस नहीं किया.

इस बचे हुए सोने की कीमत करीब 65,28,000 रुपये बताई गई है. इसके बाद भुंतर के आभूषण कारोबारी नरेंद्र राणा ने जालंधर की कंपनी के मालिकों के खिलाफ मामला दर्ज कराया. जालंधर के आभूषण कारोबारियों ने कुल्लू की अदालत में अर्जी दाखिल कर दलील दी कि उनका पूरा कारोबार पंजाब में है. ऐसे में कुल्लू की अदालत के पास इस मामले की सुनवाई का कानूनी अधिकार यानी क्षेत्राधिकार नहीं है. हालांकि, निचली अदालत ने उनकी इस अर्जी को खारिज कर दिया. इसके बाद आरोपियों ने निचली अदालत के फैसले को हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट में चुनौती दी थी.

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