हिमाचल के इस जिले में 'पीली क्रांति' की धमाकेदार दस्तक, 360 क्विंटल हल्दी की होगी खरीद
अदरक, लहसुन में पहले ही दमदार प्रदर्शन कर चुके जिले ने अब हल्दी में ऐसी छलांग लगाई, जिससे कृषि क्षेत्र में नई संभावनाएं उभरी हैं.

By ETV Bharat Himachal Pradesh Team
Published : March 3, 2026 at 8:55 AM IST
सिरमौर: हिमाचल प्रदेश के तहत जिला सिरमौर की धरती पर इस बार फिर हल्दी किसानों की आर्थिकी को मजबूत करेगी, जिले में प्राकृतिक खेती से जुड़े करीब 11 हजार किसानों के बीच हल्दी आय का नया विकल्प बनकर उभर रही है. अदरक और लहसुन में पहले ही दमदार प्रदर्शन कर चुके जिले ने अब हल्दी में ऐसी छलांग लगाई है, जिससे कृषि क्षेत्र में नई संभावनाएं उभरी हैं.
दरअसल प्रदेश सरकार की ओर 9000 रुपये प्रति क्विंटल (90 रुपये प्रति किलो) के हिसाब से खरीद शुरू किए जाने के बाद किसानों का उत्साह दोगुना हो गया है. आत्मा परियोजना सिरमौर के निदेशक डॉ साहब सिंह ने बताया कि 'जिले में पिछले वर्ष जहां केवल 20 क्विंटल हल्दी खरीदी गई थी, वहीं इस साल करीब 56 किसानों से लगभग 360 क्विंटल प्राकृतिक तरीके से लगाई गई हल्दी खरीदने की तैयारी है. यह सिर्फ वृद्धि नहीं, बल्कि एक कृषि परिवर्तन की मजबूत शुरुआत मानी जा रही है. खेतों में फसल कटाई के लिए पूरी तरह तैयार है और किसान बेहतर दाम मिलने की उम्मीद में उत्साहित हैं.'
जानवरों से हल्दी रहती है सुरक्षित
परियोजना निदेशक डॉ साहब सिंह ने बताया कि 'हल्दी की खेती का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह जंगली जानवरों से कम प्रभावित होती है. जिन क्षेत्रों में बंदर या जंगली सूअर फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं, वहां भी हल्दी अपेक्षाकृत सुरक्षित रहती है. यह लगभग 280 दिनों में तैयार होने वाली कम पानी की फसल है. इसे फरवरी से जून के बीच लगाया जा सकता है. खास बात यह है कि हल्दी में रोग बेहद कम आते हैं, इसलिए कीटनाशकों की जरूरत लगभग नहीं पड़ती। प्राकृतिक खेती के मॉडल में यह फसल पूरी तरह अनुकूल मानी जा रही है.'
उन्नत किस्में, ज्यादा कर्क्यूमिन–अधिक कमाई
उन्होंने बताया कि जिले में कृषि विज्ञान केंद्र सिरमौर (धौलाकुआं) और हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय के सहयोग से 'राजेंद्र सोनिया' और 'प्रगति' किस्मों को बढ़ावा दिया जा रहा है. प्रगति में कर्क्यूमिन 5% से अधिक और राजेंद्र सोनिया में 8.4% से अधिक पाया गया है. उच्च कर्क्यूमिन प्रतिशत का अर्थ है बेहतर गुणवत्ता और बेहतर बाजार मूल्य. यही वजह है कि किसान पारंपरिक फसलों के साथ अब हल्दी को भी प्राथमिकता दे रहे हैं.

सेहत भी, समृद्धि भी
डॉ साहब सिंह के अनुसार हल्दी भारतीय रसोई की आत्मा है और एक शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट भी. प्राकृतिक तरीके से उगाई गई हल्दी रसायन मुक्त होने के कारण स्वास्थ्य की दृष्टि से अधिक लाभकारी मानी जाती है. यही कारण है कि हल्दी अब सिर्फ मसाला नहीं, बल्कि आर्थिक सशक्तिकरण का माध्यम बनती जा रही है. प्राकृतिक खेती न केवल किसानों की लागत घटा रही है, बल्कि मिट्टी की सेहत सुधारने और बेहतर गुणवत्ता वाली फसल देने में भी कारगर साबित हो रही है. हल्दी जैसी नगदी फसल में न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद की व्यवस्था से किसानों का भरोसा बढ़ा है. मार्च के दूसरे सप्ताह से प्राकृतिक हल्दी की प्रोक्योरमेंट शुरू की जाएगी, जिससे किसानों को अपनी उपज का उचित दाम मिल सके. विभाग का उद्देश्य अधिक से अधिक किसानों को प्राकृतिक खेती से जोड़कर उनकी आय में स्थायी बढ़ोतरी सुनिश्चित करना है.
45 किलो हल्दी से बदली किसान तारावती की किस्मत
उधर पांवटा साहिब के केदारपुर गांव की किसान तारावती ने बताया कि 'रासायनिक खेती छोड़ प्राकृतिक खेती अपनाई तो नतीजे उम्मीद से बेहतर मिले. पिछले वर्ष सीमित क्षेत्र में लगभग 45 किलो हल्दी लगाकर अच्छा उत्पादन प्राप्त किया और सरकारी खरीद में भागीदारी की. इससे प्राकृतिक खेती की संभावनाओं का भरोसा मिला. इस वर्ष रकबा बढ़ाकर करीब पौने दो क्विंटल हल्दी लगाई है और उत्पादन करीब 22 क्विंटल तक पहुंचने की उम्मीद है. बेहतर दाम और कम लागत के कारण आय में उल्लेखनीय वृद्धि होने की संभावना है. इस सफलता से गांव के अन्य किसान भी अब प्राकृतिक खेती की ओर कदम बढ़ा रहे हैं.'
उन्नत किस्मों से बढ़ेगा उत्पादन और गुणवत्ता: डॉ. मित्तल
कृषि विज्ञान केंद्र सिरमौर के प्रभारी एवं प्रधान वैज्ञानिक डॉ. पंकज मित्तल ने बताया कि 'हल्दी एक बहुआयामी फसल है, जिसका किसान और भारत के हर घर से सनातन संबंध रहा है. हल्दी सौंदर्य प्रसाधन के रूप में भी उपयोगी है और धार्मिक आयोजनों की संपूर्णता हल्दी के बिना अधूरी मानी जाती है. आयुर्वेद में इसे जीवनदायिनी औषधि के रूप में माना जाता है.'
कृषि विज्ञान केंद्र हल्दी की अधिक उत्पादन देने वाली एवं गुणवत्ता-संपन्न उन्नत किस्मों का बीज आत्मा परियोजना के साथ मिलकर किसानों को उपलब्ध करवा रहा है. आने वाले वर्षों में सिरमौर की पहचान सिर्फ अदरक और लहसुन तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि 'प्राकृतिक हल्दी हब' के रूप में भी उभरेगी. खेतों में उग रही यह पीली फसल अब किसानों की जिंदगी में हरियाली भरने को तैयार है.
ये भी पढ़ें: शिंमला में आज भी खुल जाएगा चलौंठी बायपास, जाम से लोगों को मिलेगी राहत

