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हाईकोर्ट ने कहा- ठोस संदेह होना ही आरोप तय करने का पर्याप्त आधार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने खुदकुशी के लिए उकसाने के मामले में आरोप तय करने के खिलाफ याचिका खारिज की

इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट (Photo credit: ETV Bharat)
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By ETV Bharat Uttar Pradesh Team

Published : January 7, 2026 at 10:18 PM IST

2 Min Read
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प्रयागराज : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि किसी अपराध में आरोपी के खिलाफ़ आरोप तय करते समय ट्रायल कोर्ट के लिए विस्तृत कारण दर्ज़ करना अनिवार्य नहीं है. यदि यह मामले का ठोस आधार और संदेश है कि अपराध किया गया है तो आरोप तय करने के लिए पर्याप्त आधार होगा. गोरखपुर के अशोक सिंह उर्फ काली सिंह की अपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज़ करते हुए यह आदेश न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेन्द्र ने दिया है.

मामले के अनुसार, गोरखपुर की पुलिस ने 21 मार्च 2020 को अस्पताल की सूचना पर याची के भाई दीन दयाल सिंह का शव अस्पताल के शव गृह से बरामद किया, जिसने ट्रेन से कट कर खुदकुशी कर ली थी. मृतक की जेब से बरामद सुसाइड नोट के आधार पर याची के खिलाफ खुदकुशी के लिए उकसाने का मुकदमा आईपीसी की धारा 306 के तहत दर्ज़ किया गया. पुलिस ने जांच के बाद याची के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल कर दिया, जिस पर मजिस्ट्रेट ने 22 अक्टूबर 2021 को संज्ञान लेकर मामला सेशन कोर्ट को सुपुर्द कर दिया. सेशन कोर्ट ने 24 जनवरी 2024 को याची के विरुद्ध आरोप तय कर दिए. इन दोनों आदेशों को पुनरीक्षण याचिका में चुनौती दी गई.

याची के अधिवक्ता का कहना था कि उसके विरुद्ध खुदकुशी के लिए उकसाने के तथ्य नहीं है. सुसाइड नोट में शुरुआत में उसका नाम नहीं, उसे बाद में उसे फसाने के लिए जोड़ा गया है. मृतक की विधवा के बयान भी विरोधाभासी हैं. पहले उसने कहा कि व्यापार में घाटा होने के कारण खुदकुशी की है. राज्य सरकार के अधिवक्ता का कहना था कि सुसाइड नोट और गवाह के बयान से खुदकुशी के लिए उकसाने के पर्याप्त साक्ष्य हैं. आरोप तय करने के स्तर पर विस्तृत कारण दर्ज़ करना अनिवार्य नहीं है.

कोर्ट ने कहा सीआरपीसी की धारा 228 के तहत आरोप तय करते समय ट्रायल कोर्ट के लिए विस्तृत कारण दर्ज़ करना अनिवार्य नहीं है. यह विश्वास करने का मजबूत आधार होना पर्याप्त है कि अपराध हुआ है. कोर्ट ने याचिका खारिज़ कर दी है.

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