हमीरपुर हादसा: 'साहब! कंक्रीट के नीचे पुल नहीं, हमारे घर की इकलौती छत ढह गई'; मलबे में दफन हो गए परिवारों के कमाऊ चिराग!
श्रम विभाग के प्रवर्तन अधिकारी महेंद्र कुमार के अनुसार, निर्माण स्थल पंजीकृत था और संबंधित देयताएं जमा थीं.

By ETV Bharat Uttar Pradesh Team
Published : May 31, 2026 at 2:48 PM IST
हमीरपुर: जब शहरों में लोग अपने पक्के कमरों में बैठकर आंधी-तूफान के थमने की दुआ मांग रहे थे, तब हमीरपुर की एक कंस्ट्रक्शन साइट पर कंक्रीट के भारी-भरकम स्लैब के नीचे कुछ जिंदगियां दम तोड़ रही थीं. उत्तर प्रदेश के हमीरपुर में निर्माणाधीन पुल ढहने से मारे गए 6 मजदूर सिर्फ सरकारी फाइलों के 'आंकड़े' नहीं हैं. यह किसी बूढ़े बाप की लाठी थे, किसी नवविवाहिता का सुहाग थे और किसी मासूम के स्कूल की फीस भरने वाले हाथ थे. जो मजदूर कल तक शहर को जोड़ने के लिए लोहे और सीमेंट का ढांचा खड़ा कर रहे थे, आज उनके खुद के कच्चे घरों की दीवारें अपनों के जाने के गम में दरक गई हैं. यह रिपोर्ट विकास की उस वेदी की है, जहां सबसे कमजोर तबके की बलि चढ़ा दी गई. पेश है मनोज द्विवेदी के संपादन में अमित कुमार शुक्ला की रिपोर्ट.
कुछ दिनों पहले यूपी में रात की खामोशी अचानक आंधी-तूफान और बादलों की गड़गड़ाट से टूट गई. ठीक उसी समय हमीरपुर के बेतवा नदी पर बन रहे पुल पर कुछ मजदूर रोजी-रोटी की लड़ाई लड़ रहे थे. तूफान भयावह था, लेकिन किसी को यह अंदेशा नहीं था कि अगले चंद पलों में क्या होने वाला है. कुछ मजबूर आंधी तूफान से बचने के लिए स्लैब के नीचे दुबक गए. रात करीब 2 बजे के आसपास अचानक एक स्लैब भरभराकर गिर गया और 6 लोग काल के गाल में समा गए.
भले ही यह 6 का आंकड़ा सरकारी फाइलों में मुआवजे की लिस्ट में दर्ज हो गए लेकिन जान गंवाने वालों में कोई 4 बेटियों का पिता था तो कोई बूढ़े मां-बाप का सहारा. कोई परिवार का इकलौता कमाने वाला सदस्य था, तो किसी की कुछ महीनों बाद शादी होने वाली थी. जो लोग कल तक दूसरों के लिए रास्ता बना रहे थे, आज उनके अपने परिवारों की जिंदगी का रास्ता अंधेरे में डूब गया. यह कहानी सिर्फ पुल का स्लैब गिरने की नहीं है. यह कहानी उन 6 चेहरों की है, जिनके साथ उनके परिवारों के सपने भी मलबे में दब गए.

बेटी शिवानी को पुलिस में भर्ती कराना चाहता था पिता: अछपुरा गांव निवासी 45 वर्षीय राजेश पाल पुल निर्माण परियोजना में गार्ड थे. लगभग 13 हजार रुपए की आय से उनका पूरा परिवार चलता था. घर में पत्नी, वृद्ध माता-पिता और 4 बेटियां हैं. परिजनों के मुताबिक, उनकी सबसे बड़ी बेटी शिवानी बीए की पढ़ाई कर रही है. राजेश पाल चाहते थे कि बेटी पढ़-लिखकर पुलिस में भर्ती हो. वह अक्सर कहते थे कि पढ़ाई मत छोड़ना. मैं तुम्हें आगे बढ़ाऊंगा.
परिवार वालों के अनुसार बड़ी बेटी की शादी की भी तैयारी शुरू हो चुकी थी. धीरे-धीरे पैसे जोड़े जा रहे थे, लेकिन हादसे ने सारी प्लानिंग तहस-नहस कर दी. अब घर में कमाने वाला कोई नहीं बचा है. एक बीघा जमीन है, लेकिन उससे परिवार का गुजारा संभव नहीं है.
पिता हार्ट पेशेंट हैं और काम करने की स्थिति में नहीं हैं. हादसे के बाद दुख यहीं नहीं रुका. परिवार के लोग अंतिम संस्कार में लगे थे और उसी दौरान आंधी में उनकी दो भैंसें भी गायब हो गईं. एक परिवार जिसने अपना कमाने वाला सदस्य खोया, उसका पशुधन भी बिखर गया.
परिजनों का दावा है कि ड्यूटी पर न पहुंचने पर मजदूरी काटने के साथ अतिरिक्त पेनाल्टी भी लगाई जाती थी. उनका आरोप है कि मजदूर मजबूरी में खराब मौसम में भी ड्यूटी करने पहुंचते थे. इन आरोपों की जांच अभी बाकी है.

