बेकार चीजों से बना बड़ा समाधान: अखरोट के छिलकों से साफ होगा गंदा पानी, DU छात्र ने किया इनोवेशन
बायोचार एक ऐसा पदार्थ होता है, जो अपने अंदर गंदगी और जहरीले तत्वों को सोखने की क्षमता रखता है.


Published : April 22, 2026 at 3:51 PM IST
नई दिल्ली: आज के समय में दो बड़ी समस्याएं एक कचरे का ढेर और दूसरा पानी का प्रदूषण तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन अगर इन दोनों समस्याओं का हल एक साथ निकल आए तो यह किसी चमत्कार से कम नहीं होगा. दिल्ली विश्वविद्यालय के गार्गी कॉलेज की छात्रा श्रीजा श्रीवास्तव ने कुछ ऐसा ही कर दिखाया है. उन्होंने यह साबित करने की कोशिश की है कि जिन चीजों को हम बेकार समझकर फेंक देते हैं, उन्हीं से गंदे पानी को साफ किया जा सकता है.
श्रीजा श्रीवास्तव ने कहा कि हम रोजाना घरों में फल खाते हैं और उनके छिलकों को कचरे में फेंक देते हैं. अखरोट, केला, संतरा या नारियल इन सबके छिलके आमतौर पर किसी काम के नहीं माने जाते, लेकिन श्रीजा ने इन बेकार चीजों को एक नए नजरिए से देखा. उन्होंने इन छिलकों को इकट्ठा करके एक ऐसी प्रक्रिया से गुजारा, जिससे यह “बायोचार” में बदल गए. बायोचार एक ऐसा पदार्थ होता है, जो अपने अंदर गंदगी और जहरीले तत्वों को सोखने की क्षमता रखता है. यानी जो चीज पहले कचरा थी, वही अब सफाई का जरिया बन गई.
कैसे तैयार होता है बायोचार: श्रीजा ने बताया कि बायोचार प्रक्रिया में सबसे पहले छिलकों को अच्छी तरह सुखाया जाता है. इसके बाद इन्हें एक खास मशीन मफल फर्नेस में गर्म किया जाता है. उन्होंने बताया कि इस मशीन की खासियत यह होती है कि इसमें ऑक्सीजन बहुत कम होती है, जिससे छिलके जलते नहीं बल्कि धीरे-धीरे एक कार्बनयुक्त पदार्थ में बदल जाते हैं. इसके बाद इस बायोचार को और ज्यादा असरदार बनाने के लिए “एक्टिवेशन” किया जाता है. इसके लिए एसिड या बेस का इस्तेमाल किया जाता है, जिससे इसकी सतह पर छोटे-छोटे छिद्र बन जाते हैं. यही छिद्र पानी में मौजूद गंदगी को पकड़ने में मदद करते हैं.
पानी को कैसे करता है साफ: श्रीजा ने बताया कि जब इस तैयार बायोचार को गंदे पानी में डाला जाता है तो यह पानी में मौजूद प्रदूषकों को सोखने लगता है. उन्होंने बताया कि खासकर उद्योगों से निकलने वाले जहरीले रंग, जो पानी को बहुत नुकसान पहुंचाते हैं, उन्हें यह आसानी से हटा सकता है. श्रीजा ने बताया कि जैसे मेथिलीन ब्लू और मिथाइल ऑरेंज जैसे डाई, जो टेक्सटाइल और मेडिकल इंडस्ट्री में इस्तेमाल होते हैं, पानी में मिलकर उसे जहरीला बना देते हैं. उन्होंने बताया कि प्रयोग में देखा गया कि जब बायोचार को ऐसे पानी में डाला गया, तो कुछ ही समय में पानी साफ होने लगा. उन्होंने अपने प्रयोग में पाया कि सिर्फ 20 मिलीग्राम बायोचार डालने पर 40 मिनट के अंदर गंदगी लगभग पूरी तरह हट गई.
सस्ता, आसान और हर जगह उपयोगी: इस रिसर्च की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह बहुत ही सस्ता और आसान तरीका है. इसमें किसी महंगे उपकरण या जटिल तकनीक की जरूरत नहीं है. जिन चीजों को हम बेकार समझकर फेंक देते हैं, वही इसका मुख्य साधन हैं. इसका मतलब यह है कि इसे छोटे स्तर पर भी आसानी से अपनाया जा सकता है. गांवों, छोटे शहरों या छोटे उद्योगों में जहां बड़े वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट लगाना संभव नहीं होता, वहां यह तकनीक बहुत काम आ सकती है.
पर्यावरण को दोहरा फायदा: यह तरीका सिर्फ पानी को साफ करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पर्यावरण के लिए दोहरा लाभ देता है. पहला यह कचरे को कम करता है, क्योंकि छिलकों का उपयोग हो रहा है. दूसरा यह पानी को साफ करता है, जिससे प्रदूषण घटता है. इस तरह यह एक टिकाऊ समाधान बनकर सामने आता है, जो भविष्य के लिए बहुत जरूरी है.
भविष्य में क्या है संभावना: अगर इस तकनीक पर और रिसर्च किया जाए और इसे बड़े स्तर पर लागू किया जाए तो यह जल प्रदूषण की समस्या को काफी हद तक कम कर सकती है. खासकर उन जगहों पर जहां फैक्ट्रियों का गंदा पानी सीधे नदियों में छोड़ा जाता है, वहां यह एक सस्ता और असरदार उपाय बन सकता है. इसके अलावा, यह तकनीक भारी धातुओं जैसे अन्य खतरनाक तत्वों को हटाने में भी मदद कर सकती है, जिससे पानी और भी सुरक्षित हो सकेगा.
श्रीजा श्रीवास्तव अपने इस प्रोजेक्ट को अंडरग्रैजुएट रिसर्च एंड एंटरप्रेन्योरशिप एग्जिबिशन 2026 (UGRE 2026) में प्रस्तुत कर रही हैं. यह आयोजन दिल्ली विश्वविद्यालय में पहली बार हो रहा है, जिसमें 420 से ज्यादा छात्र भाग ले रहे हैं. इस मंच पर छात्र अपने रिसर्च, प्रोजेक्ट और बिजनेस आइडियाज को प्रस्तुत कर रहे हैं, जिससे नए इनोवेशन को बढ़ावा मिल रहा है.
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