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हाईकोर्ट को हल्द्वानी स्थानांतरित करने के खिलाफ याचिका पर सुनवाई, अदालत ने निर्णय सुरक्षित रखा

याचिकाकर्ताओं ने कहा जब एससी ने नैनीताल जिले में कहीं भी उपयुक्त भूमि चिन्हित करने को कहा था, तो सरकार हल्द्वानी पर क्यों अड़ी है

NAINITAL HIGH COURT SHIFTING
नैनीताल हाईकोर्ट (File Photo- ETV Bharat)
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By ETV Bharat Uttarakhand Team

Published : August 21, 2026 at 11:07 AM IST

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नैनीताल: उत्तराखंड उच्च न्यायालय को नैनीताल से हल्द्वानी के बेल बाबा क्षेत्र में स्थानांतरित करने और बिना केंद्र सरकार की अनुमति के भूमि आरक्षित करने के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनवाई पूरी हो गई है. वरिष्ठ न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी और न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित की खंडपीठ ने सभी पक्षों की विस्तृत बहस और दलीलें सुनने के बाद अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया है.

नैनीताल से हाईकोर्ट हल्द्वानी शिफ्ट करने के खिलाफ याचिका पर सुनवाई: सुनवाई के दौरान पर्वतीय राज्य की मूल अवधारणा का मुद्दा जोर-शोर से उठा. इसमें कहा गया कि राज्य बनाने का मुख्य उद्देश्य पहाड़ों का विकास था. वकीलों ने तर्क दिया कि यदि उच्च न्यायालय को नैनीताल से स्थानांतरित करना ही है, तो उसे मैदानी क्षेत्र के बजाय पहाड़ के ही किसी अन्य स्थान पर शिफ्ट किया जाना चाहिए.

​याचिकाकर्ताओं ने दिए ये तर्क: मामले में याचिकाकर्ता व राज्य आंदोलनकारी अधिवक्ता रमन शाह ने कोर्ट को अवगत कराया कि जिलाधिकारी नैनीताल द्वारा हाईकोर्ट के लिए बेल बाबा मंदिर के पास रिजर्व फॉरेस्ट की जमीन का प्रस्ताव बनाना वन संरक्षण अधिनियम 1980 की धारा-2 का सीधा उल्लंघन है. याचिका में आरोप लगाया गया कि इस प्रकार के उल्लंघन के लिए जिम्मेदार अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए. याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि जिस समय सुप्रीम कोर्ट ने मामले में स्टे दिया हुआ था, उसी दौरान मई 2026 में जिलाधिकारी ने इस विवादित भूमि का प्रस्ताव तैयार किया. इसके अलावा, चिन्हित क्षेत्र में बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण किया गया है और यह क्षेत्र हाथी कॉरिडोर के अंतर्गत आता है.

भूमि हस्तांतरण को बताया गैर कानूनी: याचिका में केंद्र सरकार की अनिवार्य अनुमति का मुद्दा प्रमुखता से उठाते हुए कहा गया कि सर्वोच्च न्यायालय के 15 जुलाई 2026 के आदेश और उत्तराखंड सरकार की 12 अगस्त 2026 की अधिसूचना में भी उक्त भूमि को "फॉरेस्ट जमीन" ही माना गया है. वन संरक्षण अधिनियम 1980 के कड़े प्रावधानों के तहत किसी भी रिजर्व फॉरेस्ट भूमि को डी-रिजर्व करने या उसके स्वरूप को बदलने का कानूनी अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास निहित है, न कि राज्य सरकार या अन्य प्राधिकरणों के पास. ऐसे में बिना केंद्रीय मंजूरी के इस भूमि का हस्तांतरण पूरी तरह से नियमों के विपरीत और गैर-कानूनी है.

राज्य सरकार के वकीलों ने दिया ये तर्क: दूसरी ओर, राज्य सरकार की तरफ से पेश हुए अधिवक्ताओं ने इन सभी तर्कों का खंडन करते हुए कहा कि हाईकोर्ट शिफ्टिंग के लिए आगे की प्रक्रिया नियमानुसार चल रही है. सरकार का पक्ष था कि जिस स्थान पर उच्च न्यायालय को स्थानांतरित किया जाना प्रस्तावित है, वह कोई हाथी कॉरिडोर नहीं है. हालांकि, याचिकाकर्ता और अन्य अधिवक्ताओं ने राज्य सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब उच्चतम न्यायालय ने नैनीताल जिले में कहीं भी उपयुक्त भूमि चिन्हित करने को कहा था, तो सरकार केवल हल्द्वानी में ही इसे शिफ्ट करने पर क्यों अड़ी है, जबकि अन्य विकल्प भी मौजूद हैं. फिलहाल, सभी पक्षों की दलीलें दर्ज कर खंडपीठ ने अपना अंतिम निर्णय सुरक्षित रख लिया है.
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