शुगर फ्री आलू, चाव से खा सकते हैं डायबिटीज मरीज, ग्वालियर में तैयार हो रहा न्यूजीलैंड का आलू
ग्वालियर की एरोपोनिक लैब में तैयार हो रहा नीदरलैंड का लेडी रोसेटा आलू, 50 दिन में 1 किलो बीज से 400 किलो मिलेगा उत्पाद.

By ETV Bharat Madhya Pradesh Team
Published : February 9, 2026 at 10:43 PM IST
ग्वालियर: जब कोई व्यक्ति ब्लड शुगर यानी डायबिटीज का मरीज बन जाए, तो डॉक्टर सबसे पहले ऐसी चीजें बंद कराते हैं, जिनमें शर्करा की मात्रा ज्यादा होती है. जिसमें भोजन में सदाबहार सब्जी आलू जो हर जगह फिट हो जाता है, सबसे पहले उसे ही खाने से मनाही कर दी जाती है. लेकिन अब ऐसा नहीं होगा. डायबिटीज के मरीज भी आलू चाव से खा सकेंगे. क्योंकि मध्य प्रदेश के ग्वालियर स्थित राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय ने आलू की ऐसी प्रजाति के बीज 'लेडी रोसेटा' अपनी रिसर्च में उगाए हैं, जो शुगर फ्री हैं. डायबिटीज के मरीज इन्हें बिना शुगर लेवल बढ़ने की फिक्र किए आराम से खा सकेंगे.
एरोपोनिक लैब में तैयार हो रहा लेडी रोसेटा
ग्वालियर की राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय की एरोपोनिक्स यूनिट लैब में इन दिनों 20 प्रजातियों के आलू के बीज तैयार किए जा रहे हैं. इनमें सबसे खास प्रजाति है, लेडी रोसेटा (LR), क्योंकि इस आलू की एक खासियत इसे नायब बनाती है. लेडी रोसेटा ऐसा आलू है, जो शुगर फ्री है. यानी आलू की अन्य प्रजातियों से अलग इस वेराइटी में शुगर नहीं है.

नीदरलैंड में पाया जाता है शुगर फ्री आलू
राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय में एरोपोनिक्स प्रोजेक्ट हेड और कृषि विज्ञानी डॉ. सुषमा तिवारी ने बताया, "लेडी रोसेटा (एलआर) के बीज पहली बार मध्य प्रदेश में रिसर्च कर, विश्वविद्यालय ने तैयार किए हैं. इससे पहले मध्य प्रदेश में ये वेराइटी पहले कभी नहीं आई. मूल रूप से ये विदेशी किस्म है, जो नीदरलैंड में पाई जाती है."

टेस्टिंग के तौर पर लगाए थे 200 पौधे
डॉ. सुषमा तिवारी ने बताया, " एलआर वेराइटी या लेडी रोसेटा आलू की बहुत खास किस्म है, जिससे अन्य वेराइटी के साथ प्रयोग के तौर पर विश्वविद्यालय के एरोपोनिक यूनिट में लगाया गया है. यहां करीब 200 प्लांट तैयार किए गए थे, जिनमें अब मिनी ट्यूबर यानी आलू के बीज आने लगे हैं. उनकी हार्वेस्टिंग भी हर दिन हो रही है."
200 पौधों से टेस्टिंग रिसर्च, मिलेंगे लाखों बीज
सुषमा तिवारी ने बताया, "जब इसे टेस्टिंग के तौर पर लगाया गया था, तो पता नहीं था रिजल्ट क्या होगा. लेकिन रिसर्च में पाया गया कि इसका आउटकम एरोपोनिक तकनीक से बहुत शानदार है. हर एक प्लांट से प्रतिदिन करीब 80 से 200 तक बीज मिल रहे हैं. जबकि साधारण तौर पर खेत में 5 से 7 बीज तक मिलते हैं. ऐसे में इसका प्रोडक्शन 40 गुना तक ज्यादा है. जिस तरह से हर दिन हार्वेस्टिंग हो रही है, इस बीज फसल के पूरे होने तक, इन 200 पौधों से रिसर्च टीम को डेढ़ से 2 लाख बीज मिलने की उम्मीद है."

क्या है इस आलू की इस वैरायटी की खासियत?
डॉ. सुषमा तिवारी ने बताया कि वे लेडी रोसेटा वेराइटी पर केमिकल स्टडी और एंजाइमेटिक स्टडी भी कर रही हैं. साथ ही न्यूयीशनल पैरामीटर भी परखे जा रहे हैं. इन स्टडी से ये पाया गया है कि इस वेराइटी में स्टार्च कंटेंट बहुत कम है. एंटीऑक्सीडेंट्स की मात्रा बहुत अधिक है और शुगर कंटेंट न के बराबर है. ऐसे में डायबिटीज मरीज भी इसे खा सकते हैं.

स्वाद के साथ रंग भी नायाब
ये आलू सिर्फ अपनी खासियत से ही नहीं, बल्कि रूप से भी बहुत खास है. क्योंकि एलआर वैरायटी का आलू आम प्रचलित किस्मों से हटके है. इसका रंग बहुत आकर्षक है. ये गुलाबी रंग का होता है, जो दिखने में भी बेहद खूबसूरत लगता है. इसका स्वाद बहुत अच्छा है. ये आलू घुलता नहीं है, बल्कि सख्त रहता है. ऐसे में मीठापन भी इसमें नहीं आता है.

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किसानों को कब होगा उपलब्ध?
सबसे बड़ा और अहम सवाल ये है कि शुगर फ्री आलू बाजार तक कब पहुंचेगा? इसके बारे में डॉ. सुषमा तिवारी ने बताया, "अभी एलआर बीज पहले चरण में हैं. अभी मिनी ट्यूबर्स की हार्वेस्टिंग हो रही है. दूसरे चरण में इन्हें नेट हाउस में लगाया जाएगा. इसके बाद तीसरे चरण में इन्हें विश्वविद्यालय के कैंपस फील्ड में बोया जाएगा. ये तीनों प्रोसेस पूरा होने में करीब 2 साल का समय लगेगा. इसके बाद इन्हें किसानों को उपलब्ध कराया जाएगा, जो इनसे अपनी फसल तैयार करेंगे. खेत में इस फसल को तैयार होने में लगभग 50 से 60 दिन का समय लगेगा. लगभग 1 किलो बीज से 400 किलो तक आलू किसानों को मिलेगा. जिसे वे बाजार में बेच कर मुनाफा कमा सकेंगे."

