बेहतर उत्पादन के लिए किसान जान लें ये बातें, फसलों-सब्जियों के संरक्षण के लिए कृषि विभाग की एडवाइजरी
धान में नाइट्रोजन प्रबंधन से लेकर सब्जियों की बिजाई और फसल रोगों की रोकथाम तक दी विस्तृत सलाह, मौसम के अनुसार करें कृषि कार्य.

By ETV Bharat Himachal Pradesh Team
Published : August 20, 2026 at 8:05 PM IST
सिरमौर: अगस्त का दूसरा पखवाड़ा किसानों के लिए फसलों की देखभाल, पोषक तत्व प्रबंधन और रोग-कीट नियंत्रण के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है. इस दौरान धान, मक्का, तिल, माश, सोयाबीन और विभिन्न चारा फसलों के साथ-साथ सब्जियों में भी समय पर कृषि कार्य करना जरूरी है. चौधरी सरवण कुमार हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर के प्रसार शिक्षा निदेशालय की कृषि सलाह के आधार पर कृषि विज्ञान केंद्र सिरमौर के प्रभारी एवं प्रधान वैज्ञानिक डॉ. पंकज मित्तल ने किसानों को मौसम और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार इन कृषि कार्यों को अपनाने की सलाह दी है.
"फसलों में समय पर खाद, सिंचाई, निराई-गुड़ाई और रोग-कीट प्रबंधन करने से उत्पादन और गुणवत्ता दोनों बेहतर की जा सकती हैं. किसानों को सलाह दी गई है कि किसी भी कृषि रसायन का इस्तेमाल विशेषज्ञ की सलाह और निर्धारित मात्रा के अनुसार ही करें." - डॉ. पंकज मित्तल, प्रधान वैज्ञानिक एवं प्रभारी, कृषि विज्ञान केंद्र सिरमौर
धान में मेड़बंदी और नाइट्रोजन प्रबंधन जरूरी
कृषि विज्ञान केंद्र सिरमौर ने धान के खेतों में मजबूत मेड़बंदी करने की सलाह दी गई है, ताकि बारिश का पानी खेत से बाहर न निकले. इस समय धान में उर्वरक प्रबंधन विशेष रूप से महत्वपूर्ण है. ज्यादा उपज देने वाली प्रजातियों में रोपाई के 25 से 30 दिन बाद कल्ले निकलते समय 65 किलोग्राम यूरिया या 30 किलोग्राम नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर की दर से टॉप ड्रेसिंग करने की सलाह है. नाइट्रोजन की इतनी ही मात्रा की दूसरी और अंतिम टॉप ड्रेसिंग रोपाई के 50 से 55 दिन बाद पुष्प अवस्था पर करनी चाहिए. अगर धान में जिंक की कमी के लक्षण दिखाई दें तो 0.5 प्रतिशत जिंक सल्फेट को 0.25 प्रतिशत बुझे हुए चूने के घोल के साथ 15 से 20 दिन के अंतराल पर 2 से 3 छिड़काव करने की सलाह दी गई है.

मक्का में भुट्टा बनते समय नमी की कमी न होने दें
मक्का की फसल में बुआई के 40 से 45 दिन बाद नर मंजरी निकलते समय पर्याप्त नमी होने पर 40 किलोग्राम नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर की दर से दूसरी और अंतिम टॉप ड्रेसिंग करने को कहा गया है. विशेष रूप से भुट्टा बनते समय खेत में पर्याप्त नमी बनाए रखना जरूरी है. सलाह के अनुसार इस अवस्था में नमी की कमी होने पर मक्का की उपज में 50 प्रतिशत तक कमी आ सकती है. तिल और माश की फसल में खरपतवार नियंत्रण के साथ प्रमुख रोगों एवं कीटों की निगरानी कर समय पर नियंत्रण के उपाय करने की सलाह दी गई है.
सोयाबीन में खरपतवार नियंत्रण पर दें ध्यान
कृषि विज्ञान केंद्र सिरमौर द्वारा सोयाबीन में फसल उगने के 25 से 30 दिन बाद यदि खरपतवार का प्रकोप अधिक हो तो क्विजालोफॉप एथिल 5 प्रतिशत 60 ग्राम + क्लोरीम्यूरॉन इथाइल 4 ग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करने की सलाह दी गई है. इसका प्रयोग उस समय किया जाना चाहिए जब खरपतवारों में दो से तीन पत्तियां निकल आई हों.
चारा फसलों में सूखे की स्थिति में हल्की सिंचाई
कृषि विज्ञान केंद्र सिरमौर के प्रभारी एवं प्रधान वैज्ञानिक डॉ. पंकज मित्तल ने मक्का, ज्वार, बाजरा और लोबिया आदि चारा फसलों में अगर बारिश नहीं होती या सूखे जैसी स्थिति बनती है तो हल्की सिंचाई करने की सलाह दी है. वहीं, अगेती बोई गई चारा फसलों की कटाई समय पर करते रहने को कहा गया है.