दिसंबर में शादी होनी थी अब घर में मातम: स्वासा खुर्द निवासी 34 वर्षीय पुष्पेंद्र सिंह चौहान तीन भाइयों में दूसरे नंबर पर थे. वह अविवाहित थे और माता-पिता के साथ रहते थे. छोटे भाई राघवेंद्र सिंह बताते हैं कि हादसे से लगभग एक घंटे पहले उनकी फोन पर बात हुई थी.
बातचीत सामान्य थी. किसी को अंदाजा नहीं था कि कुछ देर बाद सब खत्म हो जाएगा. पुष्पेंद्र 12 घंटे ड्यूटी करते थे और लगभग 9 हजार रुपए मासिक कमाते थे. परिवार के अनुसार माता-पिता की देखभाल की सबसे बड़ी जिम्मेदारी उन्हीं पर थी.

राघवेंद्र सिंह बताते हैं कि शादी की बातचीत लगभग तय हो चुकी थी. दिसंबर या फरवरी में विवाह होने की उम्मीद थी. पुष्पेंद्र घर बनाना चाहते थे, खेती बढ़ाना चाहते थे और परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत करना चाहते थे. गांव में लोग उन्हें मिलनसार और मिलनसार स्वभाव के व्यक्ति के रूप में जानते है.
राजनीति और सामाजिक गतिविधियों में भी उनकी रुचि थी. अब मां माया देवी और पिता राजेंद्र सिंह बार-बार सिर्फ एक ही सवाल पूछ रहे हैं कि अब हमें कौन देखेगा? परिवार का कहना है कि उनके पास नाममात्र की खेती है. घर का वास्तविक सहारा पुष्पेंद्र ही थे.

मेरी आंखों के सामने दब गए राजेश और पुष्पेंद्र: घटना के समय साइट पर मौजूद गार्ड अवधपाल की आंखों में आज भी उस रात का मंजर ताजा है. अवधपाल का दावा है कि उन्होंने अपनी आंखों के सामने राजेश पाल और पुष्पेंद्र सिंह को मलबे में दबते देखा. उनका कहना है कि मौसम खराब था.
तेज आंधी चल रही थी, लेकिन कामकाज जारी था. अवधपाल का आरोप है कि यदि समय रहते सावधानी बरती जाती तो शायद इतनी बड़ी जनहानि नहीं होती. उन्होंने निर्माण सामग्री की गुणवत्ता को लेकर भी सवाल उठाए.
उनका दावा है कि साइट पर कुछ सीमेंट की बोरियां खराब हालत में थीं और निर्माण सामग्री को लेकर मजदूरों के बीच चर्चा होती रहती थी. अवधपाल ने यह भी दावा किया कि पुल निर्माण में इस्तेमाल की जा रही रेत और अन्य सामग्री की गुणवत्ता की भी जांच होनी चाहिए. हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और यह जांच का विषय है.

