जयपुर का नक्कारखाना गेट जहां सुबह और शाम गूंजती थी शहनाई और नगाड़ों की धुन, जानिए इतिहास
हिडन जेम्स ऑफ राजस्थान सिरीज पार्ट 7 में जानिए स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना कहे जाने वाले नक्कारखाना गेट के बारे में...

Published : November 9, 2025 at 5:01 PM IST
जयपुर: अपनी स्थापत्य कला, किले, महल, खानपान और रीति-रिवाज के लिए भारत ही नहीं, पूरी दुनिया में मशहूर आमेर और जयपुर के राजा कला प्रेमी भी थे. उन्होंने विभिन्न कलाओं में निपुण लोगों को जयपुर और आमेर लाकर बसाया था. 1727 में आमेर के राजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने जब जयपुर नगर का सुनियोजित निर्माण करवाया था, तब उन्होंने सिटी पैलेस के पास जलेब चौक में एक नक्कारखाना गेट का निर्माण भी करवाया था.
रियासत काल में जब सिटी पैलेस पर सूरज की पहली किरण दीवारों पर पड़ती तो ढोल नगाड़ों की गूंज हवा में सुनाई देने लगती थी. शाम को जब अरावली की पहाड़ियों के पीछे सूरज ढलता तो शहनाई की मधुर तान पूरे सिटी पैलेस को सुरमई कर देती थी. राजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने जब इस योजनाबद्ध नगर का निर्माण शुरू किया, तब उन्होंने केवल महल और गलियों ही नहीं बल्कि संस्कृति और संगीत की आत्मा को भी इसमें लाकर बसाया था.
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नक्कारखाना को नौबत खाना भी कहा जाता था : भव्य नक्कारखाना को नौबत खाना के नाम से भी जाना जाता था. यह सिर्फ एक द्वार नहीं, बल्कि राजशाही की घोषणा का मंच भी था. यहां से जब नगाड़े बजते थे तो समझा जाता था कि राज परिवार का कोई सदस्य दरबार में प्रवेश कर रहा है. प्रसिद्ध शिक्षाविद और जयपुर के इतिहास पर बारीकी से नजर रखने वाले सुनील शर्मा का कहना है कि बड़ी चौपड़ से जब जलेब चौक की तरफ चलते हैं तो पहले सिरह ड्योढ़ी और उसके बाद नक्कारखाने का गेट आता है. गेट के दोनों तरफ नगाड़ची और शहनाई वादक बैठते थे. सूर्य उदय और सूर्यास्त के समय शहनाई वादन होता था.

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नक्कारखाने में दिन की शुरुआत और अंत शहनाई वादन से होती थी. सुबह के समय जब शहर जागता तो शहनाई की पवित्र धुन वातावरण को मंगल कर देती थी और शाम होते ही वही स्वर महल की दीवारों में गूंजते हुए शांति और वैभव का प्रतीक बन जाते थे. यह परंपरा न केवल संगीत का हिस्सा थी, बल्कि राजपूताना संस्कृति के आध्यात्मिक अनुशासन की पहचान भी थी. नक्कारखाना गेट के पास ही व्यापारी 70 वर्षीय श्याम सुंदर का कहना है कि उन्होंने भी यहां पर सुबह और शाम नगाड़ों की धुन और शहनाई वादन होते हुए देखे हैं. आजादी के बाद साल 1990 तक भी विशेष अवसरों और राज परिवारों में किसी के जन्मदिन के मौके पर इस गेट से नगाड़े बजाए जाते थे.

दिल्ली दरबार से कलाकारों को जयपुर लाए थे जय सिंह : शिक्षाविद सुनील शर्मा का कहना है कि 18वीं सदी में मुगल साम्राज्य की चमक फीकी पड़ने लगी थी. तब दिल्ली के लाल किले में स्थित नक्कारखाने में ढोल नगाड़े और शहनाई वादन करने वाले कलाकारों को सवाई जयसिंह द्वितीय अपने साथ लेकर आए और उन्हें जयपुर लाकर बसाया. यहीं से शुरू हुई जयपुर दरबार की वो संगीत परंपरा, जिसने आने वाले कई सदियों तक जयपुर शहर को संजोए रखा. यह कलाकार न केवल शाही परिवार के लिए वादन करते थे, बल्कि उत्सवों, युद्ध संकेत और धार्मिक आयोजनों में भी अपनी भूमिका निभाते थे.

स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना है : जलेब चौक में सफेद रंग का नक्कारखाना गेट स्थापत्य कला का एक बेजोड़ नमूना है. इसकी ऊंची मेहराब, बहु मंजिला निर्माण और संगमरमर की नक्काशी सब मिलकर ऐसा दृश्य प्रस्तुत करते हैं जो राजस्थान की गौरवशाली परंपरा का दर्शाता है. जयपुर राज परिवार की ओर से नक्कारखाने में ढोल नगाड़े और शहनाई बजाने वाले कलाकारों को गेट के पास ही रहने के लिए कमरे दिए गए थे जो 24 घंटे वहीं रहते थे. जब भी राज परिवार का कोई सदस्य सिटी पैलेस से बाहर निकलता तब उनके निकलने की सूचना भी नगाड़े बजाकर दी जाती थी. नगाड़े बजते ही लोगों को पता चल जाता था कि राज परिवार का कोई सदस्य सिटी पैलेस से बाहर सड़क पर आ रहा है.
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मुगल काल में शुरू हुआ था नक्कारखाना : राजमहलों में नक्कारखाने की शुरुआत मुगल दरबार से हुई थी. आगरा के किले, दिल्ली का लाल किला के साथ ही कई अन्य जगहों पर भी नक्कारखानों की स्थापना की हुई थी. मुगल दरबार में भी जब कभी युद्ध की घोषणा होती या कोई शादी विवाह या अन्य उत्सव होते तब ढोल नगाड़े और शहनाई वादन होते थे. सिटी पैलेस आने वाले सैलानी जब नक्करखाना गेट से गुजरते तो उन्हें इसकी भव्यता आकर्षित करती है. अब यहां नगाड़े और शहनाई वादन नहीं होता है, लेकिन इन्हें देखकर लोग महसूस करते हैं कि यहां कभी नगाड़े बजते थे और शहनाई वादन होते थे.
जलेब चौक में होती थी आर्मी की परेड : जलेब चौक में रियासत काल के दौरान आर्मी की परेड होती थी और जयपुर के राजा परेड का निरीक्षण करते थे. इसी तरह यहां पर तब कई ऐसे विभागों के भी दफ्तर थे, जो सीधे राजा के अधीन होते थे. इनमें पुलिस, जंगल राजस्व जैसे विभाग भी थे. इसके अलावा न्यायिक कामों के लिए यहां पर कोर्ट भी संचालित होते थे. आजादी के बाद भी यहां पर कई विभागों के दफ्तर संचालित थे. साल 2020 तक भी यहां पर पुलिस और अन्य विभागों के ऑफिस संचालित थे.

