हाईकोर्ट ने कहा- ट्रायल में मिले साक्ष्य के आधार पर ही जोड़े जा सकते हैं अतिरिक्त आरोपी
कौशांबी के मोहब्बतपुर पैंसा थाना के मन सिंह की पुनरीक्षण याचिका खारिज करते हुए न्यायमूर्ति ने टिप्पणी की.

By ETV Bharat Uttar Pradesh Team
Published : January 9, 2026 at 10:24 PM IST
प्रयागराज : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 319 के तहत किसी अतिरिक्त आरोपी को तलब करने का आधार केवल वही साक्ष्य हो सकता है, जो मुकदमे के दौरान न्यायालय के समक्ष रिकॉर्ड किया गया हो. चार्जशीट या केस डायरी में उपलब्ध सामग्री को साक्ष्य नहीं माना जा सकता. इनके आधार पर किसी व्यक्ति को अतिरिक्त आरोपी के रूप में समन नहीं किया जा सकता. कौशांबी के मोहब्बतपुर पैंसा थाना के मन सिंह की पुनरीक्षण याचिका खारिज करते हुए न्यायमूर्ति चवन प्रकाश ने यह टिप्पणी की.
याचिका में मृतका के पिता ने अपने दामाद के पिता, माता और भाई को अतिरिक्त आरोपी के रूप में तलब किए जाने की मांग की थी. कोर्ट ने कहा कि सीआरपीसी की धारा 319 के तहत प्राप्त शक्ति असाधारण प्रकृति की है. इसका प्रयोग अत्यंत सावधानी और विवेक के साथ किया जाना चाहिए. किसी व्यक्ति को अतिरिक्त आरोपी के रूप में समन करने के लिए केवल प्रथम दृष्टया मामला पर्याप्त नहीं है, बल्कि अदालत को यह संतुष्टि होनी चाहिए कि मुकदमे के दौरान रिकॉर्ड किए गए साक्ष्यों के आधार पर प्रथम दृष्टया से अधिक मजबूत मामला बनता है.
मामले के अनुसार, मृतका के पिता मान सिंह ने ट्रायल कोर्ट के 8 नवंबर, 2024 के आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उनकी धारा 319 की अर्जी को खारिज कर दिया गया. अभियोजन के अनुसार, मान सिंह की पुत्री राधिका का विवाह लगभग पांच वर्ष पूर्व मनोज यादव से हुआ. आरोप था कि विवाह के बाद पति और उसके परिवारजन दहेज में भैंस और सोने की अंगूठी की मांग को लेकर राधिका को प्रताड़ित करने लगे. यह भी आरोप लगाया गया कि पति के अवैध संबंध थे. 7 जनवरी, 2020 को राधिका मृत अवस्था में पाई गई.
पिता ने आरोप लगाया कि उसकी पुत्री की हत्या कर शव को फांसी पर लटका दिया गया. इस संबंध में भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए, 304बी और दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धाराओं 3/4 के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई. हालांकि, विवेचना के दौरान पुलिस को पति के अलावा अन्य पारिवारिक सदस्यों की भूमिका नहीं मिली और केवल पति मनोज के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई. पुनर्विचार याचिका की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि ट्रायल के दौरान दर्ज किए गए गवाहों के बयान, ससुराल पक्ष के अन्य सदस्यों की संलिप्तता को दर्शाते हैं. वहीं, विपक्ष की ओर से यह कहा गया कि मृतका और उसका पति अन्य पारिवारिक सदस्यों से अलग रहते थे और कथित घटना में उनका कोई रोल नहीं था.

