कैसा रहा हरियाणा का बजट ?, नायब सिंह सैनी के पिटारे पर क्या है एक्सपर्ट ओपिनियन
हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने बजट पेश कर दिया है. ऐसे में आइए जानते हैं कि एक्सपर्ट इस बजट पर क्या सोचते हैं.

Published : March 2, 2026 at 8:17 PM IST
चंडीगढ़ : हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने आज साल 2026-27 का बजट पेश किया. कुल 2,23,658.17 करोड़ रुपए का बजट पेश किया गया और हरियाणा की महिलाओं समेत लोगों को कई बड़ी सौगातें दी गई. ऐसे में जानते हैं कि बजट को लेकर क्या सोचते हैं एक्सपर्ट ?.
बिमल अंजुम ने रखी अपनी राय : आर्थिक मामलों के जानकार बिमल अंजुम ने ईटीवी भारत से बातचीत में अपनी राय रखते हुए कहा कि " इस बजट में हरियाणा की वित्तीय तस्वीर एक ओर मज़बूती और नए अवसर दिखाती है, तो दूसरी ओर कुछ बुनियादी जोखिमों की तरफ़ भी साफ़ संकेत करती है. केंद्रीय करों में राज्य की हिस्सेदारी 1.361% तक बढ़ना (लगभग 24.5% की वृद्धि) एक बड़ा सकारात्मक कदम है. इससे अगले 5–6 साल के लिए हरियाणा को अतिरिक्त “फिस्कल स्पेस” मिलेगा, यानी पूंजीगत व्यय, सामाजिक योजनाओं और ऋण प्रबंधन में कुछ राहत और लचीलापन बनेगा.
धन का वास्तविक उपयोग हो रहा है : साथ ही ये भी महत्वपूर्ण है कि कुल राजस्व का केवल लगभग 14% ही केंद्र से आएगा, यानी राज्य को अपनी टैक्स–संग्रह क्षमता और नॉन–टैक्स रेवेन्यू पर ही मुख्य रूप से निर्भर रहना होगा. राजकोषीय आत्मनिर्भरता के नज़रिए से यह एक स्वस्थ संकेत हैं. बजट के आकार में लगभग 10% की वृद्धि और लगभग 98% तक का वास्तविक व्यय यह दिखाते हैं कि आवंटन सिर्फ़ कागज़ पर नहीं हैं, बल्कि धन का वास्तविक उपयोग भी हो रहा है. इसे प्रशासनिक दक्षता और कार्यान्वयन क्षमता की मजबूती के रूप में देखा जा सकता है.

मानकों के अनुरूप और अनुशासित : दूसरी तरफ़, राजकोषीय घाटे का स्तर GSDP के लगभग 3% के भीतर रखना FRBM मानकों के अनुरूप और अनुशासित है, लेकिन करीब 2.6% के आसपास का राजस्व घाटा चिंताजनक है, क्योंकि यह दर्शाता है कि सरकार अभी भी अपने चालू खर्चों के लिए उधार पर निर्भर है. लगभग 40 हज़ार करोड़ रुपये के आसपास पहुंचता शुद्ध ऋण भुगतान इशारा करता है कि भविष्य में debt-servicing नीति–निर्माण पर दबाव बढ़ा सकता है, भले ही वर्तमान में कोई तत्काल संकट न दिख रहा हो.
कुल घाटा नियंत्रित दायरे में रहे : पूंजीगत व्यय का 12–13% स्तर स्वीकार्य है, लेकिन हरियाणा जैसी उच्च प्रति व्यक्ति आय वाली अर्थव्यवस्था के लिए इस अनुपात को 15–20% तक ले जाना दीर्घकालिक विकास के लिए अधिक उपयुक्त होता, बशर्ते कि कुल घाटा नियंत्रित दायरे में रहे. कृषि, जल–प्रबंधन, जैविक खेती, फसल विविधीकरण और ग्रामीण बुनियादी ढांचे पर गहन एवं लक्षित पहलें इस बजट की सबसे बड़ी ताकत हैं. यदि ये योजनाएं प्रभावी ढंग से लागू की गईं, तो जल–संकट, आय में अस्थिरता और मोनो–क्रॉपिंग जैसी संरचनात्मक समस्याओं पर सार्थक प्रगति संभव है.
विकासोन्मुखी बजट : न्यूनतम मज़दूरी में तेज़ वृद्धि और उद्योगों के लिए उदार रोजगार–प्रोत्साहन अल्पकाल में मांग और रोज़गार को सहारा दे सकते हैं, लेकिन यदि उत्पादकता वृद्धि और कौशल–विकास की गति इसके साथ तालमेल न बिठा पाई, तो लागत–दबाव, अनौपचारिक रोज़गार में वृद्धि और राजकोषीय बोझ के बढ़ने का जोखिम भी रहेगा. कुल मिलाकर, ये बजट विकास–उन्मुख और अपेक्षाकृत अनुशासित प्रतीत होता है. इसकी वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि लागू करने की क्षमता कितनी मज़बूत है, राजस्व आधार को कितनी प्रभावी ढंग से चौड़ा किया जाता है, राजस्व घाटे को कितने क्रमिक और ठोस तरीके से घटाया जाता है.
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