मुर्दों की राख से मचेगा बिहार में हुड़दंग, चिताओं की भस्म छानकर कुछ देर में होगी 'मसानी होली'
बिहार में पहली बार मुर्दों की राख से को छानकर तैयार हो रही 'मसानी होली', महादेव के गणों संग खेलेंगे हजारों लोग! क्या है सच्चाई...

Published : February 27, 2026 at 5:06 PM IST
रिपोर्ट: रंजीत कुमार पाठक
हाजीपुर : होली के त्योहार को देशभर में लोग अपने-अपने अंदाज में मानते हैं. किसी को रंगों वाली होली पसंद है तो किसी को फूलों वाली. कोई कीचड़ से लिपटकर उत्साहित होता है तो कोई गुलाल लगाकर खुश होता है. इन सबसे अलग है मसानी होली. काशी के अलावा पिछले कुछ सालों से बिहार के वैशाली में ऐसी ही होली खेली जा रही है.
कहां का राख उड़ेगा? : वैशाली की पावन धरती इस बार एक ऐसे अलौकिक और रोंगटे खड़े कर देने वाले उत्सव की गवाह बनने जा रही है. जिसकी कल्पना मात्र से ही मन भक्ति और वैराग्य से भर जाता है. गंगा-गंडक के विश्व प्रसिद्ध संगम 'कौनहारा घाट' पर होने वाली 'मसानी होली' इस बार अपने सबसे व्यापक और भव्य स्वरूप में आयोजित की जा रही है.
रहस्यों की भूमि.. जहां लगता है 'भूतों का मेला' : मसानी होली का आयोजन उसी ऐतिहासिक और रहस्यमयी भूमि पर हो रहा है, जो सदियों से तंत्र-मंत्र और आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र रही है. कौनहारा घाट का यह वही क्षेत्र है, जहां हर साल कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर कई किलोमीटर के दायरे में 'भूतों का मेला' लगता है. इस मेले में भारत के कोने-कोने से लाखों की संख्या में वे लोग आते हैं जो नकारात्मक ऊर्जा या बाधाओं से मुक्ति चाहते हैं.
चिताओं की भस्म 'अशुभ' नहीं, 'परम पवित्र' : महोत्सव के संरक्षक और मां तारा तंत्रपीठ के महंत श्री महाकाल बाबा ने बताया कि इस होली के लिए चिताओं की भस्म का उपयोग किया जाएगा. आमतौर पर जिसे लोग अशुभ मानकर दूर भागते हैं, उसे तंत्र शास्त्रों और शिव साधना में 'परम पवित्र' माना गया है.
''श्मशान में जल चुकी चिताओं की ताजी और शांत भस्म को विशेष विधि से इकट्ठा किया जा रहा है. चिता भस्म में मौजूद लकड़ी या कोयले के मोटे टुकड़ों को बड़े कपड़ों की मदद से 'चाला' (छाना) जाएगा, ताकि खेलने के लिए केवल रेशम जैसी बारीक और शुद्ध भस्म ही शेष रहे. इस भस्म को पवित्र मंत्रों से अभिमंत्रित भी किया जा रहा है.'' - श्री महाकाल बाबा, मां तारा तंत्रपीठ के महंत

आध्यात्मिक व आरोग्य लाभ: श्री महाकाल बाबा का कहना है कि जो महादेव को भाता है, वह अपवित्र कैसे हो सकता है? आध्यात्मिक दृष्टिकोण से इस भस्म के स्पर्श से असाध्य रोगों से मुक्ति मिलती है, मानसिक कष्ट दूर होते हैं और कुंडली के क्रूर ग्रहों की शांति होती है.
''महोत्सव में बिहार के कोने-कोने से वे साधक भी जुटेंगे जो श्मशान परंपरा और मसानी देवता (अष्टधात्री देवता) के उपासक हैं. उनके लिए यह साधना की सिद्धि का सबसे बड़ा अवसर है.''- श्री महाकाल बाबा, मां तारा तंत्रपीठ के महंत