सब्जी उत्पादकों के लिए भी अहम समय
डॉ. मित्तल ने बताया कि निचले पर्वतीय क्षेत्रों में मूली की जापानी व्हाइट, चाइनीज पिंक, पूसा चेतकी और पूसा देसी, शलगम की पर्पल टॉप व्हाइट ग्लोब और गाजर की नान्तीज, पूसा केसर, पूसा मेघाली, पूसा यमदाग्नि और पूसा वृष्टि जैसी सुधरी प्रजातियों की बिजाई पंक्तियों में 25 से 30 सेंटीमीटर की दूरी पर करें. वहीं, पालक में पूसा हरित, ऑल ग्रीन, पूसा भारती और बैनर्जी जायंट जैसी सुधरी प्रजातियों की बिजाई की जा सकती है. बिजाई के समय प्रति हेक्टेयर खेत में 100 से 150 क्विंटल गोबर की खाद, 150 किलोग्राम 12:32:16 मिश्रण खाद और 8 किलोग्राम म्यूरेट ऑफ पोटाश डालने की सलाह दी गई है.
भिंडी की दूसरी टॉप ड्रेसिंग करें
प्रधान वैज्ञानिक डॉ. पंकज मित्तल द्वारा भिंडी की फसल में बुआई के 50 दिन बाद 40 किलोग्राम नाइट्रोजन अथवा 87 किलोग्राम यूरिया प्रति हेक्टेयर की दर से दूसरी टॉप ड्रेसिंग करने की सलाह दी गई है. भिंडी की तुड़ाई समय पर करना भी जरूरी है. फूल आने के 8 से 10 दिन के भीतर भिंडी की तुड़ाई कर लेनी चाहिए.
खरीफ प्याज की रोपाई का भी समय
कृषि विज्ञान केंद्र सिरमौर द्वारा हरी प्याज यानी खरीफ प्याज की रोपाई करने की सलाह दी गई है. रोपाई से पहले खेत में 250 क्विंटल गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर मिलाएं. अंतिम जुताई के बाद 40 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60 किलोग्राम फॉस्फोरस और 40 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में अच्छी तरह मिलाने की सलाह दी गई है.

मध्यवर्ती पहाड़ी क्षेत्रों में फूलगोभी की रोपाई
मध्यवर्ती पहाड़ी क्षेत्रों में तैयार फूलगोभी की पौध को खेत में 60 एवं 45 सेंटीमीटर की दूरी पर रोपने की सलाह दी गई है. रोपाई के समय प्रति हेक्टेयर 250 क्विंटल अच्छी तरह सड़ी गोबर की खाद के साथ 250 किलोग्राम 12:32:16 मिश्रण खाद और 54 किलोग्राम म्यूरेट ऑफ पोटाश डालें. वैकल्पिक रूप से 250 क्विंटल सड़ी गोबर की खाद के साथ 40 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60 किलोग्राम फॉस्फोरस और 40 किलोग्राम पोटाश अंतिम जुताई अथवा रोपाई से पहले खेत में अच्छी तरह मिलाने की सलाह दी गई है. इन्हीं क्षेत्रों में लगी फूलगोभी और बंद गोभी की फसल में निराई-गुड़ाई करते समय 40 से 50 किलोग्राम यूरिया प्रति हेक्टेयर डालने को कहा गया है. चाइनीज बंद गोभी की पौध तैयार करने के साथ-साथ मूली और गाजर की सीधी बिजाई भी की जा सकती है.
ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों में सब्जियों की निराई-गुड़ाई
हिमाचल प्रदेश के ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों में खेतों में लगी फूलगोभी, ब्रोकोली, लैट्यूस और लाल बंदगोभी सहित अन्य सब्जियों में निराई-गुड़ाई करने की सलाह दी गई है. कृषि विज्ञान केंद्र सिरमौर ने इन फसलों में 40 से 50 किलोग्राम यूरिया प्रति हेक्टेयर की दर से डालने की सलाह दी है.
गोभी वर्गीय सब्जियों की नर्सरी में रखें सावधानी
गोभी वर्गीय सब्जियों की नर्सरी तैयार करने के लिए मिट्टी को कवकनाशी फॉर्मेल्डिहाइड की 25 से 30 मिलीलीटर मात्रा प्रति लीटर पानी में मिलाकर नर्सरी क्षेत्र में छिड़कने और नर्सरी को पॉलीथिन शीट से ढकने की सलाह दी गई है. इसके करीब 15 दिन बाद बुआई करनी चाहिए. नर्सरी में डैम्पिंग ऑफ रोग से बचाव के लिए ब्लाइटॉक्स 2.5 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से प्रयोग करने की सलाह दी गई है.
फसल संरक्षण में इन बातों का रखें ध्यान
कृषि विज्ञान केंद्र सिरमौर के प्रभारी एवं प्रधान वैज्ञानिक डॉ. पंकज मित्तल ने बताया कि तिल और माश की फसल में बालों वाली सुंडियां काफी नुकसान पहुंचा सकती हैं. किसानों को ऐसी सुंडियों को एकत्र कर नष्ट करने और आवश्यकता के अनुसार कीटनाशक का छिड़काव करने की सलाह दी गई है.

