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बिजली के खंभों पर लटकता पाइपलाइन का मकड़जाल, यही है नल जल योजना की हकीकत!

ग्वालियर में बिजली के खंभों पर लटकी हैं पानी की पाइपलाइन, बूंद-बूंद पानी को तरस रहा सौजना गांव. पीयूष श्रीवास्तव की रिपोर्ट.

GWALIOR  WATER PIPELINE ON ELECTRIC POLE
खंभों पर तार से ज्यादा नजर आते हैं पाइप (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Madhya Pradesh Team

Published : May 23, 2026 at 9:44 PM IST

8 Min Read
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ग्वालियर: घाटीगांव इलाके में बसे सोजना गांव में कदम रखते ही एक मायूसी नजर आती है. लोग खाली बर्तनों के साथ इधर-उधर टहलते नजर आते हैं. आसमान की ओर नजर उठायेंगे तो एक जाल दिखाई देगा. पानी के पाइपलाइन का जाल, जो एक दूसरे से लिपटी और खंबो से लटकी हुई है. बिजली के तारों की तरह ही यह पाइप भी अलग-अलग घरों में जाती है. ये पाइपलाइन इस गांव की लाइफ लाइन है, जो लोगों की प्यास बुझाता है. इसके साथ ये उस योजना को भी बेनकाब करता है, जिसका हर घर पानी पहुंचाने का उद्देश्य है.

प्यासे अतिथि को पानी देना भी दूभर

घाटीगांव क्षेत्र की ग्राम पंचायत सोजना में पेयजल एक चुनौती है. यहां के लोग हर दिन पानी के लिए जद्दोजहद करते हैं. यह एक पथरीला गांव है, जहां की जमीन में भी पानी आसानी से नहीं मिलता. वहीं, सरकारी कागजों से लेकर सोजना की जमीन तक नल जल योजना की पाइपलाइन भी दबी हुई है. नल जल योजना के पाइप में आज तक पानी की एक बूंद भी नहीं आई. सुबह भोजन पकाना हो या बच्चों का नहाना, हर घर के लिए एक चुनौती नजर आता है. हालत ये है कि अगर कोई बाहर से आया व्यक्ति पीने के लिए एक ग्लास पानी मांग ले, तो लोगों के चेहरे उतर जाते हैं.

पानी के घोर संकट से जूझ रहा है ग्वालियर का सोजना गांव (ETV Bharat)

गांव का एक मात्र हैंडपंप भी बरसों से है खराब

ईटीवी भारत की टीम जब सोजना गांव में पहुंची, तो लोगों की भीड़ इकट्ठा हो गई. सामने एक पत्रकार देख लोगों ने गुहार लगाना शुरू कर दिया और अपनी समस्या बताने लगे. लोगों ने कहा कि हमारे चुने हुए जनप्रतिनधि, तो हमें सिर्फ वोट बैंक समझते हैं. लेकिन शायद मीडिया के माध्यम से हमारी समस्या सरकार तक पहुंच जाए, बस इसकी उम्मीद है.

ग्रामीणों से पता चला कि गांव में एक सरकारी कुंआ हैं, जो बरसों पहले सूख चुका है. एक हैंडपंप भी है, जो सालों से बंद पड़ा है. इसके बाद टीम ने ग्रामीणों ने जानना चाहा कि इस गांव के लोगों की प्यास कैसे बुझती होगी? कैसे अपने दिनचर्या के काम और मवेशियों की देखभाल करते होंगे? ग्रामीणों से पूछने पर इन सवालों का जवाब तो मिला, लेकिन गुस्सा और दर्द भरी आवाजों में.

Gwalior water pipeline on pole
पानी की पाइपलाइन का जाल (ETV Bharat)

गांव के बाहर 3 प्राइवेट कुंओं पर निर्भर है सोजना गांव

सोजना गांव पथरीली जमीन पर बसा है, जिसकी वजह से यहां की जमीन में ही पानी नहीं है. करीब डेढ़ से दो किलोमीटर दूर कुछ खेत हैं जिनमें खेत मालिकों ने कुंए खुदवाये हैं. ये कुएं अब खेत मालिकों के लिए कमाई का जरिया हैं और ग्रामीण इन्हीं कुएं के पानी पर निर्भर हैं. इसी कुएं से गांव में पाइपलाइन का जाल फैला है. कुएं से एक पाइप के जरिए पानी गांव तक पहुंचता है और फिर इसी पाइप में एक-एक कर लोग अपने घरों में डाले गए पाइप जोड़ते हैं, तब जाकर पानी घरों तक पहुंचता है.

पानी के लिए हर महीने देने होते हैं 500 से 1000 रुपये

अब जब पानी घर तक पहुंच रहा है, तो जल संकट कैसा? ये बात भी आपको खटक रही होगी. लेकिन इसके पीछे की वजह भी परेशान करने वाली है. असल में कुएं से बोरिंग का पानी गांव तक तो आता है, लेकिन हर घर को पानी भरने के लिए महज 10-15 मिनट का समय ही मिलता है. लोग बड़ी-बड़ी अपनी-अपनी लेजम उस पाइप से जोड़ते हैं. लेकिन इसके लिए 1600 की आबादी वाले इस गांव के हर घर को 500 रुपये महीने के चुकाने पड़ते हैं. वहीं, जिन घरों में मवेशी होते हैं, उन्हें 1000 रुपये तक देना पड़ता है.

