OPS पर हिमाचल हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, ये पूर्व कर्मचारी भी होंगे पुरानी पेंशन के हकदार
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट का पुरानी पेंशन पर बड़ा फैसला. कोर्ट ने कहा 15 मई 2003 से पहले वर्कचार्ज स्टेटस पाने वाले कर्मचारी ओपीएस के हकदार.


By ETV Bharat Himachal Pradesh Team
Published : June 23, 2026 at 12:54 PM IST
|Updated : June 23, 2026 at 1:03 PM IST
शिमला: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने पेंशन से जुड़े मामले में एक बड़ा फैसला सुनाया है. राज्य की उच्च अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि किसी कर्मचारी को 15 मई 2003 से पहले वर्कचार्ज स्टेटस मिल गया था, तो वो कर्मचारी पुरानी पेंशन यानि नियम 1972 के तहत सेवानिवृत्ति लाभों का हकदार होगा. भले ही कर्मचारी का नियमितीकरण 2003 के बाद ही हुआ हो. हिमाचल प्रदेश में 15 मई 2003 को ओपीएस बंद कर नई पेंशन स्कीम लागू कर दी गई थी. ऐसे में इसी तारीख को OPS लाभ के लिए कट ऑफ डेट तय किया गया है.
पेंशन रोकने के 2019 के आदेश को पूरी तरह से रद्द
कर्मचारियों की पेंशन के मामले में जुड़ी हुई याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की अदालत ने वित्त विभाग के 2019 के उन आदेशों को रद्द कर दिया है, जिसमें वित्त विभाग की ओर से पेंशन रोकने के आदेश जारी किए गए थे. साथ ही अदालत ने प्रतिवादी राज्य सरकार और वन विभाग को निर्देश दिए हैं कि याचिकाकर्ताओं को OPS तहत पेंशन और ग्रेच्युटी और लीव एनकैशमेंट के लाभ दिए जाएं. अदालत ने कहा कि पुरानी पेंशन का लाभ पाने के लिए केवल ये साबित करना जरूरी है कि कर्मचारी को वर्क चार्ज स्टेटस 15 मई 2003 से पहले मिल चुका हो.
डेली वेज के रूप में हुए थे नियुक्त
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि वर्क चार्ज अवधि को भी पेंशन की गणना के लिए नियमित सेवा के साथ जोड़ा जाता है. इस मामले में दोनों याचिकाकर्ताओं को यह दर्जा साल 2003 और 2001 में ही मिल चुका था. ऐसे में याचिकाकर्ता और उसके एक अन्य साथी को साल 1993 और 1991 में वन विभाग में डेली वेजर के रूप में नियुक्त किया गया था. इसके बाद इन्हें विभाग ने फरवरी 2003 और अप्रैल 2001 से वर्क चार्ज स्टेटस दे दिया था. बाद में साल 2007 में इस कर्मचारियों सेवाओं को नियमित किया गया.
राज्य सरकार की दलील को किया खारिज
दरअसल याचिकाकर्ता ने विभाग से गुहार लगाई थी कि उन्हें राज्य सरकार के दायरे में लाते हुए पेंशनर के सभी लाभ दिए जाएं, लेकिन राज्य सरकार ने 13 मई 2019 को उनकी अर्जी को खारिज कर दिया. राज्य सरकार ने तर्क दिया कि उनकी सेवाएं 15 मई 2003 के बाद नियमित हुई हैं, इसलिए वो पुरानी पेंशन के हकदार नहीं हैं. ऐसे में याचिकाकर्ता ने राज्य सरकार के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी. वहीं, सरकार की ओर से अदालत में तर्क दिया गया कि याचिकाकर्ता वर्ष 2007 में नियमित होने के बाद ही राज्य सरकार के पूर्ण कर्मचारी बने थे. याचिकाकर्ता का नियमितीकरण कट-ऑफ तारीख यानि 15 मई 2003 के बाद का है, इसलिए उन्हें 1972 के पेंशन नियमों के दायरे में नहीं लाया जा सकता. हालांकि अदालत ने सरकार की इस दलील को पूरी तरह से खारिज कर दिया.
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