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पाकिस्तान से आईं सरला ने हुरमुचो कशीदाकारी बचाने लगाई जिंदगी, 5 पीढ़ियों की विरासत को धागों में समेटा

पाकिस्तान के सिंध से ग्वालियर आकर बसे परिवार में 5वीं पीढ़ी की हैं सरला सोनेजा. हुरमुचो कशीदाकारी को बचाने 1975 से लगातार कोशिश. मिल चुका है राज्य स्तरीय सम्मान. पीयूष श्रीवास्तव की रिपोर्ट.

SARLA SONEJA HURMUCHO EMBROIDERY
सिंध से आईं सरला 5 पीढ़ियों से धागों में संजोए हैं विरासत (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Madhya Pradesh Team

Published : June 27, 2026 at 10:55 PM IST

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Updated : June 28, 2026 at 9:26 PM IST

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ग्वालियर: अखंड भारत के सिंध से ग्वालियर आए एक परिवार की विरासत जिसने देशभर में अपनी पहचान बनाई, एक दुर्लभ बुनाई की कला हुरमुचो कशीदाकारी, जिसे 75 साल की उम्र में भी सरला सोनेजा बचाने का प्रयास कर रही हैं. अखंड भारत की ये कला विभाजन के दौरान सरला सोनेजा के परिवार के साथ ग्वालियर आई थी.

सरला सोनेजा अपने परिवार में मां और नानी से सीखने वाली 5वीं पीढ़ी है. जिन्हें परिवार के एक रिवाज ने सोचने पर मजबूर कर दिया कि अब अगर इसे नहीं बचाया तो पारंपरिक कला खत्म हो जाएगी और यहीं से भारत में कशीदाकारी की एक नई लौ जली.

हुरमुचो कशीदाकारी को बचाने जिंदगी की समर्पित (ETV Bharat)

पाकिस्तान के सिंध प्रांत से आई हुरमुचो कशीदाकारी

ग्वालियर के दौलतगंज बाजार की एक पतली सी गली में एक पुराना मकान है. एक लकड़ी का दरवाजा जिसके ऊपर एक पुराना लकड़ी का बोर्ड टंगा है, लिखा है नारी प्रशिक्षण केंद्र. दरवाजे के पीछे एक छोटा सा कमरा है, एक मेज और कुछ कुर्सियां रखी हैं, एक शोकेस है, जिसमें कुछ ट्रॉफियां कुछ फोटो फ्रेम हैं.

HURMUCHO EMBROIDERY IN INDIA
सरला सोनेजा कई मंचों पर हुईं सम्मानित (ETV Bharat)

एक पर्दे पर काले रंग का कपड़ा टंगा है, इस कपड़े पर धागों से बड़ी ही सुंदर कलाकारी है लेकिन ये आम कलाकारी नहीं बल्कि वर्षों पुरानी धागों की बुनाई. यह एक ऐसी कला है जो अखंड भारत के समय पाकिस्तान के सिंध प्रांत में देखने को मिलती थी. इसे हुरमुचो कशीदाकारी कहते हैं.

सिंध प्रांत से ग्वालियर आकर बसा था परिवार

कशीदाकारी कपड़े पर धागों की एक ऐसी कला जो देखने में बेहद खूबसूरत होती है. ये दुर्लभ कला ग्वालियर या कहें भारत में सहेजने सिखाने का काम कर रही हैं सरला सोनेजा. 75 साल की उम्र में भी ये बुजुर्ग इस विरासत को बचाने में लगी हैं. ये हुरमुचो कशीदाकारी अखंड भारत के विभाजन के दौरान सरला सोनेजा के परिवार के साथ ही भारत आई थी.

GWALIOR SARLA SONEJA KASHIDAKARI
2100 वर्ष पुरानी कला है हुरमुचो कशीदाकारी (ETV Bharat GFX)

यह परिवार आजादी और विभाजन से पहले सिंध प्रांत के 'नए सख्खर' (वर्तमान पाकिस्तान में) में रहा करता था. नदी किनारे बसा उस दौर का एक खूबसूरत नगर जहां कृषक समुदायों की गृहणियां फसल कटाई के बाद खाली समय में कपड़ों पर, चादरों पर धागे से सजावट (कशीदाकारी) करती थीं.