रात्रि 9:00 बजे से 'मसान प्रवेश' की मर्यादा : श्री महाकाल बाबा ने बताया कि मसान की अपनी एक आध्यात्मिक मर्यादा और समय सीमा होती है, जिसका उल्लंघन नहीं किया जा सकता. मुख्य 'मसान प्रवेश' का कार्यक्रम आज रात 9:00 बजे से ही शुरू होगा. इससे पूर्व, शाम के समय भारत की विभिन्न सांस्कृतिक होलियों का प्रदर्शन कर वातावरण को भक्तिमय बनाया जाएगा.
बाल गोपाल की मटका होली, ब्रज की लड्डू और लड्डू मार होली व मथुरा-वृंदावन की प्रसिद्ध लठमार होली इन सभी उत्सवों के समापन के बाद, जैसे ही रात गहराएगी, चिता भस्म की वह होली शुरू होगी जो 'हरि' (विष्णु) और 'हर' (शिव) के मिलन का साक्षी बनेगी.
मसान होली को लेकर लोगों की राय : कौनहारा घाट के श्मशान भूमि पर मौजूद मां तारा संस्थान से काफी लोग जुड़े हुए हैं. 4 साल से मसान होली की परंपरा रही है जिसमें लगातार शामिल होने वाले लोगों का कहना है कि गृहस्थ आश्रम में रहने वाले लोग भी काफी संख्या में मसान होली में न सिर्फ भाग लेते हैं बल्कि किताब भस्म से भी होली खेलते हैं.

अलग-अलग चॉइस : मसानी होली में लोगों के लिए अलग-अलग चॉइस होगी. जो मसानी परंपरा के लोग हैं या गृहस्थ आश्रम के लोग जो शव के भस्म से होली खेलना चाहते हैं वह खेल सकते हैं. लेकिन जिन लोगों को इससे परहेज है उनके लिए अबीर गुलाल की भी व्यवस्था संस्था के द्वारा की गई है.
35 भव्य झांकियां और शिवलोक का नजारा : इस साल का आयोजन अभूतपूर्व होने वाला है क्योंकि पहली बार इसमें 35 भव्य झांकियां निकाली जाएंगी. जिसमें कौनहारा घाट की मसान होली, भोलेनाथ, मां तारा व मां काली आदि की प्रतीकात्मक रूपों को दर्शाया जाएगा. श्रद्धालु केवल अबीर-गुलाल में नहीं, बल्कि शिव के प्रिय गणों—भूत, प्रेत और बेताल के वेश में नजर आएंगे.
चिता की लकड़ियों के बीच उत्सव : घाट पर प्रतीकात्मक रूप से चिता की लकड़ियों का घेरा बनाया जाएगा, जिसके बीच भक्ति की ज्वाला और इर्द-गिर्द झूमते श्रद्धालु इस उत्सव को अलौकिक बनाएंगे. लाइट लगाए जा रहे हैं और भरपूर साउंड सिस्टम काफी सपोर्ट रहेगा. जिनपर भक्त झूमते हुए नजर आएंगे.

कौनहारा घाट का विशेष महत्व : कौनहारा घाट, जहां पौराणिक काल में गज और ग्राह के युद्ध के बाद भगवान विष्णु ने अपने भक्त को मोक्ष दिया था, आज उसी संगम पर 'हरि और हर' के आशीष से मृत्यु के सन्नाटे को उत्सव में बदला जा रहा है.
राख का त्योहार है मसान की होली : मसान होली को राख का त्योहार भी कहा जाता है. 'मसान' का अर्थ श्मशान (जहां शव दाह होता है) और 'मसान होली' का अर्थ श्मशान की होली है, यहां न रंग, न पिचकारी, न गोपी, न ग्वाले चारों ओर भूत-पिशाच की भेष में आए भोलेनाथ के भक्त चिता की भस्म से होली खेलते हैं. ये त्योहार मोह माया के जाल से मुक्त होने को दर्शाता है क्योंकि अंत में व्यक्ति को राख ही होना है. यह उत्सव मृत्यु पर विजय और जीवन-मृत्यु के चक्र से परे आत्मा की अमरता का प्रतीक है.
कैसे हुई मसान होली की शुरुआत : पौराणिक कथाओं के मुताबिक मसान की होली की शुरूआत भगवान शिव ने की थी. दरअसल रंगभरी एकादशी के दिन बाबा विश्वनाथ पहली बार माता पार्वती के साथ विवाह के बाद काशी आए थे. उस दिन मां का स्वागत गुलाल के रंग से किया था. शिवजी ने अपने गणों के साथ गुलाल से होली खेली लेकिन भूत-प्रेत, यक्ष, गंधर्व और प्रेत के साथ नहीं खेली इसीलिए रंगभरी एकादशी के दूसरे दिन मसाने की होली खेली जाती है.
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