औद्योगिक इस्तेमाल के लिए एक श्रेणी में हो भूमि अधिग्रहण, मुआवजे के लिए जमीन को बंजर या उपजाऊ में बांटना गलत- HC
हाईकोर्ट ने 10 फीसदी विकास शुल्क की कटौती के बाद 7,60, 680 रुपये प्रति बीघा की समान दर तय की है.

By ETV Bharat Himachal Pradesh Team
Published : August 14, 2026 at 11:12 AM IST
|Updated : August 14, 2026 at 12:30 PM IST
शिमला: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने भूमि अधिग्रहण मुआवजे से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था दी है. अदालत ने कहा कि सार्वजनिक उद्देश्य या औद्योगिक क्षेत्र के विकास के लिए जब पूरी जमीन का एक इकाई के रूप में अधिग्रहण किया जाता है, तो मुआवजा तय करते समय जमीन के पुराने वर्गीकरण का कोई महत्व नहीं रह जाता. सभी प्रभावित भूस्वामियों को समान दर से मुआवजा दिया जाना चाहिए. न्यायाधीश सुशील कुकरेजा ने हिमाचल प्रदेश स्टेट इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन लिमिटेड (HPSIDC) की ओर से दायर अपीलों पर यह फैसला सुनाया है. हाईकोर्ट ने 10 प्रतिशत विकास शुल्क की कटौती के बाद सभी श्रेणी की जमीन के लिए 7 लाख 60 हजार 680 रुपये प्रति बीघा की समान दर तय की है.
पूरे मामले पर कोर्ट ने ये कहा
हाईकोर्ट ने कहा कि जब अधिग्रहित भूमि का इस्तेमाल कृषि के बजाय औद्योगिक या आवासीय कॉलोनी के विकास के लिए होना हो, तो बंजर, चरागाह या उपजाऊ जमीन जैसी पुरानी श्रेणियां अपना महत्व खो देती हैं. ऐसे मामलों में जमीन के वर्गीकरण के आधार पर अलग-अलग मुआवजा देना उचित नहीं है. सुनवाई के दौरान रिकॉर्ड पर आया कि कॉर्पोरेशन ने अधिग्रहित भूमि के विकास पर 1 करोड़ 52 लाख रुपये से अधिक खर्च किए थे. अदालत ने माना कि बड़े कृषि क्षेत्रों को विकसित करने में खर्च आता है. इसलिए निर्धारित मूल्य पर 10 प्रतिशत विकास शुल्क की कटौती करना न्यायसंगत है. हाईकोर्ट ने कॉर्पोरेशन की अपीलों को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए रेफरेंस कोर्ट के आदेश में संशोधन किया है.
क्या था मामला?
मामला सोलन जिले की नालागढ़ तहसील के गांव बिलांवाली लबाना का है. जनवरी 2004 में कॉर्पोरेशन ने औद्योगिक क्षेत्र विकसित करने के लिए यहां भूमि अधिग्रहण की अधिसूचना जारी की थी. भूस्वामियों ज्ञान चंद और अन्य ने लैंड एक्विजिशन कलेक्टर के फैसले को अतिरिक्त जिला जज, सोलन की रेफरेंस कोर्ट में चुनौती दी थी. रेफरेंस कोर्ट ने भूस्वामियों के पक्ष में फैसला सुनाते हुए मुआवजा बढ़ाकर 8 लाख 45 हजार 200 रुपये प्रति बीघा तय किया था. इस बढ़े हुए मुआवजे और विकास शुल्क की कटौती न किए जाने के खिलाफ कॉर्पोरेशन ने हाईकोर्ट में अपील की. अब हाईकोर्ट ने 10 प्रतिशत विकास शुल्क की कटौती के बाद 7 लाख 60 हजार 680 रुपये प्रति बीघा की समान दर तय की है. मामला वर्ष 2004 का होने के कारण कोर्ट ने कॉर्पोरेशन को निर्देश दिया है कि प्रभावित भूस्वामियों को ब्याज सहित पूरी बकाया राशि तीन महीने के भीतर कोर्ट में जमा कराई जाए.
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