5 पीढ़ियों से कशीदाकारी को संभाल रहीं सरला सोनेजा

पाकिस्तान अलगाव के बाद भारत में सिंध प्रांत के सीमावर्ती परिवारों के साथ कशीदाकारी भी भारत में आ गई. विभाजन के बाद सरला सोनेजा का परिवार ग्वालियर आकर बसा. यहीं एक बार फिर हुरमुचो कशीदाकारी के अस्तित्व को बचाने का प्रयास शुरू हुआ. ईटीवी भारत से बातचीत करते हुए सरला सोनेजा ने बताया, "उन्होंने ये कशीदाकारी उनकी मां और नानी से सीखी और उन्होंने अपनी मां से. उनके परिवार में कशीदाकारी 5 पीढ़ियों से चली आ रही है और अब वे दूसरों को भी सिखा रही हैं."

SARLA SONEJA SAVE EMBROIDERY ART
पाकिस्तान से आईं सरला सोनेजा ने हुरमुचो कशीदाकारी बचाने लगाई जिंदगी (ETV Bharat GFX)

वैवाहिक परंपरा की कशीदाकारी को खत्म होने से बचाया

सरला सोनेजा बताती हैं, "ग्वालियर आने के बाद जब उनका जन्म हुआ तो बचपन में उनकी मां, नानी और मौसी उन्हें कशीदाकारी सिखाती थीं. लेकिन ये ऐसी कला थी जो लगातार प्रैक्टिस में ना रहे तो भूल जाते हैं. इस कला का सिंध में एक महत्वपूर्ण स्थान है जब किसी की शादी होती है तो दूल्हे को एक सफेद कपड़ा सिर पर पहनाया जाता है, जिस पर सात रंग के धागों की कशीदाकारी होती है और इसे 7 सुहागिन बनाती हैं."

GWALIOR SARLA SONEJA KASHIDAKARI
5 पीढ़ियों से कशीदाकारी को संभाल रहीं सरला सोनेजा (ETV Bharat)

उन्होंने बताया, "दूल्हा उस कपड़े को सिर पर डालने के बाद ही बाहर आता और अन्य रस्में पूरी कर बारात के लिए बढ़ता था. ये एक परंपरा है लेकिन ग्वालियर में उनका इकलौता सिंधी कृषक समुदाय का परिवार था. मां के अलावा किसी और को कशीदाकारी नहीं आती थी. जब उनके भाई की शादी का समय आया तो पूरे ग्वालियर में कशीदाकारी करने वाला कोई नहीं मिला और यहीं से मेरे मन में यह बात घर कर गई कि अगर अपनी परंपरा को बचाने के लिए कशीदाकारी को आगे नहीं बढ़ाया तो ये खत्म हो जाएगी."

HURMUCHO EMBROIDERY SINDH PRANT
सिंध प्रांत से आई हुरमुचो कशीदाकारी (ETV Bharat)

50 साल पहले शुरू किया था कशीदाकारी सिखाना, राज्य स्तरीय सम्मान भी मिला

सरला सोनेजा बताती हैं, "अपनी कॉलेज की पढ़ाई के दौरान घरवालों को मनाकर किसी तरह घर के ही एक कमरे में 1975 में नारी प्रशिक्षण केंद्र की शुरुआत की. आसपास की जो लड़कियां और महिलाएं उनसे सीखना चाहती थीं उन्हें पेंटिंग बुनाई और कशीदाकारी सिखाना शुरू किया. धीरे धीरे सीखने वालों की संख्या बढ़ती गई और अब तक वे 10 हजार से ज्यादा महिलाओं और बेटियों को प्रशिक्षित कर चुकी हैं."

