ढोल और थालियों की थाप के साथ शुरू होती है अनोखी परंपरा, पर्यावरण संरक्षण का दूसरा नाम बना हलमा
रतलाम में आदिवासियों की हलमा परंपरा दे रही पर्यावरण संरक्षण का संदेश, हलमा के जरिए तलाबों की सफाई, गहरीकरण, दिव्यराज सिंह की रिपोर्ट.

By ETV Bharat Madhya Pradesh Team
Published : May 25, 2026 at 9:29 PM IST
रतलाम : आदिवासियों की परंपराएं और रीति रिवाज अक्सर प्रकृति से जुड़े हुए होती हैं. इन परंपराओं के जरिए आदिवासी अपने समाज में कई तरह के संदेश देते हैं. एक ऐसी ही परंपरा है हलमा. रतलाम जिले के आदिवासी अंचल में हलमा कार्यक्रम आयोजित कर सामूहिक श्रमदान और जनसहयोग से पर्यावरण संरक्षण किया जा रहा है. आदिवासी अपनी इस परंपरा के जरिए तालाब और नदियों का संरक्षण कर रहे हैं, जो आने वाले समय के लिए बेहद जरूरी है. इस कार्य में उनकी मदद एनजीओ और शासकीय संस्थाएं भी कर रही हैं.
क्या हैं यह हलमा परंपरा?
आदिवासी अंचल में आपसी सहयोग और सामूहिक कार्य करने की कई परंपराएं प्रचलित हैं. इनमें से एक परंपरा है 'हलमा'. इस परंपरा में समाज के सभी लोग मिलकर जरूरतमंद व्यक्ति या परिवार की श्रमदान और जनसहयोग से मदद करते हैं. आदिवासी संगठन कार्यकर्ता किशन सिंगाड़ ने बताया, '' ये परंपरा आदिवासी समाज में प्राचीन काल से ही प्रचलित है. इसमें समाज के लोगों द्वारा मिलकर सामूहिक रूप से श्रमदान और जन सहयोग किया जाता है. आमतौर पर समाज के जरूरतमंद व्यक्ति या आकस्मिक आपदा झेल रहे परिवार की मदद के लिए पूरा गांव एकत्रित होकर सामूहिक जन सहयोग करता है.''
उदाहरण के तौर पर यदि किसी का मकान आंधी तूफान में गिर गया है या कृषि कार्य में उसे किसी मदद की आवश्यकता है, तो गांव और समाज के लोग मिलकर हलमा कार्यक्रम आयोजित करते हैं. जिसमें श्रमदान करने, रुपए एकत्रित करने जैसी सामूहिक मदद लोगों द्वारा निस्वार्थ भाव से की जाती है. इसके बदले में गांव और समाज के लोग हितग्राही से किसी प्रकार के लाभ की उम्मीद नहीं रखते हैं. वहीं, इसी परंपरा को प्रकृति के संरक्षण के लिए भी प्रयोग किया जाता रहा है.

सामूहिक श्रमदान से पर्यावरण संरक्षण
आदिवासी समाज में प्रकृति की रक्षा और जल संरक्षण के प्रति प्राचीनकाल से ही जागरूकता है लेकिन समय के साथ हलमा परंपरा केवल सामाजिक सहयोग तक ही सीमित रह गई थी. इसके बाद जनअभियान परिषद ,वाग्धारा और अन्य गैर शासकीय संस्थाओं की मदद से इस परंपरा को पुनः प्रकृति और जल संरक्षण के कार्य से जोड़ा गया. अब एक बार फिर आदिवासी अंचलों में हलमा कार्यक्रमों का आयोजन होने लगा है. वाग्धारा संस्था की ब्लॉक कॉर्डिनेटर रेणुका पोरवाल ने बताया, '' जल गंगा संवर्धन अभियान के अंतर्गत ग्रामीणों ने सामूहिक श्रमदान करते हुए गांव के तालाब से मिट्टी निकालने का कार्य किया है. इसके लिए बाकायदा परंपरागत ढोल और थालियों की थाप पर लोकगीत गाते हुए छोटे बच्चे ,महिलाएं और बुजुर्ग भी इस सामूहिक श्रमदान में शामिल हुए. हलमा के माध्यम से जल संरक्षण, सामुदायिक एकता और पारंपरिक आदिवासी संस्कृति को मजबूत करने का संदेश दिया जा रहा है.''

हलमा के जरिए तलाबों की सफाई, गहरीकरण
वहीं, आदिवासियों की प्राचीन परंपरा को प्रकृति से जोड़कर पुनर्जीवित भी किया जा रहा है. मानपुरा गांव की पिंकी भूरिया ने बताया, '' इस आयोजन में हम सभी गांव के लोग जिसमें बच्चे महिलाएं और बुजुर्ग व्यक्ति शामिल होते हैं, एक छायादार पेड़ के नीचे एकत्रित होकर श्रमदान करने के लिए बैठक करते हैं, जिसे हलमा कहा जाता है. इसकी सूचना गांव में मुनादी कर दे दी जाती है. इसके बाद निर्धारित दिन और समय पर सभी गांव के लोग पारंपरिक वेशभूषा में लोकगीत गाते हुए एकत्रित होते हैं और श्रमदान करते हैं. दर्जन गांवों में हलमा कार्यक्रमों का आयोजन हो चुका है. जिसमें तालाब की सफाई और गहरीकरण सहित नदी के किनारों की सफाई के कार्य किए गए हैं.''

ऐसे हो रहा जल स्रोतों का जीर्णोद्धार
जल संरक्षण अभियान से आदिवासी समाज की परंपरा को जोड़ने के अच्छे नतीजे बजाना ब्लॉक में देखने को मिले हैं. जन अभियान परिषद के जिला कॉर्डिनेटर रत्नेश विजयवर्गीय ने बताया, '' जल गंगा संवर्धन अभियान के अंतर्गत रतलाम जिले के बजाना और सैलाना ब्लॉक में पारंपरिक श्रमदान यानी हलमा कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है. इसके अंतर्गत घोड़ाखेड़ा ग्राम पंचायत की रामपुरिया, हालीवाड़ा, भगोरा, कलियाकुंडली,रामपुरिया, मानपुरा जैसे गांव में तालाब सफाई व गहरीकरण, नदी के किनारों की सफाई, शासकीय कुओं और बावड़ियों का पुनर्जीवन जैसे कार्य किए जा रहे हैं.''

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आदिवासी समाज की यह अनोखी व प्रकृति को समर्पित परंपरा आज भी जीवित है और भीषण गर्मी और जल संकट के इस दौर में अन्य समाज व गांव के लिए भी सामूहिक प्रयास एवं श्रमदान की मिसाल पेश कर रही है.

