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राज्यपाल बागडे बोले- औपनिवेशिक शिक्षा नीति से बढ़ीं विसंगतियां, समाधान भारतीय ज्ञान परंपरा में

उदयपुर में राज्यपाल हरिभाऊ बागडे ने भूपाल नोबल्स संस्थान के द्वितीय दीक्षांत समारोह में उपाधियां बांटी.

Governor Haribhau Bagde
दीक्षांत समारोह में राज्यपाल डिग्री देते हुए (ETV Bharat Udaipur)
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By ETV Bharat Rajasthan Team

Published : January 7, 2026 at 7:24 PM IST

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उदयपुर: राज्यपाल हरिभाऊ बागडे ने कहा है कि औपनिवेशिक नीतियों के कारण देश शिक्षा और स्थानीय उद्योगों से दूर हुआ, जिससे समाज में गरीबी और अनेक विसंगतियां बढ़ीं. इन चुनौतियों का स्थायी समाधान केवल शिक्षा के माध्यम से ही संभव है. भारतीय ज्ञान परंपरा के माध्यम से भारतीय शिक्षा व्यवस्था की उत्कृष्टता को पुनः स्थापित किया जा सकता है. यह विचार उन्होंने बुधवार को भूपाल नोबल्स संस्थान के द्वितीय दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में व्यक्त किए.

उन्होंने 99 पीएचडी धारकों को उपाधियां प्रदान की तथा स्नातक एवं स्नातकोत्तर स्तर के 47 उत्कृष्ट विद्यार्थियों को स्वर्ण पदक से सम्मानित किया. घने कोहरे के कारण जयपुर एवं उदयपुर एयरपोर्ट पर उड़ानों में विलंब होने से वे लगभग दो घंटे देरी से समारोह स्थल पहुंचे थे.

राज्यपाल बागडे ने जनजातीय बाहुल्य जिलों में विद्यार्थियों की शैक्षिक स्थिति पर चिंता जताते हुए कहा कि पिछड़े, घुमंतू और जनजातीय वर्ग के विद्यार्थियों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा को सुदृढ़ करना आवश्यक है. उन्होंने कहा कि भारत को विकसित राष्ट्र बनाने और उसके स्वर्णिम गौरव को पुनः स्थापित करने में विश्वविद्यालयों की निर्णायक भूमिका है.

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नई शिक्षा नीति 2020 सकारात्मक पहल: उन्होंने 1835 की मैकाले शिक्षा नीति की आलोचना करते हुए कहा कि इससे भारतीय शिक्षा व्यवस्था को गहरा नुकसान पहुंचा, जिसके दुष्परिणाम आज भी दिखाई देते हैं. उन्होंने नई शिक्षा नीति–2020 को सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया. विशिष्ट अतिथि पूर्व कुलपति एवं राजस्थान के उच्च शिक्षा सलाहकार प्रो. कैलाश सोडाणी ने आत्मनिर्भर और आधुनिक मेवाड़ के निर्माण में शिक्षण संस्थानों की भूमिका पर प्रकाश डाला.

उन्होंने शोध, डिजिटल शिक्षा, स्वदेशी सोच और मानसिक गुलामी से मुक्ति का आह्वान किया. अध्यक्षता करते हुए कार्यवाहक अध्यक्ष प्रो. एस.एस. सारंगदेवोत ने कहा कि दीक्षांत समारोह ज्ञान को संस्कार और कर्म में रूपांतरित करने का पर्व है. शिक्षा का उद्देश्य अर्जन नहीं, बल्कि अर्पण है. उन्होंने सत्य, सेवा और संयम को राष्ट्र निर्माण का आधार बताया.