हिमाचल के जंगलों में छिपी 22,600 करोड़ की दौलत, अब AI से खुलेगा कमाई का रास्ता
इस पहल के तहत प्रदेश में उपलब्ध विभिन्न स्थानीय प्रजातियों की आर्थिक क्षमता का अधिकतम उपयोग किया जाएगा.

By ETV Bharat Himachal Pradesh Team
Published : August 20, 2026 at 6:05 PM IST
शिमला: हिमाचल के जंगल अब सिर्फ हरियाली और पर्यावरण संरक्षण तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का बड़ा आधार बन सकते हैं. प्रदेश के जंगलों और चरागाहों में मौजूद प्राकृतिक संसाधनों की अप्रयुक्त आर्थिक क्षमता को वैज्ञानिक तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और स्थानीय समुदायों की भागीदारी से सामने लाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है. इसके लिए हिमाचल प्रदेश वन विभाग ने भारती इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक पॉलिसी, इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस यानी ISB-BIPP के साथ पांच वर्ष के समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं. मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू की मौजूदगी में हुए इस समझौते के तहत जंगलों की आर्थिक क्षमता का वैज्ञानिक आकलन कर उसे ग्रामीणों और महिला नेतृत्व वाली उत्पादक कंपनियों की आय से जोड़ने की तैयारी है.
वन विभाग की ओर से प्रधान मुख्य अरण्यपाल डॉ. संजय सूद और भारती इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक पॉलिसी, ISB की ओर से कार्यकारी निदेशक प्रो. अश्विनी छत्रे ने एमओयू पर हस्ताक्षर किए. मुख्यमंत्री ने कहा कि वन विभाग और ISB-BIPP की यह साझेदारी प्रदेश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है. उन्होंने कहा कि हिमाचल उन अग्रणी राज्यों में शामिल होने की दिशा में बढ़ रहा है, जहां विज्ञान, स्थानीय समुदायों और सरकार को एक साथ जोड़कर वन प्रबंधन में व्यापक बदलाव लाया जा सकता है.
स्थानीय प्रजातियों की होगी ब्रांडिंग
मुख्यमंत्री ने कहा कि इस पहल के तहत प्रदेश में उपलब्ध विभिन्न स्थानीय प्रजातियों की आर्थिक क्षमता का अधिकतम उपयोग किया जाएगा. इसमें हरड़ और बेल जैसी औषधीय वनस्पतियां शामिल हैं. इसके अलावा थांगी यानी हेजलनट के पोषण और व्यावसायिक महत्व का भी विस्तृत आकलन किया जाएगा, ताकि स्थानीय संसाधनों को रोजगार और आय के नए अवसरों में बदला जा सके.
500 वन रक्षकों ने जुटाया दो लाख से ज्यादा पेड़ों का डेटा
एमओयू पर हस्ताक्षर से पहले ISB-BIPP की टीम ने संयुक्त वन सर्वेक्षण के निष्कर्ष प्रस्तुत किए. इस सर्वेक्षण में 500 से अधिक वन रक्षकों ने कई महीनों तक काम करते हुए दो लाख से अधिक पेड़ों से संबंधित आंकड़े और प्रजातियों की पहचान वाली तस्वीरें जुटाईं. इन आंकड़ों को सैटेलाइट इमेजरी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग तकनीक से जोड़ा गया. इसके बाद मौके पर जाकर आंकड़ों का सत्यापन भी किया गया. खैर, बांस, चीड़, आंवला, जंगली आम, साल और बुरांश सहित सात प्रजातियों के मानचित्र तैयार किए गए हैं. इस पूरे कार्य को संयुक्त रूप से ‘काउंटिंग ग्रीन वेल्थ’ के नाम से प्रकाशित किया गया है.
