शास्त्रीय संगीत हमारी विरासत, ईटीवी भारत से बोले पद्मश्री उस्ताद वासिफुद्दीन डागर
पद्मश्री उस्ताद वासिफुद्दीन डागर से ईटीवी भारत की खास बातचीत, बोले-अब दूरदर्शन और ऑल इंडिया रेडियो पर नहीं आते प्रोग्राम, शास्त्रीय संगीत पर रखे विचार.

By ETV Bharat Madhya Pradesh Team
Published : February 19, 2026 at 7:31 PM IST
ग्वालियर: राजा मान सिंह तोमर संगीत एवं कला विश्वविद्यालय में आयोजित हो रहे बैजू बावरा महोत्सव में शामिल हुए सुप्रसिद्ध ध्रुपद गायक पद्मश्री उस्ताद वासिफ़ुद्दीन डागर का कहना है आज शास्त्रीय संगीत महज कवरेज का माध्यम रह गया है. ये अच्छा नहीं है, इसे बचाने की जरूरत है, हर चीज बिकने के लिए नहीं होती. ऐसे ही कई बातें उन्होंने ईटीवी भारत से की इस साक्षात्कार में...
मध्य प्रदेश की संगीत नगरी ग्वालियर में स्थित राजा मानसिंह तोमर म्यूजिक एंड आर्ट्स यूनिवर्सिटी में ध्रुपद और बैजूबावरा को सम्मान और याद करने एक तीन दिवसीय बैजूबावरा महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है. इस कार्यक्रम में ध्रुपद को लेकर व्याख्यान और संगीत प्रस्तुतियां भी दी जा रही है. ये प्रस्तुतियां शास्त्रीय संगीत जगत के प्रसिद्ध पद्मश्री सम्मानित हस्तियां दे रही हैं. इस बीच भारतीय क्लासिकल सिंगर पद्मश्री उस्ताद वासिफुद्दीन डागर ने ईटीवी भारत संवाददाता पीयूष श्रीवास्तव से इंटरव्यू में अहम बातचीत की.
सवाल- आप शास्त्रीय संगीत से जुड़े एक बड़े घराने से हैं, ध्रुपद में रुचि कैसे आई?
जवाब- मेरे घराने में शुरू से संगीत है, मैं खुद मेरे पिता की 20वीं पीढ़ी का बाशिंदा हूं, दादा परदारा संगीत से जुड़े रहे हैं. ध्रुपद संगीत की प्राचीन शैली है, जो पुराणों से जुड़ी है, चारों वेदों में से एक सामवेद है, जिसमें ऋचाओं का वर्णन होता है. उसी से ध्रुपद की उत्पत्ति हुई है. उसमें आगे बढ़ते-बढ़ते इसमें राग रागिनियों को आधारित किया है. इसमें 52 सिद्धांत हैं, 12 मूल सिद्धांत हैं. जिसके ऊपर यह आधारित है.
सवाल- देखने में आता है कि, अब अन्य देशों की तरह हमारे यहां भी शास्त्रीय संगीत से लोगों का ध्यान हटने लगा है, कहां कमी देखते हैं और इसकी कितनी जरूरत मानते हैं?
जवाब- इसकी बहुत जरूरत है, उदाहरण के लिए हम ये बोलेंगे, "हम अपने दौर की खुशियां खरीदते कैसे? हमारी जेब में पिछली सदी के सिक्के हैं" यह एक बात है और इसी बात को सकारात्मक पंक्तियों में कर दें तो, "हम अपनी दौर की खुशियां खरीदेंगे ऐसे, अपनी पिछली सदी के सिक्कों से.." यह भी अपनी जगह पर है, हमें यह चाहिए कि शास्त्रीय संगीत को ज्यादा से ज्यादा लोगों को प्रस्तुत करें, बहुत अच्छे तौर से.