400 रुपये की पेनाल्टी और रोजी-रोटी की मजबूरी: मृतकों के परिजनों और कुछ मजदूरों का दावा है कि ड्यूटी से अनुपस्थित रहने पर मजदूरी काटने के साथ अतिरिक्त पेनाल्टी भी लगाई जाती थी. परिवारों का कहना है कि गरीब मजदूरों के लिए कुछ सौ रुपये भी बहुत मायने रखते हैं.
ऐसे में खराब मौसम होने पर भी वह ड्यूटी छोड़ने का जोखिम नहीं उठा पाते थे. यही वजह है कि हादसे के बाद गांवों में यह सवाल लगातार उठ रहा है कि क्या रोजी-रोटी की मजबूरी लोगों को मौत के मुंह तक ले गई? इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और जांच के बाद ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट होगी.
बकरीद की छुट्टी ने बचा दी जान: मजदूर इरफान और शफीक हादसे से पहले छुट्टी लेकर घर चले गए थे. दोनों का कहना है कि यदि वह उस रात साइट पर मौजूद होते तो शायद उनकी भी जान चली जाती. उनका कहना है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और मृतकों के परिवारों को पर्याप्त सहायता मिलनी चाहिए. यह सिर्फ हादसा नहीं, सिस्टम का फेलियर है.
स्थानीय ग्रामीण सचिन सेंगर इस हादसे को सिर्फ एक दुर्घटना नहीं मानते. उनका कहना है कि किसी गरीब मजदूर की जिंदगी की कीमत 4-5 लाख रुपए नहीं हो सकती. सचिन सेंगर इसे सिस्टम का फेलियर बताते हैं. उनके मुताबिक यदि सुरक्षा व्यवस्था, निगरानी तंत्र और जवाबदेही मजबूत होती तो शायद 6 लोगों की जान बच सकती थी.
ग्राउंड जीरो पर मिले कई सवाल: ETV भारत की टीम जब घटनास्थल पहुंची तो वहां टूटे पिलर, ध्वस्त सेगमेंट, बाहर निकली सरिया, क्षतिग्रस्त लॉन्चिंग गैंट्री और मलबे के ढेर दिखाई दिए. घटनास्थल से जुड़े वर्कशॉप परिसर में बड़ी संख्या में सीमेंट की बोरियां रखी मिलीं.
कई बोरियां फटी हुई थीं और कुछ में सीमेंट गांठ बन चुका था. स्थानीय लोग और कुछ मजदूर निर्माण सामग्री की गुणवत्ता पर सवाल उठा रहे हैं. हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि ऐसी सामग्री का उपयोग निर्माण कार्य में किया गया था या नहीं.
साइट रजिस्टर्ड निरीक्षण नहीं हुआ: श्रम विभाग के प्रवर्तन अधिकारी महेंद्र कुमार के अनुसार, निर्माण स्थल पंजीकृत था और संबंधित देयताएं जमा थीं. हालांकि, उन्होंने स्वीकार किया कि साइट का निरीक्षण नहीं हुआ था. उन्होंने बताया कि वर्कमैन कंपनसेशन एक्ट के तहत निर्माण कंपनी को नोटिस जारी किया गया है.
मृतकों की आयु के आधार पर 11 से 15 लाख रुपए तक का वैधानिक मुआवजा बन सकता है. विभागीय सहायता के रूप में 1.25 लाख रुपए देने की प्रक्रिया भी शुरू की गई है. जब उनसे मजदूरों द्वारा लगाए गए सुरक्षा संबंधी आरोपों के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि यह जांच का विषय है.
आखिर जिम्मेदार कौन?
क्या मौसम की चेतावनी के बावजूद पर्याप्त सावधानी बरती गई थी?
क्या मजदूरों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता थी?
क्या निर्माण कार्य की निगरानी पर्याप्त थी?
क्या खराब मौसम में काम रोकने का निर्णय लिया जाना चाहिए था?
क्या 6 मौतें टाली जा सकती थीं?
इन सवालों के जवाब जांच एजेंसियां तलाशेंगी, लेकिन फिलहाल बेतवा नदी के किनारे बिखरा मलबा, सूने आंगन, रोती बेटियां, टूटे हुए माता-पिता और उजड़े परिवार यही बता रहे हैं कि विकास की इस दौड़ में सबसे बड़ी कीमत फिर एक मजदूर ने ही चुकाई है. कंक्रीट का ढांचा ढहने से पुल का निर्माण जरूर रुका है, लेकिन उससे कहीं ज्यादा उन परिवारों का भविष्य टूट गया है, जिनके घरों के कमाऊ चिराग अब कभी वापस नहीं लौटेंगे.
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