जंगलों में छिपी 22,600 करोड़ की आर्थिक क्षमता
वन सर्वेक्षण में पांच जैव संसाधनों में कुल 22,600 करोड़ रुपये की अप्रयुक्त आर्थिक क्षमता का अनुमान सामने आया है. इसमें आंवला की संभावित कीमत 8,700 करोड़ रुपये, चीड़ की पत्तियों की 5,500 करोड़ रुपये, जंगली आम की 4,800 करोड़ रुपये, साल के बीज की 2,400 करोड़ रुपये और बुरांश के फूलों की 1,200 करोड़ रुपये आंकी गई है. हालांकि, सरकार ने स्पष्ट किया है कि इन संसाधनों का उपयोग पर्यावरणीय रूप से टिकाऊ तरीके से और प्रत्येक प्रजाति के लिए निर्धारित उचित मात्रा तक ही सीमित रखा जाएगा, ताकि आर्थिक गतिविधियों के साथ जंगलों और जैव विविधता का संरक्षण भी सुनिश्चित हो.
महिलाओं की कंपनी बनी मॉडल, थांगी से कारोबार
पांगी की पीर पंजाल जंगल प्रोड्यूसर कंपनी को इस पहल के सफल उदाहरण के तौर पर प्रस्तुत किया गया. महिलाओं के स्वामित्व वाली यह कंपनी थांगी के कारोबार से जुड़ी है. ऐसे में जंगलों से मिलने वाले उत्पादों को केवल कच्चे माल के रूप में बेचने के बजाय उन्हें सामुदायिक उद्यम और बाजार से जोड़कर ग्रामीण परिवारों की आय बढ़ाई जा सकती है. सर्वेक्षण से प्राप्त आंकड़ों का उपयोग पहले ही पालमपुर वन मंडल की कार्ययोजना में किया जा रहा है. इसे इस तरह का पहला उदाहरण बताया गया है. अब एमओयू के माध्यम से इस व्यवस्था को अन्य वन मंडलों और आगे चलकर पूरे हिमाचल प्रदेश में लागू करने की योजना है.
वैज्ञानिक शोध और जमीनी अनुभव का मेल
एमओयू के अवसर पर प्रो. अश्विनी छत्रे ने कहा कि यह साझेदारी बताती है कि वैज्ञानिक शोध को जमीनी अनुभव से जोड़ने पर बेहतर परिणाम हासिल किए जा सकते हैं. उन्होंने कहा कि 500 से अधिक वन रक्षकों ने कई महीनों तक आंकड़े एकत्र किए, जिससे आर्थिक निर्णय लेने के लिए तैयार किए गए अनुमानों को विश्वसनीय आधार मिला है. भारती इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक पॉलिसी, ISB की निदेशक डॉ. आरुषि जैन ने कहा कि इन आंकड़ों का उपयोग पालमपुर की कार्ययोजना तैयार करने में किया जा रहा है. एमओयू के माध्यम से इस वैज्ञानिक जानकारी और चरागाह संबंधी डेटाबेस को पूरे प्रदेश में विस्तारित किया जाएगा.
चार मोर्चों पर होगा काम
पांच वर्ष के एमओयू में चार प्रमुख क्षेत्रों को शामिल किया गया है. इनमें वन अर्थव्यवस्था और सामुदायिक उद्यम के तहत महिला नेतृत्व वाली उत्पादक कंपनियों को बढ़ावा देकर उन्हें बाजार से जोड़ा जाएगा. दूसरा फॉरेस्ट इंटेलिजेंस प्लेटफॉर्म है, जिसे पहले पालमपुर में शुरू किया जाएगा और बाद में पूरे प्रदेश में लागू किया जाएगा. तीसरे क्षेत्र में चराई पोर्टल और चरागाह आधारित डेटाबेस शामिल है. इसे हिमाचल प्रदेश ग्रेजिंग पॉलिसी, 2026 के तहत आधार, हिम परिवार, भारत पशुधन और पहल योजना से जोड़ा जाएगा. चौथे क्षेत्र में वन विभाग के कर्मचारियों और उत्पादक कंपनियों के प्रशिक्षण एवं क्षमता विकास पर काम किया जाएगा.
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