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पाकिस्तान के सिंध प्रांत से आई हुरमुचो कशीदाकारी (ETV Bharat)

हुरमुचो कशीदाकारी जैसी दुर्लभ कलाकारी को आगे बढ़ाने के लिए मध्य प्रदेश सरकार ने भी 1998 में तत्कालीन उद्योगमंत्री नरेन्द्र नाहटा ने राज्य स्तरीय सम्मान से सम्मानित किया था. इसके बाद सरकारी नुमाइंदों ने इस कला को सरला के जरिए बढ़ाने का काम किया. इसके बाद उन्हें कई बार अलग-अलग मंचों पर सम्मानित किया जा चुका है. सरला सोनेजा ने इस कला को बचाने के लिए शादी नहीं की.

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हुरमुचो कशीदाकारी को बचाने मिला राज्य स्तरीय सम्मान (ETV Bharat)

'धागे की आम कलाकारी से बिलकुल हटकर है हुरमुचो कशीदाकारी'

कशीदाकारी की बात करें तो सरला सोनेजा बताती हैं, "ये धागे से सामान्य बुनाई वाली कलाकारी से बेहद अलग है. इसे दो हिस्सों में बनाया जाता है. पहला कच्चा टांका और फिर पक्का टांका. इसकी विशेषता यह है कि इसमें डिजाइन का न तो कपड़े पर पहले कोई रेखांकन किया जाता है और न ही कोई ट्रेसिंग होती है. इसके डिजाइन ज्यामिति (ज्योमेट्रिकल) आकारों पर आधारित होते हैं. जिन्हें एक ही प्रकार के टांके से बनाया जाता है. इसे ही हुरमुचो टांका कहा जाता है. हर टांका दूसरे के अंदर से जाता है.

GWALIOR SARLA SONEJA KASHIDAKARI
धागे की आम कलाकारी से बिलकुल हटकर है हुरमुचो कशीदाकारी (ETV Bharat)

एक खास बात यह भी है की इसमें डिजाइन पारंपरिक कलाकारी की तरह कपड़े के दोनों और नहीं बल्कि सिर्फ कपड़े के ऊपर उभरता है. पीछे के हिस्से में सिर्फ ट्रेसिंग जैसे बॉर्डर धागे दिखते हैं." सरला सोनेजा कहती हैं, "आम धागों की डिजाइन की अपेक्षा हुरमुचो कशीदाकारी धुलने पर खराब नहीं होती. इसे कपड़े से काट कर दूसरी जगह भी उपयोग किया जा सकता है."

'मूल रूप से सजावटी कपड़ों पर की जाती थी सिंधी कशीदाकारी'

सरला सोनेजा बताती हैं, "पारंपारिक रूप से हुरमुचो कशीदाकारी वस्त्रों की बजाय घर की सजावट और दैनिक उपयोग में आने वाले कपड़ो में अधिक किया जाता था. चादरों, गिलाफों, रुमाल, बच्चों के बिछौने, थालापोश थैले आदि इस कशीदे से सजाए जाते थे. बाद में बच्चों के कपड़े, पेटीकोट, ओढनियां आदि पर भी यह कशीदा किया जाने लगा. आजकल सभी प्रकार के वस्त्रों पर यह कशीदा किया जाने लगा है."

GWALIOR SARLA SONEJA KASHIDAKARI
50 साल पहले शुरू किया था कशीदाकारी सिखाना (ETV Bharat)

बरई गांव में मिल रहा 'सिंध प्रांत' जैसा अहसास

सरला सोनेजा इन दिनों ग्वालियर में सिंध नदी के किनारे बसे बरई गांव की 30 महिलाओं को कशीदाकारी सिखाने जाती हैं. ये गांव उन्हें उनकी मूल मिट्टी सिंध प्रांत का अहसास दिलाता है. बरई गांव भी सिंध नदी के किनारे बसा है, यहीं के कृषक परिवारों की गृहणियों और लड़कियों को वे कशीदाकारी सिखा रही हैं. वे मानती हैं कि, इस कदम से वे अपनी जड़ों को उस कशीदाकारी के साथ महसूस कर पा रही हैं.

Last Updated : June 28, 2026 at 9:26 PM IST