बिहार में साढ़े 9 लाख तक की राखी बिकी, भाई की कलाई पर बंधा महंगा प्यार
हीरे जड़े सोने के ब्रेसलेट वाली राखी ने खींचा ध्यान, चांदी की करीब 10 हजार राखियां बिकीं, 300 करोड़ का कारोबार. रिपोर्ट- कृष्णनंदन


Published : August 28, 2026 at 1:37 PM IST
पटना : भाई-बहन के अटूट प्रेम और सुरक्षा के संकल्प का पर्व रक्षाबंधन आज पूरे उत्साह के साथ मनाया जा रहा है. पर्व को लेकर पटना के बाजारों में भी जबरदस्त रौनक है. इस बार राखियों के बाजार में पारंपरिक धागों के साथ सोना, चांदी और हीरे जड़ी राखियों ने खास आकर्षण पैदा किया है. पटना में सबसे महंगी राखियों में करीब साढ़े 9 लाख रुपये की सोने के ब्रेसलेट वाली राखी भी बिकी है.
10 लाख तक की राखियां बिकी : बाजार में 10 रुपये की सामान्य राखी से लेकर 10 लाख रुपये तक की महंगी राखियां दिखी. पटना के ज्वेलरी बाजार में इस बार चांदी की राखियों की भी अच्छी मांग रही. ज्वेलर्स के मुताबिक अलग-अलग डिजाइन की करीब 10 हजार चांदी की राखियां बेची गई हैं. इनकी कीमत लगभग 500 से 5 हजार रुपये तक रही.
कुछ शोरूम में एक सप्ताह तक रोजाना 500 से 700 रुपये तक की चांदी की राखियों की बिक्री हुई. वहीं सोने की राखियों की कीमत करीब 7 हजार से 2 लाख रुपये तक रही, जबकि हीरे जड़ी सोने की राखियां 25 हजार से लेकर 10 लाख रुपये तक के दाम में उपलब्ध रहीं.

सोने और डायमंड राखियां : ज्वेलर्स के मुताबिक करीब साढ़े 9 लाख रुपये की एक खास राखी सोने के ब्रेसलेट पर तैयार की गई थी, जिसमें करीब दो कैरेट का डायमंड सॉलिटेयर लगाया गया था. इसके अलावा 50 हजार से लेकर 5 लाख रुपये तक की कई डिजाइनर सोने और डायमंड राखियों की भी बिक्री हुई.
300 करोड़ का कारोबार : कॉन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स के बिहार प्रदेश अध्यक्ष अशोक कुमार वर्मा ने कहा कि रक्षाबंधन ने इस बार बाजार को बड़ा सहारा दिया है. उनके मुताबिक बिहार में इस पर्व पर करीब 300 करोड़ रुपये के रिकॉर्ड कारोबार का अनुमान है. राखी के साथ मिठाई, ज्वेलरी, इलेक्ट्रॉनिक सामान और गिफ्ट आइटम की बिक्री में भी तेजी आई है.
''इस बार आभूषण वाली राखियों को लेकर लोगों में खास उत्साह दिखा. चांदी से लेकर सोने तथा हीरे जड़ी राखियों तक की खरीदारी हुई है.''- अशोक कुमार वर्मा, बिहार अध्यक्ष, कॉन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स

क्या बोले आचार्य? : वैसे पर्व का असली महत्व महंगे उपहार में नहीं, बल्कि भाई की कलाई पर बंधने वाली रक्षा डोर में है. आचार्य राजन उपाध्याय ने बताया कि अनुसार हिंदू धर्मशास्त्र में रक्षाबंधन को केवल भाई-बहन के रिश्ते तक सीमित पर्व नहीं माना गया है. यह मूल रूप से रक्षा-सूत्र बांधकर मंगल, आरोग्य, समृद्धि और दीर्घायु की कामना करने का पर्व है.
''प्राचीन धार्मिक परंपरा में रक्षा-सूत्र को किसी व्यक्ति की सुरक्षा और उसके कल्याण के संकल्प के रूप में बांधने की परंपरा रही है. इसी कारण रक्षाबंधन पर बांधा जाने वाला सूत्र सामान्य धागा नहीं, बल्कि धार्मिक भावना और संकल्प का प्रतीक माना जाता है.''- आचार्य राजन उपाध्याय
क्या है मान्यता? : आचार्य राजन उपाध्याय बताते हैं कि रक्षाबंधन के धार्मिक विधान में रक्षा-सूत्र बांधते समय विशेष मंत्र का उच्चारण किया जाता है. इसमें भगवान विष्णु के अवतार वामन और राजा बलि से जुड़ी कथा का भी उल्लेख मिलता है. मान्यता है कि माता लक्ष्मी ने राजा बलि को रक्षा-सूत्र बांधकर भगवान विष्णु को वापस प्राप्त किया था. इसी धार्मिक परंपरा से रक्षा-सूत्र बांधने की महत्ता को जोड़ा जाता है.
मंगल कामना और रक्षा का संकल्प : उन्होंने बताया कि भाई-बहन के संदर्भ में यह पर्व बहन की ओर से भाई के सुख, स्वास्थ्य, दीर्घायु और मंगल की कामना तथा भाई की ओर से बहन की रक्षा और उसके सम्मान का संकल्प माना जाता है. इसलिए रक्षाबंधन में सबसे महत्वपूर्ण रक्षा का सूत्र और उससे जुड़ा संकल्प है, न कि राखी की कीमत.
''धर्मशास्त्रीय परंपरा में रेशम के धागे की राखी का विशेष महत्व माना गया है. ऐसे में जो लोग सोने, चांदी या हीरे जड़ी राखियां खरीद रहे हैं, उन्हें भी पहले भाई की कलाई पर रेशम के धागे की राखी यानी रक्षा डोर बांधनी चाहिए और उसके बाद आभूषण वाली राखी पहनाई जा सकती है. महंगी राखी प्रेम और उपहार का प्रतीक हो सकती है, लेकिन धार्मिक दृष्टि से रक्षा-संकल्प की पूर्ति रक्षा डोर बांधने से ही मानी जाती है.''- आचार्य राजन उपाध्याय
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