MP water pipeline on electric pole
बिजली के खंभे पर लटके हैं पानी के पाइपलाइन (ETV Bharat)

खंबो पर तार से ज्यादा नजर आते हैं पाइपलाइन

गांव के लोगों ने बताया कि उनके पूरे जीवन इसी पानी की जद्दोजहद में गुजर गया. पहले लोग बैलगाड़ी और सिर पर पानी के बर्तन रखकर इसका बंदोबस्त करते थे और अब ये पाइपलाइन बिजली के खंबों से होते हुए घरों तक डाली गई हैं. बच्चे, बूढ़े, जवान और महिलायें सभी अपने घर में पानी का इंतजाम करने में जुटे रहते हैं. वहीं, अगर बीच में लाइट चली जाये तो इंतजार और लंबा हो जाता है.

रुपये देने ले बाद भी कई बार नहीं मिल पाता पानी

गांव की महिलायें कहती हैं कि 500 रुपये महीने की देने के बाद भी भरोसा नहीं होता कि उन्हें पानी मिल पाएगा. कई दिन ऐसे गुजर जाते हैं, जब दिन और रात अपनी बारी आने का इंतजार करना पड़ता है. अगर कुंए में पानी बचा तो मिलता है और अगर खत्म हो गया, तो उसके रिचार्ज होने तक इंतजार के सिवा कोई विकल्प नहीं होता. गांव में पानी की सरकारी कोई व्यवस्था नहीं है, इसलिए लोग कुंआ मालिक के भरोसे रहते हैं. लेकिन हर महीने, पानी के लिए दिए जाने वाले शुल्क का समय होने से 2 दिन पहले ही वह पानी बंद कर देता है. सीधे तौर पर उसका कहना होता है कि पहले एडवांस में रुपया जमा करें तो पानी मिलेगा.

Gwalior water shortage
बूंद-बूंद पानी के लिए जद्दोजहद (ETV Bharat)

मांगलिक कार्यक्रमों में भी नहीं पहुंच पाते लोग

गांव के ही एक महिला का कहना था कि यह हालात उसके लिए जीवन पर्यंत हो गए हैं. करीब 25 साल पहले मेरी शादी हुई थी, तब भी इस गांव में पानी नहीं था और आज भी हालात जस के तस है. वैसे तो गांव में सभी सुख हैं, लेकिन जीवन का सबसे बड़ा दुःख पानी का है. कई दिन तो घर के बच्चे स्नान तक नहीं कर पाते. ऐसी स्थिति में उनके पारिवारिक और रिश्तेदारों के यहां होने वाले मांगलिक कार्यक्रमो में भी लोग शामिल नहीं हो पाते.

कोई गाँव के बाहर जाता भी है, तो अपने काम से ज्यादा उसे पाने की चिंता सताती है. कोई कपास की बत्ती बनाता है, तो कोई मजदूरी करने जाता है, ताकि अपने घर की अन्य व्यवस्थाओं से पहले परिवार के लिए पानी का इंतजाम हो सके. पानी के लिए वे पैसे बचाते हैं फिर भी कई बार निराशा हाथ लगती है. विशेषकर गांव की महिलाओं के लिए पाने की जद्दोजहद उनके जीवन के लिए एक बड़ी समस्या है.

एक ग्लास पानी न पिला पाने का दुख

गांव में लगे मोबाइल टावर पर काम करने पहुंचे एक कर्मचारी ने ने बताया कि अगर कभी किसी घर से प्यास लगने पर पानी मांग लो, तो लोग मना तो नहीं करते, लेकिन उनके चेहरे उतर जाते हैं. ये पानी की समस्या इस पूरे गांव के लिए जिंदगी की जद्दोजहद बनी हुई है. वहीं, गांव का एक युवा इस बात पर शर्मिंदा था कि बाहर से आए लोगों से पीने के लिए पानी तक नहीं पूछ पा रहा था.

कुछ लोगों ने बताया कि करीब 24 साल पहले यहां पर प्रशासन की ओर से पानी के लिए पाइपलाइन बिछाई गई थी, पानी मिलना भी शुरू हुआ, लेकिन उसका लाभ भी महज 1 से 2 साल ही मिल सका. बाद में हालात जस के तस हो गए.

'जनप्रतिनिधियों के लिए सोजना सिर्फ वोट बैंक'

ग्रामीणों ने कहा कि इस समस्या को लेकर कई बार नेताओं, जनप्रतिनिधियों से शिकायत की है, पर हमारा कोई सुनने वाला नहीं है. जब चुनाव आते हैं, तो नेता लोग बड़े-बड़े वादे करते हैं, लेकिन जब चुनाव हो जाता है और वे जीत जाते हैं, तो सब भूल जाते हैं. फिर समस्या दूर करने को लेकर कोई नहीं आता. जनप्रतिनिधियों के लिए सोजना सिर्फ वोटबैंक है. पानी की ये समस्या सिर्फ सोजना गांव में ही नहीं है, बल्कि इसी तरह के जल संकट रामपुरा, बासोड़ी, पटाई, दौरार समेत कई गांव में है.