ETV Bharat / state

हाईकोर्ट ने कहा- पेशे से संबोधित करना एससी, एसटी एक्ट का अपराध नहीं, अपमान की मंशा जरूरी

कोर्ट ने गौतम बुद्ध नगर में एससी/एसटी के विशेष जज के सम्मन आदेश को चुनौती देने वाली अपील को आंशिक रूप से स्वीकार किया है.

इलाहाबाद हाईकोर्ट.
इलाहाबाद हाईकोर्ट. (Photo Credit; ETV Bharat)
author img

By ETV Bharat Uttar Pradesh Team

Published : March 2, 2026 at 9:56 PM IST

2 Min Read
Choose ETV Bharat

प्रयागराज : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक आदेश में स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति को उसके पेशे के आधार पर पुकारने मात्र से एससी/एसटी एक्ट के तहत अपराध नहीं बनता, जब तक यह सिद्ध न हो कि ऐसे शब्द जानबूझकर उस समुदाय से संबंधित व्यक्ति को अपमानित करने की मंशा से कहे गए.

यह टिप्पणी न्यायमूर्ति अनिल कुमार दशम ने गौतम बुद्ध नगर में एससी/एसटी के विशेष जज के सम्मन आदेश को चुनौती देने वाली आपराधिक अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए की है. अपीलार्थी को आईपीसी की धारा 323, 504 और 506 के साथ एससी/एसटी की धारा 3(1)(द) और 3(1)(ध) के तहत तलब किया गया.

इस मामले में शिकायतकर्ता का आरोप है कि वह अपीलार्थी के कपड़े धोती थी. एक दिन जब उसने अपनी मजदूरी मांगी तो उसके साथ रास्ते में दुर्व्यवहार किया गया और जातिसूचक शब्द कहे गए. हाईकोर्ट ने पाया कि विवाद मजदूरी मांगने के बाद उत्पन्न हुआ और शिकायत में केवल इतना उल्लेख है कि जातिसूचक शब्द कहा गया.

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि दोनों पक्षों के बीच संविदात्मक संबंध है, जिसमें शिकायतकर्ता कपड़े धोने का काम करती है. कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति को उसके पेशे से संबोधित करना अपने आप में एक्ट के प्रावधानों को आकर्षित नहीं करेगा, जब तक यह स्थापित न हो कि शब्दों का प्रयोग विशेष रूप से अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति समुदाय से संबंधित व्यक्ति को अपमानित करने की नीयत से किया गया.

कोर्ट ने अपीलार्थी के इस तर्क पर भी विचार किया कि ट्रायल कोर्ट ने पुलिस की फाइनल रिपोर्ट को स्पष्ट रूप से स्वीकार या अस्वीकार किए बिना ही प्रोटेस्ट प्रार्थनापत्र को परिवाद में बदल दिया, जो अवैध है. कोर्ट ने कहा कि आदेश में पुलिस रिपोर्ट से असहमति का स्पष्ट उल्लेख अनिवार्य नहीं है. ट्रायल कोर्ट प्रोटेस्ट प्रार्थनापत्र को परिवाद में परिवर्तित करती है, तो इसका स्वाभाविक अर्थ है कि सीआरपीसी की धारा 173(2) के तहत प्रस्तुत फाइनल रिपोर्ट को स्वीकार नहीं किया गया.

इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने अपील आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए एससी/एसटी की धारा 3(1)(द) और 3(1)(ध) से संबंधित सम्मन आदेश और कार्यवाही निरस्त दी. हालांकि कोर्ट ने आईपीसी की धारा 323, 504 और 506 के तहत शेष कार्यवाही कानून के अनुसार जारी रखने का निर्देश दिया है.

यह भी पढ़ें : घर से 350 रुपये लेकर निकले, आज है 100 करोड़ रुपये का टर्नओवर, जानिए मनोज शर्मा की सक्सेस स्टोरी