पहाड़ों पर एक महीने घरों के बाहर हर संध्या प्रज्वलित होगी अग्नि, क्या है हिमाचल-उत्तराखंड की प्राचीन दैवीय परंपरा 'चिड़ोल'?
भाद्रपद मास की शुरुआत के साथ ही हिमाचल और उत्तराखंड के कुछ हिस्सों में चिड़ोल पर्व की भी शुरुआत हो गई है.

By ETV Bharat Himachal Pradesh Team
Published : August 19, 2026 at 6:25 PM IST
शिमला: भाद्रपद मास की शुरुआत के साथ ही पहाड़ों पर एक सांस्कृतिक पर्व की भी शुरुआत हो गई है. प्रतिपदा से पूरे भादो मास के दौरान हिमाचल और उत्तराखंड के एक बड़े क्षेत्र में चिड़ोल पर्व मनाया जा रहा है. 17 अगस्त की संध्या से इसकी शुरुआत हो गई है और अब इस क्षेत्र में अगले एक महीने तक करीब हर घर में संध्या को घरों के बाहर आस्था की अग्नि प्रज्वलित होगी. चिड़ोल पर्व, क्षेत्र के आराध्य देव महासू और उनके बीर देवों से जुड़ा हुआ है. ऐसे में पूर्ण रूप से प्राकृतिक तत्वों से बनने वाले देव प्रतीक चिड़ा की स्थापना पूरे भादो मास के दौरान स्थानीय लोगों की आस्था का केंद्र बना रहेगा.
पूरे भादो मास के लिए स्थापित होंगे देव प्रतीक चिड़ा
चिड़ोल पर्व मुख्य रूप से हिमाचल प्रदेश के जिला शिमला, सिरमौर और सोलन में मनाया जाता है. इसके अलावा उत्तराखंड के देहरादून और उत्तरकाशी जिले के बड़े क्षेत्र में भी इस परंपरा का बड़ा महत्व है. चिड़ोल पर्व की परंपरा महाराष्ट्र के श्री गणपति स्थापना और विसर्जन और पश्चिम बंगाल में नवरात्र के दौरान श्री दुर्गा की स्थापना और फिर विसर्जन से मिलती जुलती है. पहाड़ी प्रदेश में भादो प्रतिपदा की भोर के साथ चिड़ा स्थापना होती है और एक महीने बाद आश्विन मास की प्रतिपदा की सुबह चिड़ा मिट्टी में विलय हो जाते हैं.
प्रकृति और आस्था का संयोग देव प्रतीक चिड़ा
पहाड़ी संस्कृति के जानकार पंडित गोविंद राम पांडेय ने बताया कि आंगन या खेत की मिट्टी के खंड को चिड़ा के रूप में स्थापित किया जाता है. गोबर और मिट्टी के लेप से लिपने के बाद फूलों से इन्हें सजाया जाता है. पारंपरिक रूप से सब्जियां के फूलों से इन्हें सजाया जाता था, जिसमें सूरजमुखी और कद्दू के फूल विशेष रूप से लगाए जाते थे. इसके अलावा जौ के बीज भी रोपे जाते हैं जो महीने के अंत तक अंकुरित भी हो जाते हैं. मिट्टी-गोबर के इस विशेष प्रतीक के ऊपर स्लेट या पत्थर का टुकड़ा भी रखा जाता है और इसी पर हर संध्या को अग्नि प्रज्वलित की जाती है.

विशेष पूजा के साथ आगमन और प्रस्थान
पंडित गोविंद राम पांडेय ने बताया कि पुरानी परंपरा में चिड़ा की स्थापना और प्रस्थान एक विशेष पूजा के साथ किया जाता है. गांव के मुख्य मंदिर में पूजा अर्चना के बाद शंखनाद किया जाता है और इसे 'भद्रोल' कहा जाता है. इससे ग्रामीणों को घर पर चिड़ा पूजन का संकेत मिलता है. स्थानीय ऋतु फल और लौटी (स्थानीय व्यंजन) या पूरी को चढ़ने के साथ चिड़ा पूजन किया जाता है. हालांकि यह पूजन केवल स्थापना की पहली संध्या और प्रस्थान की आखिरी संध्या को ही किया जाता है. महीने के बाकी दिन 'भद्रोल' के बाद केवल अग्नि प्रज्वलित करने की परंपरा है.

"इस परंपरा के पीछे गहरा संदेश छुपा है. मिट्टी से चिड़ा स्थापना और फिर इसका पुनः मिट्टी में मिलना मनुष्य के संसार में आने और जाने का प्रतीक है. प्राकृतिक चीजों से चिड़ा स्थापना और इसका पूजन पहाड़ की देव परंपरा और प्रकृति को आपस में जोड़ने का काम करता है. यह पर्व आस्था के साथ प्रकृति संरक्षण का संदेश देने वाला पर्व है." - पंडित गोविंद राम पांडेय, पहाड़ी संस्कृति के जानकार
क्या है इस विशेष परंपरा की मान्यता ?
पंडित गोविंद राम पांडेय बताते हैं स्थानीय परंपरा में भादों को अंधेरे या काले मास के रूप में देखा जाता है. इसी से घरों के बाहर चिड़ा स्थापना और अग्नि प्रज्वलित करने की परंपरा की शुरुआत हुई है. जब बिजली के साधन कम हुआ करते थे तब चिड़ा स्थापना राहगीरों को घर या गांव के होने का संकेत देता था. पंडित गोविंद राम पांडेय कहते हैं कि चिड़ा स्थापना का एक वैज्ञानिक कारण भी है. उन्होंने कहा कि इस दौरान कीट पतंगे भी रोशनी की ओर आकर्षित होकर घरों में घुसने की कोशिश करते हैं. ऐसे में घरों के बाहर अग्नि प्रज्वलित करने से यह कीट पतंगे घरों से दूर रहते हैं.

देव आस्था से भी जुड़ी है परंपरा
पंडित गोविंद राम पांडेय ने बताया कि ये परंपरा महासू देव परंपरा से भी जुड़ी हुई है. उन्होंने बताया कि चिड़ा की स्थापना चार महासू भाइयों के बीर यानी उनके रक्षक देवों को समर्पित है. घर के बाहर चिड़ा स्थापना देवता के बाह्य बीरों को समर्पित है. गोविंद राम पांडेय कहते हैं कि महासू देवता में विश्वास रखने वाले एक बड़े क्षेत्र के लोगों के लिए भादो मास विशेष महत्व रखता है. इसी मास में महासू देव परंपरा के सबसे बड़े उत्सव जागरा का आयोजन किया जाता है. विशेष बात ये है कि पूरी रात देव गीतों के साथ मनाया जाने वाले जागरण पर्व में भी चिड़ा विशेष महत्व रखता है. देवता के प्रांगण में विशाल चिड़ा जलाया जाता है जो पूरी रात जलता रहता है.

