हाईकोर्ट ने बर्खास्त हरिद्वार सिविल जज दीपाली शर्मा को किया बहाल, मिलेंगे ये सभी लाभ
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने बर्खास्त हरिद्वार की सिविल जज दीपाली शर्मा बहाल करने के आदेश दिए है.

By ETV Bharat Uttarakhand Team
Published : January 10, 2026 at 7:21 AM IST
|Updated : January 10, 2026 at 7:31 AM IST
नैनीताल: हाईकोर्ट ने बर्खास्त हरिद्वार की सिविल जज (सीनियर) दीपाली शर्मा के बर्खास्तगी आदेश को रद्द कर दिया है. साथ ही उन्हें बहाल करने के अलावा सभी लाभ देने के आदेश दिए हैं. दीपाली शर्मा को वर्ष 2008 में सिविल जज (जूनियर डिवीजन) के पद पर नियुक्त किया गया था. हाईकोर्ट की फुल कोर्ट ने 14 अक्टूबर 2020 को एक प्रस्ताव पास कर उन्हें पद से हटा दिया था. इसके तत्काल बाद 20 अक्टूबर 2020 को राज्य सरकार ने उच्च न्यायालय के निर्णय का अनुपालन कर दिया.
दीपाली शर्मा ने इस फैसले को उच्च न्यायालय में चुनौती दी और मुख्य न्यायाधीश जी नरेंद्र और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने पूरे प्रकरण पर लंबी सुनवाई के बाद विगत 6 जनवरी को उन्हें बहाल करने के आदेश दिए. आदेश की प्रति शुक्रवार को मिली. याचिकाकर्ता ने जांच रिपोर्ट के साथ राज्य सरकार के बर्खास्तगी आदेश को चुनौती दी. हाईकोर्ट ने विगत 06 जनवरी को बहाली आदेश जारी करते हुए आदेश दिया कि याचिकाकर्ता दीपाली शर्मा को उनके पद से हटाए जाने की तिथि से निरंतर सेवा में माना जाएगा तथा उन्हें वरिष्ठता समेत सभी देयकों का लाभ प्रदान किए जाएंगे.
हाईकोर्ट 50 प्रतिशत वेतन एवं अन्य सेवा लाभ देने के भी आदेश दिए हैं. याचिकाकर्ता के अधिवक्ता आदित्य प्रताप सिंह ने बताया कि यह मामला वर्ष 2018 में शुरू हुआ था. उच्च न्यायालय को एक गुमनाम शिकायत प्राप्त हुई, जिसमें आरोप लगाया गया कि दीपाली शर्मा द्वारा 14 वर्ष की नाबालिग लड़की को घर के कामकाज के लिए रखा गया है तथा उसे भोजन नहीं दिया जाता और उसके साथ मारपीट की जाती है. इसके बाद मामले की जांच के लिए हाईकोर्ट द्वारा अतिरिक्त जिला न्यायाधीश स्तर के एक जांच अधिकारी की नियुक्ति की गई.
जांच रिपोर्ट में दीपाली शर्मा दोषी नहीं पाई गईं. अधिवक्ता आदित्य प्रताप सिंह ने कहा कि खंडपीठ ने अपने फैसले में कड़े शब्दों में कहा कि सभी आरोप और निष्कर्ष रिकॉर्ड के खिलाफ और गलत प्रकृति के थे. इसके अलावा उच्च न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश की कोई मंजूरी रिकॉर्ड पर नहीं है. नाबालिग लड़की और उसके पिता ने बाल श्रम के सभी आरोपों से इनकार किया है और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उत्तराखंड सरकारी कर्मचारी नियम, 2002 के अनुसार जांच के दौरान बाल श्रम का कोई आरोप नहीं लगाया गया था.
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