आज जैसे यूट्यूब में आ रहा है, लेकिन और जो भारत के प्राइवेट चैनल्स हैं, उनको भी भारत का शास्त्रीय संगीत दिखाना चाहिए, एक हमारे शास्त्रीय संगीत में, ध्रुपद है, ख्याल है, ठुमरी है और क्या-क्या चीजें हैं. कुछ चीजों को बॉलीवुड में कुछ-कुछ अंश ले लेते हैं, फिर क्या, फिर उनका मन होता है कि हम इसको दूसरी तरीके से प्रस्तुतीकरण करें. एक चीज को शुद्ध तरीके से अगर प्रस्तुत करेंगे, तो जरूर असर करेगा.
'लोग सोचते है शास्त्रीय संगीत में रस नहीं'
उस्ताद वासिफुद्दीन डागर अपनी बात आगे बढ़ते हुए कहते हैं कि, एक संगीत में कोई बच्चे को कितनी देर तक बिठा सकते हैं, तो ये लोग सोचते हैं कि बड़ा मुश्किल हो जाता है, एक बार पांच मिनट मुश्किल से बिठा लेंगे, एक घंटा मुश्किल से बिठाएंगे, लेकिन लोग ये क्यों सोचते हैं कि, 20 साल, 30 साल, 20 पीढ़ियों तक एक ऐसी विधा में हमने लगा दी है, जिसके अंदर रस ही नहीं था, ये क्यों सोचते हैं कि इसके अंदर रस नहीं है? बिल्कुल इसमें रस है, थोड़ा आगे बढ़ कर सुनेंगे तो जरूर आनंद आएगा.
ये पांच मिनट और छह मिनट का तो नहीं है, लेकिन उसके अंदर और समय लगाना पड़ेगा, सुनने वाले को जरूर अच्छा लगेगा. कोई ऐसी अनूठी चीज नहीं है, इंसानों के करने की चीज है, इंसान कर रहे हैं.
सवाल- आज का युवा बॉलीवुड या वेटरन म्यूजिक की ओर मुड़ता है तो कैसा लगता है? क्योंकि कई ऐसे संगीत घराने हैं, जो लगातार शास्त्रीय संगीत को आगे बढ़ाने के प्रयास कर रहे हैं, लेकिन कहीं ना कहीं कुछ कमियां हैं, जो दिखाई देती हैं.
जवाब- नहीं, इंसान तो गलतियों का पुतला है, कमियों का पुतला है, उसमें तो कोई शक नहीं है. लेकिन, कमियां ऐसी नहीं हैं, वो तो कितनी ऐसी गलत चीजें चलती रहती हैं और फिर उसको सब सुनते रहते हैं, उसको बढ़ाने में लग जाते हैं, लेकिन शास्त्रीय संगीत मजाक उड़ाने की चीज तो नहीं है. हम बिल्कुल खुश नहीं होंगे कि हमारे संगीत का मजाक उड़ाया जाए. हम इससे तो कभी खुश नहीं हो सकते, लेकिन, आप सुनने की थोड़ी सी क्षमता तो रखिए, थोड़ा सा कोशिश तो करिए.

आगे आएंगे तो पक्का इसके अंदर आपको आनंद आएगा. ऐसा तो है नहीं, हम नीरस चीज को 500 साल तक जबरदस्ती चलाते हुए आ रहे हैं, कुछ तो आनंद आ रहा है ना, अब वो छोटी-छोटी खुशियां अपनी जगह पर है, लेकिन एक, एक हमको ये सोचना है कि एक बड़े आधार पर एक ऐसी चीज करें कि जिसमें सबको तृप्ति मिले, सबको खुशी मिले.
आखिरी सवाल- एक समय था जब टीवी और रेडियो पर शास्त्रीय संगीत से जुड़े कार्यक्रम आते थे, भारतीय पारंपरिक संगीत देखने और सुनने को मिलता था. लेकिन, एक लंबे समय से वो चीजें अब धीरे-धीरे कम होती जा रही है.
जवाब- ये आपने बहुत अच्छा सवाल किया. ये सिर्फ दूरदर्शन का ही नहीं रह जाता है कि वो शास्त्रीय संगीत दिखाएं, अन्य प्राइवेट चैनल्स को भी दिखाना चाहिए. वहीं प्रसार भारती जब से थोड़ा और एक्शन में आई है, हमारे (शास्त्रीय संगीत) रेडियो के प्रोग्राम्स भी कम हो गए हैं, दूरदर्शन के प्रोग्राम भी कम हो गए हैं, वो एक कवरेज का माध्यम रह गया है, लेकिन पहले बहुत कार्यक्रम हुआ करते थे, नृत्य के कार्यक्रम होते थे, जिसमें क्लासिकल नृत्य दिखता था. शास्त्रीय संगीत के, उपशास्त्रीय संगीत के कार्यक्रम होते थे, लेकिन, आपको थोड़ा स्थान तो देना पड़ेगा ना इन सब चीजों को.
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पद्मश्री उस्ताद वासिफुद्दीन डागर कहते हैं कि, "मेरा आग्रह है, कि ऑल इंडिया रेडियो में या दूरदर्शन में पहले जितने प्रोग्राम हुआ करते थे, उतने तो करिए. आप उसको बढ़ा तो नहीं रहे, आप घटाए जा रहे हैं, ये तो सबको देखना पड़ेगा और सरकार सब कर रही है, मेरे ख्याल से सरकार को थोड़ा सा और हमारे लिए कुछ कहना और करना चाहिए, जिससे हम कलाकार शास्त्रीय संगीत, शास्त्रीय नृत्य या जो शास्त्रीय ड्रामा है, उसका अच्छी तरीके से प्रसार-प्रचार कर सकें.
हर चीज बिकने के लिए नहीं होती है. अब वो कहते हैं कि अगर बिक नहीं रहा है, तो उसको खत्म कर दो. ये क्या मतलब है भाई? हर चीज बिकाऊ नहीं है, तो जो आपका आधार है, बहुत सुंदर चीजें हैं, उसके लिए परिश्रम चाहिए. आपको कुछ ना कुछ देना पड़ता है. आपको अपना समय खून पसीना देना पड़ता है, तभी जाकर उसका महत्व बन पाता है."