मक्के में तना सड़न रोग की रोकथाम कैसे करें ?
- मक्के में तना सड़न रोग की रोकथाम के लिए 16.5 किलोग्राम ब्लीचिंग पाउडर प्रति हेक्टेयर की दर से रोग ग्रस्त पौधे के पास मिट्टी में मिलाने और खेत में पानी की निकासी का उचित प्रबंध करें.
- धान में झुलसा रोग की रोकथाम के लिए बाविस्टिन 50 डब्ल्यूपी 1 ग्राम प्रति लीटर पानी अथवा बीम 0.5 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करें.
- धान में पत्ता लपेट सुंडी और हिस्पा कीट के नियंत्रण के लिए 1250 मिलीलीटर क्लोरपाइरीफॉस 20 ईसी प्रति 500 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर क्षेत्र में छिड़काव करें.
- जरुरत होने पर 15 दिन बाद दोबारा छिड़काव किया जा सकता है.
टमाटर, बैंगन और शिमला मिर्च में रोग नियंत्रण
कृषि विज्ञान केंद्र सिरमौर के प्रभारी एवं प्रधान वैज्ञानिक डॉ. पंकज मित्तल ने बताया कि टमाटर, बैंगन और शिमला मिर्च में पत्ता धब्बा एवं फल सड़न रोग की रोकथाम के लिए 2.5 ग्राम डायथेन एम-45 अथवा 2.5 ग्राम रिडोमिल एमजेड प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव कर सकते हैं.
कद्दू वर्गीय फसलों में फल मक्खी से बचाव
कद्दू वर्गीय फसलों में फल मक्खी के प्रकोप को रोकने के लिए 10 मिलीलीटर मैलाथियान और 50 ग्राम गुड़ या चीनी को 5 लीटर पानी में घोलकर बेलों पर छिड़काव करने की सलाह दी गई है. इस मिश्रण का छिड़काव खेत के आसपास की झाड़ियों और पौधों पर भी किया जा सकता है. फल मक्खी के नियंत्रण के लिए पालम ट्रैप 25 ट्रैप प्रति हेक्टेयर की दर से लगाने की सलाह दी गई है. इससे नर फल मक्खियां आकर्षित होकर मरती हैं.
"अपने क्षेत्र की भौगोलिक एवं पर्यावरणीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए कृषि संबंधी विशेष जानकारी के लिए नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र अथवा कृषि अधिकारी से संपर्क बनाए रखें. मौसम और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार कृषि कार्यों में आवश्यक बदलाव करना किसानों के लिए लाभदायक रहेगा. अधिक जानकारी के लिए कृषि तकनीकी सूचना केंद्र (एटिक), पालमपुर के दूरभाष नंबर 01894-230395 अथवा टोल फ्री नंबर 1800-180-1551 पर भी संपर्क किया जा सकता है." - डॉ. पंकज मित्तल, प्रधान वैज्ञानिक एवं प्रभारी, कृषि विज्ञान केंद्र सिरमौर

