हाईकोर्ट ने 23 साल से जेल में बंद हत्यारे को बरी किया, पत्नी और तीन बच्चों की हत्या मामले में मिली थी सजा
ट्रायल कोर्ट ने चार हत्याओं का दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी. आरोपी ने हाईकोर्ट में अपील की थी.

By ETV Bharat Uttar Pradesh Team
Published : February 26, 2026 at 10:16 PM IST
प्रयागराज : इलाहाबाद हाइकोर्ट ने पत्नी और तीन बच्चों की निर्मम हत्या के आरोप में करीब 23 वर्ष जेल में बिताने वाले एक व्यक्ति को साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया है. कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे सिद्ध करने में विफल रहा है. साथ ही न्यायालय ने आपराधिक न्याय प्रणाली पर गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल सम्मेलन और बैठकों से स्थिति नहीं सुधरेगी, बल्कि जजों की संख्या, सहायक स्टाफ और आधारभूत ढांचे में वास्तविक वृद्धि की आवश्यकता है.
न्यायमूर्ति सिद्धार्थ एवं न्यायमूर्ति जय कृष्ण उपाध्याय की खंडपीठ ने कहा कि यह मामला आपराधिक न्याय वितरण प्रणाली के लिए दुखद है और इस पर आत्ममंथन की आवश्यकता है. खंडपीठ ने कहा कि ठोस सुधारात्मक कदम समय की मांग हैं. मामले के तथ्यों के अनुसार आरोपी रईस पर आरोप था कि उसने घरेलू विवाद के बाद अपनी पत्नी और तीन बच्चों की चाकू से गला रेतकर हत्या कर दी. मृतका के मामा ने एफआईआर दर्ज कराई. ट्रायल कोर्ट ने उसे चार हत्याओं का दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई.
दोषसिद्धि के खिलाफ अपील पर सुनवाई करते हुए हाइकोर्ट ने अभियोजन के साक्ष्यों की गहन जांच की. विशेषकर एकमात्र कथित प्रत्यक्षदर्शी आरोपी के पांच वर्षीय जीवित पुत्र अजीम के बयान की. गवाह ने स्वीकार किया कि उसने सूचना देने वाले और एक सरकारी वकील के कहने पर बयान दिया. उसने यह भी कहा कि यदि वह उनके अनुसार गवाही नहीं देता तो उसे घर से निकाल देने की धमकी दी गई थी.
बच्चे ने अदालत में बताया कि घटना के समय उसका पिता गांव से बाहर भूसा बेचने गया था और पत्नी की हत्या की सूचना मिलने के बाद अगली सुबह लौटा. उसने यह भी कहा कि जब उसका पिता घर पहुंचा और शवों को देखकर रोया, तब उसके कपड़ों पर खून के धब्बे लग गए. बाद में सूचना देने वाले से कहासुनी हुई और उसी के बाद पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया.
अदालत ने भूमि विवाद को लेकर सूचना देने वाले और आरोपी के बीच पूर्व शत्रुता का भी संज्ञान लिया, जिससे उसके आरोपों की निष्पक्षता पर संदेह उत्पन्न हुआ. अभियोजन द्वारा प्रस्तुत अतिरिक्त न्यायिक स्वीकारोक्ति को भी कोर्ट ने अस्वीकार किया. कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के सहादेवन बनाम तमिलनाडु राज्य के निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि ऐसे बयानों को सावधानी से परखा जाना चाहिए.
यहां जांच अधिकारी ने दो महीने की अस्पष्ट देरी के बाद बयान दर्ज किए और यह स्वाभाविक नहीं लगता कि आरोपी किसी दूसरे गांव के ऐसे व्यक्तियों के सामने अपराध स्वीकार करता, जिनसे उसका कोई घनिष्ठ संबंध नहीं था. मेडिकल साक्ष्य भी अभियोजन की कहानी से मेल नहीं खाते पाए गए. पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के अनुसार घाव किसी भारी धारदार हथियार से किए गए, जिससे गर्दन लगभग धड़ से अलग हो गई थी.
इससे यह सिद्धांत कमजोर पड़ गया कि साधारण चाकू से ऐसी घातक चोटें पहुंचाई गईं. खंडपीठ ने आरोपी के साथ पुलिस अत्याचार के साक्ष्यों पर भी ध्यान दिया जो जांच अधिकारी के उस कथन से विपरीत है, जिसमें उसने हिरासत में मारपीट या नाखून उखाड़ने से इनकार किया.
इन सभी परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने कहा कि यह अत्यंत जघन्य अपराध है लेकिन उपलब्ध साक्ष्य यह सिद्ध नहीं करते कि यह अपराध अपीलार्थी ने ही किया. इसी के साथ कोर्ट ने संदेह का लाभ देते हुए अपीलार्थी को बरी कर दिया और निर्देश दिया कि वह किसी अन्य मामले में वांछित नहीं है तो उसे तत्काल रिहा किया जाए.
कोर्ट ने मार्मिक टिप्पणी भी की कि आरोपी की वास्तविक पीड़ा अब शुरू होगी. संभव है उसके माता-पिता और भाई-बहन जीवित न हों. उसकी पत्नी और तीन बच्चे पहले ही मर चुके हैं. उसका जीवित पुत्र, जो अब लगभग 25-26 वर्ष का होगा, क्या अपने पिता को स्वीकार करेगा, यह भी निश्चित नहीं है.
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