ग्वालियर में अकबर का एक और रत्न, लेकिन गुमनाम, बेटे सलीम ने कराई थी अबुल फजल की हत्या
तानसेन ही नहीं अकबर के एक और नवरत्न से जुड़ा ग्वालियर का इतिहास, आंतरी में है अकबर के दरबार के विद्वान शेख़ अबुल फ़ज़ल की मज़ार. पीयूष श्रीवास्तव की रिपोर्ट.

By ETV Bharat Madhya Pradesh Team
Published : June 1, 2026 at 8:23 PM IST
ग्वालियर: संगीत नगरी ग्वालियर की पहचान तानसेन से होती है, वे तानसेन जिन्हें संगीत सम्राट कहा जाता है. उन्हें अकबर के नवरत्नों में गिना जाता था, लेकिन क्या आप जानते हैं ग्वालियर का इतिहास इन्हीं नवरत्नों में शुमार एक और शख़्सियत से भी जुड़ा है. जो उस दौर के महाज्ञानी माने जाते थे और वह शख्श थे, शेख अबुल फ़ज़ल. जिन्होंने अपने ज्ञान, चातुर्य और लेखनी के दम पर अकबर के दरबार में अपनी जगह बनाई. एक बेहतरीन रणनीतिकार होने की वजह से उनकी जगह अकबर के ख़ास नुमाइंदों में हुआ करती थी.
ग्वालियर के पास आंतरी में अबुल फजल की मजार
ग्वालियर के करीब 34 किलोमीटर दूर स्थित है आंतरी गांव... यहां कस्बे के बीचों-बीच बनी है शेख़ अबुल फ़ज़ल की मजार, ये वही अबुल फ़ज़ल हैं, जिन्हें बादशाह अकबर ने अपने नवरत्नों में जगह थी, लेकिन धीरे धीरे इतिहास ने जैसे भुला दिया. अपने दौर के शिक्षा विद्वान रहे अबुल फ़ज़ल ने अकबर के दरबार में कई खिताब हासिल किए. एक बहतरीन रणनीतिकार बनकर उन्होंने अकबर के बादशाहत को बढ़ाया, लेकिन अकबर के बेटे सलीम ने ही उनकी हत्या आंतरी में करवा दी थी. उसके बाद उन्हें इसी क़स्बे में दफ़नाया गया था.

15 साल में विद्वान, 20 की उम्र में शिक्षक बन गए थे अबुल फ़ज़ल
इतिहास के जानकार और रिटायर्ड पुरातत्व अधिकारी लाल बहादुर सिंह सोमवंशी बताते हैं कि, "अबुल फ़ज़ल असल में 1551 ईसवी में जन्मे थे. उनके पिता शेख़ मुबारक अल्लामी उस दौर के प्रसिद्ध विद्वान थे और अपने पिता से ज्ञान सुर उदारता उन्हें विरासत में मिली, महज 15 साल की उम्र में शेख़ अबुल फ़ज़ल अल्लामी ने तत्कालीन शिक्षा पद्दति की सभी शाखाओं में महारत हासिल कर पढ़ाई पूरी कर ली और 20 की उम्र में एक शिक्षाविद के रूप में अपनी पहचान बना ली थी."
अकबर ने उलेमा वर्ग के अत्याचारों से की थी अल्लामी परिवार की रक्षा
सोमवंशी कहते हैं कि, "शेख अबुल फ़ज़ल और उनका परिवार सूफी विचारधारा को मानता था. ऐसे में कट्टर इस्लामी विचारधारा वाले उलेमा वर्ग ने अल्लामी परिवार पर अत्याचार किए, करीब 20 वर्षों तक आगरा में अत्याचार सहने के बाद उनके परिवार ने गुजरात जाने का फैसला लिया, लेकिन इसी बीच मुग़ल बादशाह अकबर की नजर उनके परिवार पड़ी और उनके परिवार को सुरक्षा प्रदान की. इसी दौर में अकबर ने उलेमा वर्ग का प्रभाव खत्म करने के लिए इबादख़ाने बनवाये थे.

अपनी कलम से बनायी थी बादशाह अकबर के दरबार में जगह
साल 1574 ईसवी में अल्लामी परिवार के दो बेटो अबुल फ़ज़ल और उनके भाई फ़ैज़ी को दरबार में अकबर के सामने जाने का मौक़ा मिला. जहां शेख़ अबुल फ़ज़ल अल्लामी ने बादशाह अकबर की जीत पर एक शेर इबादतखाने में बादशाह के सामने पेश करने की इच्छा ज़ाहिर की और अकबर ने इसकी इजाज़त दी. वो शेर सुनने के बाद सभी दरबारी और खुद अकबर उनसे काफी प्रभावित हुआ. उन्हें अपने दरबार में शामिल किया. इसके बाद अबुल फजल और फैजी की शाही दरबार में नियमित रूप से मान बढ़ता गया. यहां तक कि अबुल फजल की निष्ठा से संतुष्ट होकर अकबर ने शासन के 45वें वर्ष में उसे 5000 का मनसब प्रदान किया.
अकबर के करीबी हो गए थे अबुल फ़ज़ल
धीरे धीरे शेख़ अबुल फ़ज़ल पर अकबर का भरोसा बढ़ता गया और वे दरबार के अहम फ़ैसले उनसे सलाह मशविरा कर करने लगे. अबुल फ़ज़ल एक विद्वान थे और रणनीति बनाने में माहिर थे. उनकी कूटनीति के बल पर अकबर ने असीरगढ़ दुर्ग पर फ़तह हासिल की, इसी बात से प्रभावित अकबर ने खानदेश की सुरक्षा के साथ असीरगढ़ विजय का भार भी अबुल फजल को सौंप दिया था. लगातार दरबार में शेख़ का बढ़ता प्रभाव अकबर के राजकुमार सलीम को परेशान करने लगा. अबुल फ़ज़ल सलीम की आंखों में खटकने लगे.
सलीम ने करायी थी शेख़ अबुल फ़ज़ल की हत्या
सलीम के आसपास के लोग उसे भड़काने लगे, जिसकी वजह से अबुल फजल के लिए उसकी बढ़ती नफ़रत ने बग़ावत को जन्म दिया. आखिर में उसने षड्यंत्र के तहत शेख़ अबुल फ़ज़ल की हत्या करवा दी. ये हत्या भी ओरछा रियासत के राजा बीर सिंह बुंदेला से करायी थी. इतिहासकार लाल बहादुर बताते हैं कि "यह पूरा घटनाक्रम साल 1602 के आस पास का है. अहमदनगर की निज़ामशाही में मुगलों का आपसी संघर्ष चल रहा था. जिसे सुलझाने के लिए अखबार ने यह ज़िम्मेदारी अबुल फ़ज़ल को दी और उन्हें दक्कन भेजा. साथ ही शेख अबुल फ़ज़ल को यह भी फरमान दिया कि वे लौटते में सलीम से मिले और उन्हें किसी तरह मना कर वापस आगरा साथ ले आए.

सलीम ने ओरछा का राजा बनने का दिया था लालच
यह बात जब सलीम को पता चली तो उसने एक अबुल फ़ज़ल की हत्या का षड्यंत्र रचाया और उसमें ओरछा रियासत के वीरसिंह देव बुन्देला को इसमें शामिल किया, सलीम में वीरसिंह देव बुंदेला को लालच दिया कि अगर वह अबुल फ़ज़ल का सिर लेकर आएगा तो उसे वहां का राजा बना देंगे. इस बीच अचानक अबुल फ़ज़ल को तुरंत आगरा बुलाया, इधर अबुल फ़ज़ल के गुप्तचरों को सलीम के षड्यंत्र की जानकारी भी लगी और उन्होंने उन्हें समझाने का प्रयास भी किया कि वे आगरा के लिए चांदी घाटी के रास्ते जाएं, लेकिन वे नहीं माने और ग्वालियर के रास्ते जाने का फैसला किया. जब अबुल फ़ज़ल दक्षिण से लौटकर आ रहे थे तो ग्वालियर रियासत के आंतरी के पास 12 अगस्त 1602 के दिन बीर सिंह बुन्देला ने उनकी सैन्य टुकड़ी पर हमला कर दिया और इस हमले में शेख अबुल फ़ज़ल की हत्या कर दी.
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इलाहबाद भेजा सिर, धड़ आंतरी में दफ़नाया
शर्त के अनुसार वीर सिंह देव बुंदेला ने अबुल फ़ज़ल का सिर सलीम के पास इलाहबाद भेज दिया और उनका धड़ आंतरी में ही दफन कर दिया. बाद में पुरातत्व विभाग में इस जगह को इतिहास और इतिहास में शेख़ अबुल फ़ज़ल की भूमिका के तहत संरक्षित किया. इसे हेरिटेज साइट घोषित किया गया. कुछ वर्षों तक इसकी देखरेख भी अच्छे से हुई, लेकिन समय के साथ-साथ इस ओर से ध्यान हटता गया. आज आंतरी में बनी शेख अबुल फ़ज़ल का मक़बरा एक चौकीदार के भरोसे है, लेकिन यह ऐतिहासिक धरोहर अब पर्यटकों की नज़र से दूर हो चुका है."

